BREAKING | मुस्लिम विरासत कानून महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर केंद्र से मांगा जवाब

Shahadat

16 April 2026 3:56 PM IST

  • BREAKING | मुस्लिम विरासत कानून महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर केंद्र से मांगा जवाब

    सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (16 अप्रैल) को केंद्र सरकार को रिट याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ के प्रावधानों को महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण बताया गया।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। यह याचिका वकील पौलोमी पावनी शुक्ला और 'न्याय नारी फाउंडेशन' नामक संगठन ने दायर की थी, जिसका प्रतिनिधित्व आयशा जावेद कर रही थीं।

    10 मार्च को, जब इस याचिका पर पहले सुनवाई हुई तो पीठ ने न्यायिक हस्तक्षेप को लेकर चिंता जताई। पीठ ने कहा था कि इससे मुस्लिम पर्सनल लॉ के संबंध में खालीपन पैदा हो सकता है, क्योंकि 'भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम' (Indian Succession Act) इस्लाम धर्म के अनुयायियों पर लागू नहीं होता है।

    पीठ ने मौखिक रूप से यह भी टिप्पणी की थी कि 'समान नागरिक संहिता' (Uniform Civil Code) लागू होने से इस मुद्दे का समाधान हो सकता है। इसके बाद अदालत ने मामले की सुनवाई टाल दी थी और सुझाव दिया था कि याचिका में संशोधन करके राहत संबंधी सुझावों को भी शामिल किया जाए।

    गुरुवार को जब इस मामले पर फिर से सुनवाई हुई तो याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने अदालत की पिछली चिंताओं का जवाब देते हुए कहा कि यदि अदालत शरीयत कानून के प्रावधानों को रद्द करती है, तो 'भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम' को लागू किया जा सकता है।

    चीफ जस्टिस ने तब भूषण से कहा,

    "कोई यह तर्क दे सकता है कि यह पर्सनल लॉ (निजी कानून) का मामला है।"

    भूषण ने जवाब दिया कि पर्सनल लॉ को संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षण प्राप्त नहीं है।

    भूषण ने अपनी बात रखी,

    "यदि यह भेदभावपूर्ण है तो इसे रद्द किया जाना चाहिए। यदि इसे रद्द किया जाता है तो 'भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम' [लागू हो सकता है]। केवल मुस्लिम उत्तराधिकार कानून ही संहिताबद्ध (Codified) नहीं है। इसके नियम इतने जटिल हैं कि वकीलों को भी इन्हें समझने में कठिनाई होती है। मैं अक्सर अपने मुस्लिम दोस्तों से कहता हूँ कि वे 'समान नागरिक संहिता' का विरोध न करें।"

    CJI सूर्यकांत ने जवाब दिया,

    "'समान नागरिक संहिता' एक संवैधानिक आकांक्षा है... इसका धर्म से कोई लेना-देना नहीं है।"

    जस्टिस बागची ने यह कहते हुए कि 'विशेष विवाह अधिनियम' (Special Marriage Act) विवाह के संबंध में एकरूपता की दिशा में एक कदम है, पूछा कि क्या यह अदालत के हस्तक्षेप का मामला है, या इसे विधायिका पर छोड़ दिया जाना चाहिए। भूषण ने जवाब दिया कि अदालत भेदभावपूर्ण प्रथाओं को रद्द कर सकती है।

    भूषण ने कहा,

    "यह कहना कि महिलाओं को अपने पुरुष समकक्षों की तुलना में आधा या उससे भी कम मिलेगा, भेदभावपूर्ण है। यह एक सिविल मामला है, न कि अनुच्छेद 25 के तहत कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा।"

    उन्होंने बताया कि वसीयत के ज़रिए उत्तराधिकार (Testamentary Succession) के मामले में भी कोई भी मुस्लिम अपनी संपत्ति के 1/3 हिस्से से ज़्यादा की वसीयत नहीं कर सकता। इस प्रकार, मुस्लिम अपनी खुद की कमाई हुई संपत्ति के लिए भी अपनी मर्ज़ी से वसीयत नहीं कर सकते, भूषण के साथ पेश हुए वकील ने आगे कहा।

    इस मोड़ पर बेंच ने कहा कि बेहतर होगा अगर कोई पीड़ित व्यक्ति खुद कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाए। भूषण ने जवाब दिया कि दूसरी याचिकाकर्ता संस्था का प्रतिनिधित्व एक मुस्लिम महिला कर रही है। साथ ही यह कि 'एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड' भी एक मुस्लिम ही है। उन्होंने आगे कहा कि पिछली सुनवाई के बाद, कई मुस्लिम व्यक्तियों ने याचिका के समर्थन में बयान जारी किए और उन बयानों को अनुलग्नकों (Annexures) के तौर पर पेश किया गया है। उन्होंने कहा कि वह रिकॉर्ड पर "कितने भी पीड़ित व्यक्तियों" को ला सकते हैं।

    भूषण ने यह भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट पहले से ही मुस्लिम व्यक्तियों द्वारा दायर उन याचिकाओं पर विचार कर रहा है, जिनमें शरीयत कानून के बजाय 'भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम' (Indian Succession Act) को लागू करने की मांग की गई।

    भूषण ने कहा,

    "यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दा है, जिस पर इस कोर्ट द्वारा विचार किया जाना ज़रूरी है।"

    बेंच ने नोटिस जारी करने पर सहमति जताई। इसे इसी तरह की अन्य याचिकाओं के साथ जोड़ दिया।

    बेंच ने भूषण से यह भी कहा कि वे रिकॉर्ड पर कुछ पीड़ित व्यक्तियों को लेकर आएं।

    CJI ने कहा,

    "कुछ ऐसे लोगों को ढूंढें जो वास्तव में पीड़ित हों, ताकि कल को कोई मुद्दा..."

    भूषण ने कहा,

    "हमें निश्चित रूप से ऐसी बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएं मिल जाएंगी, जिन्हें समान अधिकारों से वंचित किया गया है, और जो इस बात से पीड़ित हैं।"

    भूषण ने स्वीकार किया कि यह एक "संवेदनशील मामला" है।

    जस्टिस बागची ने कहा कि सुधार समुदाय के भीतर से ही आना चाहिए।

    भूषण ने जवाब दिया कि इसे पूरी तरह से रीति-रिवाजों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

    जस्टिस बागची ने 'समान नागरिक संहिता' (Uniform Civil Code) का ज़िक्र करते हुए कहा,

    "इसका जवाब संविधान में ही मौजूद है।"

    जज ने आगे कहा,

    "लेकिन समाज इसके लिए कितना तैयार है, असली सवाल तो यही है?"

    जस्टिस बागची ने आगे कहा,

    "एक वैज्ञानिक, तर्कसंगत और मानवीय दृष्टिकोण विकसित किया जाना चाहिए, जैसा कि हमारे 'मौलिक कर्तव्यों' में भी शामिल है।"

    इस पर भूषण ने जवाब दिया,

    "दुर्भाग्य से हम तो ठीक इसके विपरीत दिशा में जा रहे हैं।"

    भूषण ने आगे कहा कि मुसलमानों को यह डर है कि "यूनिफॉर्म सिविल कोड असल में हिंदू सिविल कोड बन जाएगा।"

    हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि हिंदू सिविल कोड भी एक जैसा नहीं है, क्योंकि यह रीति-रिवाजों पर निर्भर करता है। भूषण ने कहा कि UCC में ऐसे सबसे उदार तत्वों को शामिल किया जाना चाहिए जो भेदभावपूर्ण न हों।

    याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में लंबित इसी तरह के मामलों का भी ज़िक्र किया - मामला सूफिया पीएम बनाम भारत संघ, जिसमें एक पूर्व-मुस्लिम भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के तहत शासित होने की मांग कर रही है; और मामला नौशाद के.के बनाम भारत संघ, जिसमें एक मुस्लिम व्यक्ति शरीयत कानून के बजाय भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के तहत शासित होने का विकल्प चाहता है।

    याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 के प्रावधानों को संवैधानिक चुनौती दी गई। इसमें यह तर्क दिया गया कि उत्तराखंड यूनिफॉर्म सिविल कोड, 2024 के लागू होने से मुसलमानों के बीच, केवल उनके भौगोलिक निवास के आधार पर असमान नागरिक अधिकार पैदा हो गए।

    याचिका में सुप्रीम कोर्ट से कई निर्देश देने की मांग की गई, जिनमें शामिल हैं:

    1. यह घोषणा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 की धारा 2, जहां तक यह बिना वसीयत के उत्तराधिकार और विरासत को नियंत्रित करती है, संविधान के अनुच्छेद 13, 14, 15 और 21 के तहत अमान्य है। यह उस हद तक अमान्य है जहाँ तक यह मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव करती है, क्योंकि यह उन्हें विरासत में बराबर का हिस्सा देने से वंचित करती है।

    2. यह घोषणा कि शरीयत एक्ट के तहत बिना वसीयत के उत्तराधिकार के नियम, अनुच्छेद 25 द्वारा संरक्षित आवश्यक धार्मिक प्रथाएं नहीं हैं। उत्तराखंड यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होने के बाद, ये नियम संविधान के भाग III के तहत संवैधानिक जाँच के अधीन हैं।

    3. यह घोषणा कि उत्तराखंड UCC का सह-अस्तित्व (जो मुस्लिम महिलाओं को विरासत में बराबर का अधिकार देता है) और शरीयत एक्ट (जो अन्य जगहों पर ऐसी समानता से वंचित करता है) - एक ही धर्म की महिलाओं के बीच एक असंवैधानिक भौगोलिक वर्गीकरण पैदा करता है, जो अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन है।

    4. यह निर्देश कि, जब तक संसद कानून में संशोधन नहीं कर लेती, तब तक पूरे भारत में मुसलमानों के पास वसीयत संबंधी एक समान और लैंगिक रूप से बराबर के अधिकार होने चाहिए। वसीयत द्वारा संपत्ति के निपटान पर लगी एक-तिहाई की सीमा, उत्तराखंड के मुसलमानों और भारत के बाकी हिस्सों के मुसलमानों के बीच असमान नागरिक परिणाम पैदा करने का काम नहीं करनी चाहिए। एक निर्देश कि पूरे भारत में मुस्लिम महिलाओं को विरासत में लिंग-समान अधिकार मिलने चाहिए, ताकि उत्तराखंड के बाहर की मुस्लिम महिलाओं को राज्य की मुस्लिम महिलाओं की तुलना में किसी भी तरह से नुकसान न हो।

    5. केंद्र सरकार को एक निर्देश कि वह सातवीं अनुसूची की सूची III की प्रविष्टि 5 के साथ पढ़े गए अनुच्छेद 245–254 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए, बिना वसीयत के उत्तराधिकार (Intestate Succession) से जुड़े कानून में संशोधन करे; ताकि पूरे भारत में मुस्लिम महिलाओं के लिए विरासत के समान अधिकार और मुसलमानों के लिए वसीयत संबंधी समान अधिकार सुनिश्चित किए जा सकें—जो समानता और गरिमा की संवैधानिक गारंटियों और उत्तराखंड UCC में अपनाए गए ढांचे के अनुरूप हों।

    Case: POULOMI PAVINI SHUKLA Vs UNION OF INDIA | D No. 67256/2025

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