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सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने वाला कलकत्ता हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया

LiveLaw News Network
1 Nov 2021 11:05 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने वाला कलकत्ता हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पश्चिम बंगाल राज्य में पटाखों के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने वाले कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा,

"हम आश्वस्त हैं कि कलकत्ता हाईकोर्ट को इस तरह के आदेश को पारित करने से पहले पक्षों को स्पष्टीकरण देने के लिए कहा जाना चाहिए था।"

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह सुनिश्चित करने के लिए यदि कोई तंत्र मौजूद था कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई अनुमति के अनुसार केवल "ग्रीन क्रैकर्स" का उपयोग किया जा रहा है तो हाईकोर्ट को अधिकारियों को इस तथ्य से संबंधित सामग्री को रिकॉर्ड पर रखने का अवसर देना चाहिए था।

हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी पक्ष को पर्याप्त सामग्री के साथ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने की स्वतंत्रता भी दी।

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में जोड़ा,

"फिलहाल हम केवल 29 अक्टूबर, 2021 को सुप्रीम कोर्ट के आदेश में दर्ज स्थिति को दोहराते हैं। इसके अतिरिक्त पश्चिम बंगाल राज्य यह सुनिश्चित करने की संभावना तलाशेगा कि कोई प्रतिबंधित सामग्री आयात नहीं की जाएगी। साथ ही तंत्र को मजबूत किया जाए।"

जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस अजय रस्तोगी की सुप्रीम कोर्ट की अवकाश पीठ कलकत्ता हाईकोर्ट के 29 अक्टूबर, 2021 को काली पूजा, दिवाली, छठ पूजा, जगधात्री पूजा, गुरु नानक का जन्मदिन, क्रिसमस की पूर्व संध्या और इस साल नए साल की पूर्व संध्या जैसे आगामी उत्सवों के दौरान पश्चिम बंगाल में पटाखों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने के आदेश को दी गई चुनौती वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

सुनवाई के दौरान पीठ ने मौखिक रूप से कहा,

"पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं हो सकता। दुरुपयोग को रोकने के लिए तंत्र को मजबूत करें।"

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि हाईकोर्ट ने तंत्र की कमी से प्रभावित होने पर पटाखों पर इसलिए पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि केवल ग्रीन पटाखों का उपयोग किया जा रहा है। हालांकि बहस के दौरान इस पहलू पर कभी बहस नहीं हुई।

पश्चिम बंगाल राज्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने प्रस्तुत किया कि यदि हाईकोर्ट ने राज्य को अवसर दिया होता तो अधिकारियों ने प्रवर्तन तंत्र के बारे में विवरण रिकॉर्ड में रखा होता।

अवकाश पीठ ने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट पटाखों के मुद्दे पर विचार कर रहा है और 29 अक्टूबर को पारित आदेश में स्पष्ट किया गया कि पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है।

कोर्ट रूम एक्सचेंज

हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाले डीलरों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ भटनागर ने शुरू में प्रस्तुत किया कि इस तथ्य के बावजूद कि ग्रीन पटाखों के संबंध में एससी के तीन आदेश और एनजीटी के दो आदेश हैं, कलकत्ता हाईकोर्ट ने ग्रीन पटाखों पर प्रतिबंध लगा दिया। उन्होंने 23 जुलाई, 2020 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित आदेश का उल्लेख किया, जिसमें केवल उन क्षेत्रों में पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है जहां हवा की गुणवत्ता "खराब" है। अन्य क्षेत्रों में अधिकारी ग्रीन पटाखों के उपयोग की अनुमति दे सकते हैं।

उन्होंने 29 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित नवीनतम आदेश का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया कि "पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध" नहीं है और केवल उन पटाखों पर प्रतिबंध है जो पहले न्यायालय द्वारा प्रतिबंधित रसायनों का उपयोग करते हैं।

उन्होंने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा ग्रीन पटाखों के उपयोग की अनुमति देने के बावजूद कलकत्ता हाईकोर्ट ने पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया।

उन्होंने पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का भी जिक्र किया, जिसमें पटाखों पर तेलंगाना हाईकोर्ट द्वारा लगाए गए व्यापक प्रतिबंध को संशोधित किया गया था।

सिलीगुड़ी फायरक्रैकर्स एसोसिएशन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मालविका त्रिवेदी ने भटनागर द्वारा की गई दलीलों को दोहराया। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि सुप्रीम कोर्ट ने व्यावहारिक कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए ग्रीन पटाखों के उपयोग की अनुमति दी।

जस्टिस अजय रस्तोगी ने कहा,

"व्यावहारिक कठिनाइयाँ क्या हैं? यह कार्यपालिका को तय करना है।"

जस्टिस खानविलकर ने कहा,

"और हाईकोर्ट ने परिभाषित नहीं किया कि कौन सी व्यावहारिक कठिनाइयां हैं।"

अर्जुन गोपाल मामले (जिसमें 29 अक्टूबर को आदेश पारित किया गया था) में याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायण ने बताया कि उस आदेश में सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने प्रतिबंधित पटाखों की बिक्री के मुद्दे को लेकर ग्रीन पटाखों का झूठा लेबल और फर्जी क्यूआर कोड पर ध्यान दिया था। उन्होंने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि सीबीआई की एक प्रारंभिक जांच रिपोर्ट है, जो दर्शाती है कि पटाखों में प्रतिबंधित रसायनों का भी उपयोग किया जा रहा है। दूसरी ओर पीठ ने कहा है कि अधिकारियों में न्यायालय के आदेशों को सख्ती से लागू करने की इच्छा की कमी है।

शंकरनारायण ने कहा,

"इस पृष्ठभूमि में कलकत्ता हाईकोर्ट कहता है कि राज्य सरकार ने यह नहीं बताया कि वे इसे कैसे लागू करने जा रहे हैं। पीईएसओ ने केवल चार पटाखों को अनुमति दी। रॉकेट चलने बंद नहीं होते हैं। हम उन्हें हर जगह पाते हैं। मेरे लिए स्वास्थ्य के अधिकार के संरक्षण के पक्ष में और सुप्रीम कोर्ट के आदेश की भावना के अनुरूप हाईकोर्ट का आदेश उचित प्रतिबंध प्रतीत होता है।"

पश्चिम बंगाल राज्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने प्रस्तुत किया कि हाईकोर्ट का आदेश इस धारणा से प्रभावित है कि यह सुनिश्चित करने के लिए कोई योजना तैयार नहीं की गई कि केवल ग्रीन पटाखे बेचे जा रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि एक तंत्र मौजूद है और राज्य सरकार और पश्चिम बंगाल पुलिस सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन कर रही है।

उन्होंने कहा,

"हमने कहा कि हम पहले के आदेशों पर चल रहे हैं... यह कलकत्ता हाईकोर्ट की ओर से एक निराधार आशंका है।"

उन्होंने बताया,

"एक तंत्र है। 2018 से हम इसकी निगरानी कर रहे हैं। प्रतिबंधों का उल्लंघ करने पर कई एफआईआर दर्ज की गई हैं। 2018 में 24 एफआईआर दर्ज की गईं और 46 लोगों को गिरफ्तार किया गया। 2019 में 22 एफआईआर दर्ज की गई और 26 लोगों को गिरफ्तार किया गया। 2020 में 190 एफआईआर दर्ज की गई और 243 लोगों को गिरफ्तरा किया गया। 2021 में 31 अक्टूबर तक सात एफआईआर दर्ज की गईं और 10 लोगों को गिरफ्तार किया गया।"

उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने राज्य को इन तथ्यों को दर्ज करने का अवसर दिए बिना एक जनहित याचिका में आदेश पारित किया।

पीठ के एक प्रश्न के उत्तर में पश्चिम बंगाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने उत्तर दिया कि पश्चिम बंगाल में कोई निर्माता नहीं है। राज्य में पटाखों का आयात अन्य राज्यों से किया जाता है।

पीठ ने पूछा कि क्या पुलिस के लिए यह सत्यापित करना संभव नहीं है कि क्या केवल ग्रीन पटाखों का आयात किया जाता है।

वरिष्ठ अधिवक्ता त्रिवेदी ने प्रस्तुत किया कि ग्रीन पटाखे पहले ही खुदरा विक्रेताओं और डीलरों द्वारा आयात किए जा चुके हैं और उन्हें सत्यापित करने के लिए एक क्यूआर कोड तंत्र है।

उन्होंने कहा,

"यह स्कैन करके आसानी से किया जा सकता है जो अतीत में हुआ है। स्कैन करके आप जान सकते हैं कि ग्रीन पटाखे और नकली पटाखे कौन से हैं।"

हाईकोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता रचित लखमनी ने शंकरनारायणन द्वारा किए गए प्रस्तुतीकरण को अपनाया।

उन्होंने कहा कि राज्य में नकली पटाखे पहले ही आ चुके हैं और उन्हें ट्रैक करना संभव नहीं है। इसी पृष्ठभूमि में हाईकोर्ट ने आदेश पारित किया था।

उन्होंने कहा कि पटाखे ग्रीन या नहीं उन्हें फोड़ने के लिए अस्पतालों और रिहायशी से दूर अलग-अलग जोन बनाए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि सड़कों और छतों पर पटाखे फोड़ने जा रहे हैं।

जस्टिस खानविलकर ने कहा,

"आप बहुत सी चीजों की कल्पना कर रहे हैं.. लोग भी इन दिनों जागरूक हैं।"

उन्होंने कहा,

"पूर्ण प्रतिबंध नहीं हो सकता.. दुरुपयोग को रोकने के लिए तंत्र को मजबूत करना होगा। अदालत के आदेशों को लागू करना होगा।"

कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति सब्यसाची भट्टाचार्य और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध रॉय की खंडपीठ ने आगामी उत्सवों के दौरान पूरे पश्चिम बंगाल राज्य में ग्रीन पटाखों सहित सभी प्रकार के पटाखों के उपयोग और बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने अर्जुन गोपाल और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य के अपने 2018 के फैसले में कहा था कि इस तरह का पूर्ण प्रतिबंध न्याय के हित में नहीं होगा और इस प्रकार मानदंड निर्धारित किए ताकि एक नियंत्रित तरीके से ग्रीन पटाखों के उपयोग और निर्माण को सुविधाजनक बनाया जा सके।

तेलंगाना फायर वर्क्स डीलर्स एसोसिएशन बनाम पी इंद्र प्रकाश और अन्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला, याचिकाकर्ता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने दिनांक 9 नवंबर, 2020 को दिए अपने आदेश के तहत नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा जारी निर्देशों के अनुरूप ग्रीन पटाखों के उपयोग की अनुमति दी थी।

केस शीर्षक: गौतम रॉय और अन्य बनाम पश्चिम बंगाल राज्य

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