सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर अधिनियम को चुनौती पर केंद्र से मांगा जवाब, पूछा - क्या 'स्व-पहचान' का दुरुपयोग हो सकता है?
Shahadat
4 May 2026 12:35 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को उन रिट याचिकाओं के एक समूह पर नोटिस जारी किया, जिनमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने छह सप्ताह के भीतर जवाब देने के लिए नोटिस जारी किया। इस मामले को अगली बार तीन जजों की पीठ के समक्ष रखा जाएगा।
शुरुआत में ही, सीनियर एडवोकेट डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने इस संशोधन पर आपत्ति जताई, क्योंकि यह जेंडर की 'स्व-पहचान' के अधिकार को छीन लेता है। उन्होंने तर्क दिया कि यह संशोधन 2014 के NALSA मामले में दिए गए फैसले के विपरीत है, जिसमें जेंडर की स्व-मान्यता को एक मौलिक अधिकार घोषित किया गया था।
इस मोड़ पर CJI सूर्यकांत ने स्व-पहचान की अनुमति देने के संबंध में कुछ चिंताएं व्यक्त कीं। उन्होंने कहा कि ऐसे लोग भी हो सकते हैं, जो इसका दुरुपयोग करके ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए आरक्षित लाभों पर कब्ज़ा कर लें।
CJI सूर्यकांत ने कहा,
"क्या इससे कोई खतरा पैदा नहीं होता? क्या ऐसे लोग नहीं हो सकते, जो [ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के रूप में] ढोंग करके उन आरक्षणों या विशेषाधिकारों को हासिल करने की कोशिश करें, जो असल में [ट्रांसजेंडर व्यक्तियों] के लिए ही हैं?"
सिंघवी ने जवाब दिया कि जहां तक उनकी समझ है, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए कोई आरक्षण प्रदान नहीं किया गया। इसलिए किसी व्यक्ति द्वारा ट्रांसजेंडर होने का ढोंग करके लाभ प्राप्त करने की कोई संभावना ही नहीं है। सिंघवी ने आगे कहा कि 0.01% मामलों में दुरुपयोग की एक दूरस्थ संभावना के आधार पर बहुसंख्यक लोगों के अनुच्छेद 21 के अधिकार को निलंबित करना उचित नहीं ठहराया जा सकता।
जब सिंघवी ने यह तर्क दिया कि कोई विधायी संशोधन किसी न्यायिक फैसला रद्द नहीं कर सकता तो जस्टिस बागची ने असहमति जताते हुए कहा कि विधायिका किसी फैसले के 'मूल आधार' (Substratum) को समाप्त कर सकती है।
उन्होंने कहा,
"जब आप कहते हैं कि NALSA के अनुसार स्व-पहचान गरिमा का विषय है तो हम कह सकते हैं कि इस संशोधन की जांच अनुच्छेद 21 के आलोक में की जानी चाहिए। इस संशोधन ने उस कानून के मूल आधार को ही बदल दिया, जिसके आधार पर NALSA ने अपना फैसला दिया था। इसलिए अब स्व-निर्धारण के बजाय, मेडिकल मूल्यांकन (Medical Evaluation) का प्रावधान किया गया।"
सिंघवी ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति—जिसकी अधिकांश शारीरिक विशेषताएं विपरीत जेंडर जैसी हैं—किसी प्रकार की थेरेपी (मेडिकल ट्रीटमेंट) करवा रहा है तो इस संशोधन के अनुसार इसे आपराधिक कृत्य माना जाएगा। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तब बीच में टोकते हुए कहा कि सिर्फ़ किसी को ज़बरदस्ती सेक्स चेंज (जेंडर परिवर्तन) करवाने के लिए मजबूर करना, या किसी बच्चे को ऐसे बदलाव के लिए मजबूर करना ही अपराध माना गया।
SG ने कहा,
"ज़बरदस्ती नसबंदी के भी मामले सामने आए हैं।"
सिंघवी ने कहा कि इस संशोधन से बहुत से लोग सरकारी फ़ायदों से वंचित रह जाएंगे।
SG ने तब जवाब दिया,
"आप या तो पुरुष हैं या महिला। आपको बाहर नहीं किया गया।"
इसी बीच एक व्यक्ति हर्षा असद कैविएट (चेतावनी) पर पेश हुए। उन्होंने बेंच को बताया कि यह क़ानून अभी लागू नहीं हुआ, क्योंकि केंद्र सरकार ने इसे नोटिफ़ाई नहीं किया। इसलिए ये याचिकाएं समय से पहले दायर की गईं। कैविएटर ने बेंच को बताया कि समुदाय के कुछ सदस्य राजनीतिक स्तर पर सरकार से बातचीत कर रहे हैं ताकि इस संशोधन को लागू न किया जाए, और इन याचिकाओं पर नोटिस जारी होने से वह प्रक्रिया बाधित हो सकती है।
जब सिंघवी ने अंतरिम आदेश की गुज़ारिश की कि जो लोग इलाज करवा रहे हैं, उनके इलाज पर इस संशोधन का कोई असर नहीं पड़ना चाहिए तो बेंच ने कहा कि अंतरिम राहत देने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि यह क़ानून अभी लागू ही नहीं हुआ।
सिंघवी ने ज़ोर देते हुए कहा,
"हम इस क़ानून पर रोक लगाने की मांग नहीं कर रहे हैं। हम तो यह रोक चाहते हैं कि जो लोग आज अपनी मर्ज़ी से (सेल्फ़-रिकग्निशन एप्लीकेशन के आधार पर) इलाज करवा रहे हैं, उन्हें इलाज से वंचित न किया जाए..."
सीनियर एडवोकेट अरुंधति काटजू ने कहा कि बहुत से लोगों के लिए हार्मोनल थेरेपी अचानक रोक दी गई। SG ने कहा कि जो लोग इससे प्रभावित हुए हैं, उन्हें कोर्ट में आना चाहिए।
संक्षेप में मामला
ये याचिकाएं उस संशोधन अधिनियम को चुनौती देती हैं, जिसे 30 मार्च, 2026 को राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिली थी। इन याचिकाओं का आरोप है कि यह अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 के तहत ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को गारंटीकृत मौलिक अधिकारों को "अपरिवर्तनीय संवैधानिक क्षति" पहुंचाता है।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, ये संशोधन लिंग की 'स्व-पहचान' (Self-Identification) के उस सिद्धांत को खत्म कर देते हैं, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक 'राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) बनाम भारत संघ' के फ़ैसले में मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी थी। उनका तर्क है कि अब कोर्ट से उस अधिकार की रक्षा करने की अपेक्षा की जा रही है, जिसे उसने पहले अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा और व्यक्तिगत स्वायत्तता का एक अभिन्न अंग घोषित किया।
अन्य प्रावधानों के अलावा, याचिकाकर्ता 2019 के अधिनियम की धारा 2(k) के तहत "ट्रांसजेंडर व्यक्ति" की परिभाषा में किए गए बदलाव को चुनौती देते हैं। जहां पिछली परिभाषा में जेंडर पहचान को व्यक्ति के 'आत्मगत अनुभव' (Subjective Experience) से जोड़ा गया, वहीं संशोधित प्रावधान इस ढांचे को बदलकर सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानों और मेडिकल रूप से सत्यापित जैविक स्थितियों की एक सूची से बदल देता है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस बदलाव से स्व-पहचान का आधार ही खत्म हो जाता है। इसका परिणाम यह हो सकता है कि जो व्यक्ति खुद को ट्रांसजेंडर मानते हैं, लेकिन निर्धारित श्रेणियों में नहीं आते, उन्हें कानूनी मान्यता से वंचित कर दिया जाए।
चुनौती का एक और प्रमुख आधार उस संशोधन से संबंधित है, जिसके तहत किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति को पहचान प्रमाण पत्र जारी करने के लिए ज़िला मजिस्ट्रेट को मेडिकल बोर्ड की सिफ़ारिश की जाँच करना अनिवार्य कर दिया गया। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह संशोधन फिर से उन मेडिकल प्रमाणन की शर्तों को लागू करता है, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने NALSA फ़ैसले में स्पष्ट रूप से खारिज किया था। कोर्ट ने तब इन्हें निजता और गरिमा के अधिकारों का उल्लंघन माना था।
याचिकाकर्ता उस संशोधन को भी चुनौती देते हैं, जो जेंडर-परिवर्तन सर्जरी (Gender-Affirming Surgery) करवाने वाले व्यक्तियों के लिए एक संशोधित जेंडर सर्टिफिकेट के लिए आवेदन करना अनिवार्य बनाता है। उनका तर्क है कि एक 'वैकल्पिक प्रावधान' को 'अनिवार्य दायित्व' में बदलना व्यक्तिगत स्वायत्तता में हस्तक्षेप है।
इसके अतिरिक्त, याचिकाएं कुछ नए जोड़े गए दंडात्मक प्रावधानों के निर्माण के तरीके पर भी चिंता व्यक्त करती हैं। उनका तर्क है कि ये प्रावधान ट्रांसजेंडर पहचान को ज़बरदस्ती या आपराधिक आचरण से जोड़कर, इस पहचान को कलंकित (Stigmatize) करने का जोखिम पैदा करते हैं। यह भी बताया गया कि संशोधन अधिनियम में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के विरुद्ध यौन शोषण जैसे अपराधों के लिए अधिकतम सज़ा अपेक्षाकृत कम रखी गई, जबकि मानव तस्करी से जुड़े अपराधों के लिए काफ़ी अधिक सज़ाएं निर्धारित की गईं।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, यह एक ऐसी विधायी पदानुक्रम को दर्शाता है, जो ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की 'शारीरिक अखंडता' (Bodily Integrity) को कमतर आंकता है। यह भी ध्यान दिया जा सकता है कि इस अधिनियम को चुनौती देते हुए केरल, दिल्ली, कर्नाटक और बंबई के उच्च न्यायालयों में भी याचिकाएं दायर की गईं।
Case Title: LAXMI NARAYAN TRIPATHI AND ANR. Versus UNION OF INDIA AND ANR., W.P.(C) No. 548/2026; KINNER MAA EK SAMAJIK SANSTHA TRUST Versus THE MINISTRY OF HOME AFFAIRS AND ORS., W.P.(C) No. 541/2026; MANVEER YADAV AND ORS. Versus UNION OF INDIA AND ORS., W.P.(C) No. 519/2026; AKKAI PADMASHALI AND ORS. Versus UNION OF INDIA AND ORS., W.P.(C) No. 535/2026; MANOJ NARULA Versus UNION OF INDIA, W.P.(C) No. 512/2026; RACHANA MUDRABOYINA Versus UNION OF INDIA AND ORS., W.P.(C) No. 546/2026; ADARSH SORI AND ORS. Versus UNION OF INDIA, W.P.(C) No. 547/2026; APRATIM ROY @ SUPRAVA ROY Versus UNION OF INDIA, W.P.(C) No. 566/2026; THANGJAM SANTA SINGH ALSO KNOWN AS SANTA KHURAI KHURAI AND ORS. Versus UNION OF INDIA AND ORS., W.P.(C) No. 568/2026

