'पूरी तरह से अयोग्य': कस्टडी में मौत मामले में सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ DGP को लगाई फटकार, दी अवमानना की चेतावनी
Shahadat
7 Aug 2026 6:06 PM IST

कस्टडी में हुई मौत के मामले में सीनियर पुलिस अधिकारियों की लापरवाही का संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में छत्तीसगढ़ पुलिस की कड़ी आलोचना की और डायरेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस (DGP) को "पूरी तरह से अयोग्य" करार दिया।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच एक व्यक्ति की पत्नी और दो बेटियों द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। उन्होंने आरोप लगाया कि कस्टडी में टॉर्चर के कारण उनके पति/पिता की मौत हो गई। हालांकि उस व्यक्ति की मौत जनवरी 2024 में हुई, लेकिन पुलिस ने उसकी मौत की जांच के लिए FIR 30 जुलाई 2026 को दर्ज की।
परिवार ने शुरू में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और कस्टडी में हुई मौत की निष्पक्ष जांच और 50 लाख रुपये के मुआवज़े की मांग की थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने FIR दर्ज करने या आरोपों की जांच के लिए कोई निर्देश दिए बिना 1 लाख रुपये का मुआवज़ा देकर मामले का निपटारा किया।
इस साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य को नोटिस जारी किया। एक जवाबी हलफनामा दायर किया गया, लेकिन उसमें यह नहीं बताया गया कि FIR दर्ज करने और मृतक की कस्टडी में हुई मौत की जांच के लिए क्या कदम उठाए गए।
एक पहले के आदेश में कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट द्वारा दिया गया मुआवज़ा "पूरी तरह से अपर्याप्त" था और मृतक के परिवार को हुए नुकसान की गंभीरता के हिसाब से "उचित नहीं" था। कोर्ट ने राज्य को निर्देश प्राप्त करने के लिए समय दिया और राज्य के गृह सचिव और DGP को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के ज़रिए पेश होने को कहा।
हाल ही में राज्य के गृह सचिव और DGP कार्यवाही में शामिल हुए। DGP ने कहा कि जांच के आदेश दे दिए गए हैं और दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे। कोर्ट इस बात से नाराज़ था कि मामले को किस तरह से संभाला जा रहा था, खासकर दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने में हुई लंबी देरी को लेकर।
जस्टिस मेहता ने टिप्पणी की,
"हम देखेंगे कि ज़िम्मेदारी तय करने का काम किसे सौंपा जाना चाहिए। क्या राज्य पुलिस इसके लिए सक्षम है या इसे किसी अन्य एजेंसी को सौंपने की ज़रूरत है। हमने जो देखा है, उससे हमें नहीं लगता कि छत्तीसगढ़ का प्रशासन इस मामले से निपटने में सक्षम है।"
जब DGP ने यह कहकर देरी को सही ठहराने की कोशिश की कि (मौत की वजह पर) न्यायिक जांच रिपोर्ट पुलिस विभाग को नहीं भेजी गई थी, तो जस्टिस मेहता ने बताया कि वह रिपोर्ट हाईकोर्ट में राज्य के हलफनामे के साथ जुड़ी हुई थी।
जज ने कहा,
"हम अवमानना की कार्रवाई शुरू करेंगे! हर पहलू पर कोर्ट को गुमराह किया जा रहा है।"
न्यायिक जांच में यह पुष्टि हुई कि मरने वाले की मौत किसी कुंद हथियार (Blunt Weapon) से सिर पर लगी चोट के कारण हुई। DGP ने कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद रिपोर्ट को पढ़ने पर FIR दर्ज करने लायक कोई संज्ञेय अपराध (Cognizable Offense) नहीं बनता है।
जस्टिस मेहता ने DGP से पूछा,
"कुंद हथियार से सिर पर चोट लगने से मौत का क्या मतलब है? हमें बताइए। आप समझते हैं? आसान भाषा में?"
जज ने टिप्पणी की,
"हमें यह कहते हुए दुख हो रहा है कि हमें यह दर्ज करना होगा कि छत्तीसगढ़ के DGP पूरी तरह से अयोग्य हैं!"
मामले के तथ्यों को संक्षेप में बताएं तो, 34 साल के मृतक को उसकी किराने की दुकान के सामने बिक्री के लिए शराब रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था (कीमत 1200 रुपये)। उसे 18 जनवरी 2024 को हिरासत में लिया गया और 3 दिनों के भीतर (21 जनवरी 2024) अस्पताल भेजा गया। अस्पताल में सुबह करीब 6 बजे उसकी मौत हो गई।
हाईकोर्ट के सामने राज्य ने बताया कि गिरफ्तारी के बाद मृतक की मेडिकल जांच की गई और उस तारीख को कोई चोट (15 दिनों से थोड़ी सूजन के अलावा) नहीं पाई गई। 22 जनवरी को जेल अधीक्षक ने सेशन जज को मृतक की मौत की न्यायिक जांच कराने के लिए पत्र लिखा।
चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने CrPC की धारा 176 के तहत जांच शुरू की। आखिरकार, संबंधित JMFC ने जुलाई 2024 की रिपोर्ट में राय दी कि मौत सिर की चोट से हुई जटिलताओं के कारण हुई थी।
इस पृष्ठभूमि में हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को 1 लाख रुपये का मुआवजा दिया। कोर्ट ने कहा कि राज्य, उन कर्मचारियों का नियोक्ता (Employer) होने के नाते जिनकी "लापरवाही" के कारण मृतक की जान गई, मुआवजा देने के लिए जिम्मेदार है। खास बात यह है कि 1 लाख रुपये का मुआवज़ा इस सोच के साथ दिया गया कि ऐसे मुआवज़े का पुलिस या जेल अधिकारियों पर ऐसा असर पड़ना चाहिए, जिससे वे ऐसी हरकतें न करें जिनकी वजह से किसी की जान जा सकती है।
मामले को आदेश के लिए सूचीबद्ध किया गया।
Case : LAHRA BAI TAMRE vs. STATE OF CHHATTISGARH Diary No. - 48963/2025


