सुप्रीम कोर्ट ने जंगल की आग को रोकने के लिए उत्तराखंड हाईकोर्ट के 2016 के निर्देशों को रद्द किया, मामले की निगरानी के लिए हाईकोर्ट को सौंपा

Shahadat

24 July 2026 10:09 AM IST

  • सुप्रीम कोर्ट ने जंगल की आग को रोकने के लिए उत्तराखंड हाईकोर्ट के 2016 के निर्देशों को रद्द किया, मामले की निगरानी के लिए हाईकोर्ट को सौंपा

    सुप्रीम कोर्ट ने राज्य में जंगल की आग से जुड़े मामले को उत्तराखंड हाईकोर्ट को सौंप दिया ताकि उचित निर्देश जारी किए जा सकें और आग की समस्या को नियंत्रित करने के उपायों की समय-समय पर निगरानी की जा सके।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने सीनियर एडवोकेट राजीव दत्ता (खुद याचिकाकर्ता), सीनियर एडवोकेट के. परमेश्वर (CEC की ओर से) और उत्तराखंड के डिप्टी एडवोकेट जनरल जतिंदर कुमार सेठी की दलीलें सुनने के बाद यह आदेश पारित किया।

    मामले का निपटारा करते हुए कोर्ट ने हाईकोर्ट के 2016 के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें जंगल की आग के मुद्दे पर कई निर्देश जारी किए गए। बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट के निर्देश 10 साल पहले जारी किए गए और समय बीतने तथा तकनीकी प्रगति को देखते हुए उन निर्देशों पर फिर से विचार करने की आवश्यकता है।

    कोर्ट ने कहा कि स्थानीय परिस्थितियों की जानकारी होने के कारण हाईकोर्ट निर्देशों पर फिर से विचार करने और समय-समय पर उपाय सुझाने के लिए बेहतर स्थिति में होगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि सीनियर एडवोकेट राजीव दत्ता 'एमिकस' (न्याय मित्र) के तौर पर हाई कोर्ट की मदद कर सकते हैं।

    सुनवाई के दौरान, दत्ता ने एक याचिका पर दलील दी, जिसमें कोर्ट को दिए गए पिछले आश्वासनों और तैयारियों के दावों के बावजूद इस साल जंगल की आग को रोकने में राज्य की विफलता पर सवाल उठाया गया। उन्होंने दावा किया कि मैनपावर की कमी थी और आपदा प्रबंधन के लिए केंद्र से राज्य को मिले फंड का इस्तेमाल कहीं और किया गया।

    उल्लेखनीय है कि सीनियर वकील ने जंगल की आग की एक ऐसी घटना का जिक्र किया जिसे बुझाने में अधिकारियों को 1 महीना लग गया। उन्होंने सवाल किया, "पूरी तरह से उदासीनता है... कुछ बीट कर्मचारियों को 30 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है... कम से कम हमें तैयार तो रहना चाहिए। क्या वे इतना भी नहीं कर सकते?"

    CEC की ओर से के. परमेश्वर ने कहा कि अब एकमात्र चिंता राज्य द्वारा उठाए गए कदमों की निगरानी करने की।

    दूसरी ओर, उत्तराखंड के डिप्टी एजी ने जंगल की आग को रोकने के लिए अधिकारियों द्वारा उठाए गए कदमों का जिक्र किया, जिसके परिणामस्वरूप ऐसी घटनाओं की संख्या में कमी आई है। उन्होंने बताया कि जंगल की आग की घटनाएं 2022 में 2186 से घटकर 2023 में 773 हो गईं। यह एक चक्र में होने वाली घटना है, इसलिए 2024 में यह बढ़कर 1276 हो गई और फिर 2025 में घटकर 268 रह गई। उन्होंने कहा कि इस साल जंगल में आग लगने की 654 घटनाएं हुईं।

    डिप्टी एजी ने जंगल की आग का एक मुख्य कारण चीड़ की पत्तियों (पाइन नीडल्स) को बताया और कहा कि राज्य ने इन पत्तियों को इकट्ठा करने के लिए कदम उठाए हैं ताकि इनका इस्तेमाल घरेलू इस्तेमाल की चीजें बनाने में किया जा सके। यह भी बताया गया कि जंगल की आग से निपटने के लिए 12,000 लोगों को तैनात किया गया और 5,600 लोगों को फायर वॉचर के तौर पर भर्ती किया गया।

    डिप्टी एजी ने यह भी बताया कि हाई कोर्ट के निर्देशों पर रोक होने के बावजूद, राज्य ने उनमें से ज़्यादातर निर्देशों को लागू किया।

    दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद CJI कांत ने कहा कि जंगल में आग लगना "दैवीय घटना" (Act of God) हो सकती है, लेकिन उस आग को काबू करने और भविष्य में आग लगने से रोकने की ज़िम्मेदारी इंसानों/अधिकारियों की है। उन्होंने यह भी कहा कि हाई कोर्ट के कुछ निर्देश "व्यावहारिक नहीं" थे।

    CJI ने यह भी कहा कि जंगल में आग अनजाने में इंसानी दखल की वजह से या कभी-कभी फॉरेस्ट माफिया की वजह से लग सकती है।

    उन्होंने कहा,

    "अब इसका समाधान यह है कि विभाग एक मज़बूत स्थानीय सिस्टम बनाए और उतनी ही ज़रूरी बात यह है कि हाई कोर्ट इसकी निगरानी करे।"

    संक्षेप में मामला

    इस मामले में हाईकोर्ट ने राज्य में बार-बार जंगल में आग लगने और उससे वन संपदा, इकोलॉजी, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण को हुए नुकसान के बारे में कुछ न्यूज़ रिपोर्टों का स्वतः संज्ञान लिया। केंद्र और राज्य सरकारों के हलफनामों पर विचार करने के बाद उसने 26 निर्देश जारी किए, जिनमें शामिल थे - राष्ट्रीय वन नीति बनाना, जंगल की आग को रोकने और काबू करने के लिए पर्याप्त फंड देना, आग बुझाने के लिए फोम/अन्य रिटार्डेंट का इस्तेमाल करना, वन अधिकारियों को आग बुझाने के उपकरण/आग से बचाने वाले कपड़े/मशीनरी देना, शिकारियों को कड़ी सज़ा देने के लिए वन कानूनों में संशोधन करना, आदि।

    हाईकोर्ट के 2016 के फैसले में ये निर्देश शामिल थे, जिन पर सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में रोक लगाई। आज, राज्य की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए मामले को आखिरकार बंद किया गया।

    Case Title: THE STATE OF UTTARAKHAND & ANR v. IN THE MATTER OF THE PROTECTION OF FOREST, ENVIRONMENT, ECOLOGY, WILDLIFE ETC. FROM THE FOREST FIRE ETC., CIVIL APPEAL NO(S). 1249/2019

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