'हमें एक भी न्यायिक परिसर निर्मित दिखाओ': न्यायिक बुनियादी ढांचे पर कम निवेश के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार की खिंचाई की

  • हमें एक भी न्यायिक परिसर निर्मित दिखाओ: न्यायिक बुनियादी ढांचे पर कम निवेश के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार की खिंचाई की

    सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (14 नवंबर) को पंजाब सरकार की उस याचिका पर सुनवाई से इनकार किया, जिसमें हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें निर्देश दिया गया कि मलेरकोटला में उपायुक्त (DC) और सीनियर पुलिस अधीक्षक (SSP) के कब्जे वाले उसके गेस्ट हाउस खाली करके ज़िला जज को आधिकारिक और आवासीय उपयोग के लिए आवंटित किए जाएं।

    जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने याचिकाकर्ताओं से हाईकोर्ट के समक्ष अपनी प्रामाणिकता दिखाने को कहा और उन्हें सोमवार को समय बढ़ाने के लिए प्रार्थना करने की अनुमति दी।

    सुनवाई के दौरान, जस्टिस कांत ने इस बात पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की कि राज्य सरकार ने पिछले 15 वर्षों में न्यायिक बुनियादी ढांचे के लिए कुछ भी खर्च नहीं किया।

    आगे कहा गया,

    "हाईकोर्ट के आदेश में क्या ग़लत है? आपने न्यायिक बुनियादी ढांचे पर कितना खर्च किया?"

    राज्य के एडवोकेट जनरल मनिंदरजीत सिंह बेदी ने बचाव करते हुए कहा कि हाईकोर्ट द्वारा उठाई गई सभी मांगों का पालन किया गया।

    जस्टिस कांत ने कहा,

    "पंजाब राज्य में नए न्यायिक परिसर या बुनियादी ढांचे के निर्माण से संबंधित एक भी परियोजना हमें दिखाइए जो आपने पूरी की हो।"

    इसके बाद जज ने पूछा कि मलेरकोटला को ज़िला कब घोषित किया गया।

    एडवोकेट ने जवाब दिया, "2021 में", और साथ ही यह भी बताया कि हाई कोर्ट ने इसे 2024 में अधिसूचित किया था।

    बाद में सीनियर एडवोकेट डॉ. एएम सिंघवी याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए और उन्होंने कहा,

    "यह हाई कोर्ट की उचित टिप्पणी नहीं है, मैं बहुत सम्मान के साथ कहना चाहता हूं।"

    असहमति जताते हुए जस्टिस कांत ने पलटवार किया,

    "यह बिल्कुल उचित टिप्पणी है। आपको नहीं पता कि पंजाब में क्या हो रहा है। हम बहुत संघर्ष कर रहे हैं। वे न्यायिक अदालतों के निर्माण के लिए जगह भी आवंटित नहीं करते। उनके पास कई अन्य चीज़ों पर खर्च करने के लिए पर्याप्त पैसा है! अगर हम जांच का आदेश देंगे, तो उन्हें इसका एहसास होगा। हमारे अधिकारी, बेचारे, पुराने घरों में रहते हैं।"

    जस्टिस बागची ने कहा,

    "यह आदेश [...] में है। एक बेहतर घर दीजिए, आपके पुलिस अधिकारी को उसका घर वापस मिल जाएगा।"

    जस्टिस कांत ने पूछा,

    "सिर्फ़ राजनीतिक तुष्टिकरण के लिए राजस्व ज़िला घोषित करने का क्या मतलब है? जब उन्हें पता है कि बुनियादी ढांचा तैयार नहीं हुआ है। हर बार आपको लगता है कि आपको अपने एसएसपी के लिए घर चाहिए... लेकिन आपको सेशन जज के लिए घर की ज़रूरत नहीं है?"

    सिंघवी ने जब बताया कि भवन समिति के रिकॉर्ड के अनुसार, पांच न्यायिक आवास मौजूद हैं और उनमें लोग रह रहे हैं तो जस्टिस कांत ने कहा,

    "आप उन्हें अपने अधिकारियों को क्यों नहीं दे देते? आप अपने उपायुक्त और SSP को वे घर दे दीजिए। तब उन्हें एहसास होगा!"

    इसके बाद सिंघवी ने दलील दी कि ज़रूरी कदम उठाने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं और बस समय चाहिए। जवाब में जस्टिस कांत ने कहा कि याचिकाकर्ता हाईकोर्ट के समक्ष अपनी प्रामाणिकता साबित कर सकते हैं।

    जस्टिस कांत ने सिंघवी से फिर पूछा,

    "आप उनसे पूछिए कि पिछले 15 सालों में उन्होंने पंजाब राज्य में एक भी न्यायिक न्यायालय परिसर बनाया?"

    इसके अलावा, जस्टिस बागची ने कहा कि न्यायिक परिसरों/आवासों का निर्माण केंद्र प्रायोजित योजनाओं के तहत हो रहा है और यह कठिनाई केवल पंजाब में ही नहीं, बल्कि कई अन्य राज्यों में भी आ रही है।

    जस्टिस ने कहा,

    "राज्य से समान अनुदान नहीं मिल रहा है और इसी वजह से योजनाएं रुकी हुई हैं।"

    "अगर हम पंजाब में जांच का आदेश देते तो वे पहले ही इस अनुदान को किसी और काम में खर्च कर चुके होते। वह 60% केंद्रीय अनुदान भी खर्च नहीं किया गया!"

    जस्टिस बागची ने कहा,

    "शायद अब समय आ गया कि राज्य और केंद्र के बजट में न्यायपालिका के लिए न्यूनतम बजटीय आवंटन निर्धारित किया जाए। यह सकल घरेलू उत्पाद का 1% भी नहीं है।"

    अंततः, मामले को वापस लिया हुआ मानकर खारिज करते हुए पीठ ने याचिकाकर्ताओं को सोमवार को अपने आदेश में संशोधन के लिए स्टेटस रिपोर्ट और प्रस्ताव के साथ हाईकोर्ट जाने की अनुमति दी।

    Case Title: STATE OF PUNJAB AND ORS. Versus DISTRICT BAR ASSOCIATION MALERKOTLA, SLP(C) No. 32888/2025

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