ग्रीन पार्क एक्सटेंशन इलाके में जलभराव से निपटने के लिए AIIMS के परिसर से होकर नई सीवर लाइन बिछाने का निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने किया रद्द
Shahadat
17 May 2026 11:04 PM IST

यह देखते हुए कि संवैधानिक अदालतें अधिकारियों की प्रशासनिक भूमिकाएं नहीं निभा सकतीं, सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया। इस आदेश में राष्ट्रीय राजधानी के ग्रीन पार्क एक्सटेंशन और आस-पास के इलाकों में जलभराव को नियंत्रित करने के लिए AIIMS परिसर से होकर एक नई सीवर लाइन बिछाने के निर्देश दिए गए।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने यह आदेश पारित करते हुए कहा:
"रिट याचिका अभी भी हाई कोर्ट में लंबित है, लेकिन हमारी राय है कि हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारियों की भूमिका निभाते हुए और समाधान निकालने की ज़िम्मेदारी खुद पर लेते हुए अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है। इसलिए 18.06.2025 का विवादित अंतरिम आदेश रद्द किया जाता है।"
संक्षेप में मामला
ग्रीन पार्क एक्सटेंशन और आस-पास के इलाकों में जलभराव की समस्या से संबंधित प्रतिवादी-शैलेंद्र भटनागर की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने पिछले साल जून में ये विवादित निर्देश जारी किए। यह पाया गया था कि AIIMS आवासीय परिसर से होकर नई सीवर लाइन बिछाना ज़रूरी था, क्योंकि इसके लिए ज़रूरी ज़मीन की उपलब्धता और इस मामले में शामिल व्यापक जनहित को ध्यान में रखा गया।
सीवर लाइन बिछाने के लिए AIIMS परिसर के भीतर NDMC की ज़मीन उपलब्ध कराने की व्यावहारिकता का पता लगाने के लिए अधिकारियों के बीच एक संयुक्त बैठक के बाद दिल्ली जल बोर्ड ने अदालत को सूचित किया कि AIIMS से होकर प्रस्तावित सीवर लाइन 200 मीटर से ज़्यादा लंबी नहीं होगी और इसके लिए परिसर के भीतर केवल 130 मीटर ज़मीन की आवश्यकता होगी।
हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए AIIMS ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। पिछले साल अक्टूबर में सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगाई थी। भारत संघ, NCT दिल्ली सरकार, दिल्ली जल बोर्ड, दिल्ली नगर निगम और दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड की दलीलें सुनने के बाद अपील अंततः स्वीकार कर ली गई। अदालत ने प्रतिवादी-अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे सभी हितधारकों को विश्वास में लेते हुए इस मुद्दे के समाधान के लिए मिलकर प्रयास करें।
अपने आदेश में अदालत ने ग्रीन पार्क एक्सटेंशन और आस-पास के इलाकों के निवासियों को जल निकासी सुविधाओं की कमी के कारण हो रही समस्याओं को स्वीकार किया। हालांकि, अदालत ने यह राय व्यक्त की कि इन समस्याओं का समाधान करने के लिए आवश्यक कदम उठाना अधिकारियों का ही काम है।
"अदालतों का काम ऐसे मुद्दों से निपटना और उनका प्रबंधन करना नहीं है। सरकार या संबंधित अधिकारियों को लोगों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी निभानी होगी, और जब भी ऐसी समस्याएं सामने आएं, उन्हें हल करना होगा। न तो भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने वाले किसी हाईकोर्ट को, और न ही संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत शक्ति का प्रयोग करने वाली इस अदालत क, प्रशासनिक निकायों की जगह लेनी चाहिए। उन्हें भीड़भाड़ वाली कॉलोनियों में रहने वाले लोगों की समस्याओं को हल करने के लिए उपचारात्मक उपाय सुझाने का काम नहीं करना चाहिए, जहां बुनियादी ढांचे की सुविधाएं अपर्याप्त हैं।"
अदालत ने आगे कहा कि यह अधिकारियों का काम है कि वे उचित समय के भीतर हाईकोर्ट को रिपोर्ट दें कि उन्होंने क्या समाधान निकाला है। अदालत ने स्थिति की गंभीरता पर भी ज़ोर दिया, क्योंकि मॉनसून का मौसम नज़दीक आ रहा है। इससे जलभराव की समस्या और बढ़ जाएगी, क्योंकि जल निकासी की सुविधाएँ कम हैं। इससे स्वास्थ्य संबंधी ख़तरे भी पैदा हो सकते हैं।
अंत में, हाईकोर्ट से अनुरोध किया गया कि वह 20 जुलाई को इस मामले पर सुनवाई करे। उस दिन अधिकारी रिपोर्ट देंगे कि उन्होंने क्या समाधान निकाला है। उसे लागू करने के लिए उन्होंने क्या कदम उठाए या उठाने का प्रस्ताव रखा। आदेश में कहा गया कि हाईकोर्ट को इस कार्यान्वयन की प्रगति पर नज़र रखने की पूरी आज़ादी होगी।
Case Title: ALL INDIA INSTITUTE OF MEDICAL SCIENCES v. SHAILENDRA BHATNAGAR, SLP(C) No. 29481/2025

