बलात्कार के आरोपी POCSO जज की मांग: सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से जवाब मांगा

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    सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट प्रशासन को नोटिस जारी किया। यह नोटिस उत्तर प्रदेश के न्यायिक अधिकारी के खिलाफ दायर याचिका पर दिया गया, जो बलात्कार के मामले में आरोपी होने के बावजूद POCSO मामलों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने यह आदेश पारित किया। यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा रिट याचिका को खारिज करने के बाद सामने आया है। इस याचिका में न्यायिक अधिकारी, एडिशनल जिला जज (ADJ) अशोक भरतेंदु के खिलाफ 'को वारंटो' (अधिकार-पृच्छा) रिट की मांग की गई, जो POCSO जज के रूप में अपने आधिकारिक कर्तव्यों का पालन कर रहे हैं।

    हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में ये मामले उस महिला ने शुरू किए, जिसने न्यायिक अधिकारी पर बलात्कार का आरोप लगाया। इस मामले में 2022 में IPC की धारा 376 के तहत FIR दर्ज की गई।

    सुनवाई के दौरान, जस्टिस बागची ने याचिकाकर्ता (शिकायतकर्ता) को सलाह दी कि वे मुख्य आपराधिक मामले (बलात्कार के मामले) पर ध्यान दें। याचिकाकर्ता की इस शिकायत पर कि उन्हें अपनी शिकायत या विजिलेंस जांच की प्रगति के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई, जज ने कहा कि कोर्ट हाई कोर्ट को जरूरी निर्देश देगा ताकि शिकायत को उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जा सके।

    जस्टिस बागची ने कहा कि कोर्ट को दो अधिकारों के बीच संतुलन बनाना होता है - एक पीड़ित का अधिकार और दूसरा आरोपी का अधिकार, जो कानूनी कार्यवाही को चुनौती दे सकता है। जज ने आगे कहा कि न्यायिक अधिकारी के खिलाफ शुरू की गई विजिलेंस जांच के नतीजों को लेकर एक सीमित जांच की जा सकती है।

    याचिकाकर्ता के वकील ने आग्रह किया कि भले ही न्यायिक अधिकारी को सस्पेंड न किया जाए, लेकिन उन्हें कम से कम POCSO कोर्ट की जिम्मेदारी से तो हटाया ही जा सकता है, क्योंकि यह एक "बहुत प्रतिष्ठित पद" है।

    इस पर जस्टिस बागची ने कहा,

    "हम समझते हैं कि यह एक बहुत ही संवेदनशील पद है।"

    अंततः, बेंच ने याचिका पर नोटिस जारी कर दिया। मामले की अगली सुनवाई दिसंबर में होगी।

    हाईकोर्ट ने रिट याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि हाईकोर्ट प्रशासन "जानता है कि वह क्या कर रहा है", क्योंकि न्यायिक अधिकारी अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे थे। पूछताछ करने पर हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता रिकॉर्ड पर ऐसा कोई आरोप साबित नहीं कर सकी, जो न्यायिक अधिकारी द्वारा अपने कर्तव्यों के पालन से जुड़ा हो। जहाँ तक शिकायतकर्ता की FIR का सवाल है, हाई कोर्ट ने कहा कि कानून अपनी प्रक्रिया के अनुसार काम करेगा।

    याचिकाकर्ता-शिकायतकर्ता ने हाई कोर्ट का दरवाजा इसलिए खटखटाया था, क्योंकि केंद्रीय जन सूचना अधिकारी (CPIO) ने RTI अधिनियम के तहत उसके सवालों का जवाब देने से इनकार कर दिया था। CPIO का तर्क था कि राज्य के राज्यपाल ने हाई कोर्ट के विजिलेंस ब्यूरो सेल को RTI अधिनियम के दायरे से छूट दे रखी है।

    हाईकोर्ट द्वारा रिट याचिका खारिज किए जाने के बाद शिकायतकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट प्रशासन और संबंधित न्यायिक अधिकारी को नोटिस जारी किया।

    Case: X v. THE HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD, SLP(C) No. 37096/2026

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