सबरीमाला संदर्भ मामला: जैन संगठनों ने कहा—धार्मिक प्रथाओं में दखल न दे राज्य, आस्था के अनुयायी ही करें निर्णय
Praveen Mishra
3 April 2026 3:56 PM IST

सुप्रीम कोर्ट में लंबित सबरीमाला संदर्भ मामले में विभिन्न जैन संगठनों ने महत्वपूर्ण दलीलें पेश करते हुए कहा है कि किसी भी धर्म की प्रथाओं के नियमन का अधिकार केवल उस धर्म के अनुयायियों के पास होना चाहिए। किसी अन्य धर्म के व्यक्ति को दूसरे धर्म की प्रथाओं को चुनौती देने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
आवेदकों ने तर्क दिया कि संविधान के Article 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता में किसी धर्म को अपनी प्रथाओं को परिभाषित और संचालित करने की स्वायत्तता शामिल है। उन्होंने कहा कि कोई प्रथा धार्मिक है या नहीं, यह तय करना अदालतों का कार्य नहीं है, बल्कि यह निर्णय संबंधित धर्म के अनुयायी ही करेंगे, जब तक कि आंतरिक विवाद उत्पन्न न हो जिसे धर्म के भीतर सुलझाया न जा सके।
जैन संगठनों ने यह भी कहा कि राज्य—चाहे वह विधायिका, कार्यपालिका या न्यायपालिका हो—को यह अधिकार नहीं होना चाहिए कि वह किसी धर्म की प्रथाओं को परिभाषित या सीमित करे। धर्म संविधान की देन नहीं है, इसलिए राज्य उसके स्वरूप को निर्धारित नहीं कर सकता।
आवेदकों के अनुसार, अदालतें धार्मिक प्रथाओं से जुड़े मामलों में केवल दो परिस्थितियों में हस्तक्षेप कर सकती हैं—पहली, जब किसी धार्मिक संप्रदाय के भीतर विवाद हो जिसे आंतरिक रूप से हल नहीं किया जा सके; और दूसरी, जब राज्य द्वारा बनाए गए कानून धार्मिक प्रथाओं को प्रभावित करते हों। हालांकि, ऐसे मामलों में भी अदालतों को यह तय नहीं करना चाहिए कि कोई प्रथा “आवश्यक” या “अभिन्न” है या नहीं।
उन्होंने यह भी कहा कि 'essential religious practice' की अवधारणा का उपयोग सीमित होना चाहिए और यह शब्द संविधान में नहीं, बल्कि न्यायिक व्याख्या से आया है। अदालतों को केवल यह देखना चाहिए कि राज्य का हस्तक्षेप सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य या अन्य संवैधानिक प्रावधानों के तहत उचित है या नहीं।
जैन संगठनों ने यह भी स्पष्ट किया कि Articles 25 and 26 को संविधान के बुनियादी ढांचे (Basic Structure) का हिस्सा माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्म की स्वतंत्रता का संबंध समानता (अनुच्छेद 14), अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) और जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) से भी जुड़ा हुआ है।
इसके अलावा, 'नैतिकता' (morality) को 'संवैधानिक नैतिकता' के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए। अदालतें किसी धार्मिक विश्वास को केवल अपने दृष्टिकोण से अनैतिक घोषित नहीं कर सकतीं। जैन समुदाय में महिलाओं की स्थिति में समय के साथ हुए बदलाव को उन्होंने आंतरिक सुधार का उदाहरण बताया।
आवेदकों ने यह भी कहा कि पूजा स्थलों का प्रबंधन और उनकी संपत्ति धार्मिक गतिविधियों का हिस्सा है और इसमें राज्य का हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए। हालांकि, कुछ परिस्थितियों में धार्मिक संपत्तियों का अधिग्रहण संभव है, लेकिन प्राकृतिक पवित्र स्थलों का अधिग्रहण नहीं किया जा सकता।
अंत में, जैन संगठनों ने आग्रह किया कि किसी अन्य धर्म के व्यक्ति को जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से किसी धार्मिक प्रथा को चुनौती देने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
गौरतलब है कि इस मामले में 9-न्यायाधीशों की पीठ 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू करेगी। इससे पहले, All India Muslim Personal Law Board ने भी इसी तरह की दलीलें प्रस्तुत की थीं कि अदालतों को यह तय नहीं करना चाहिए कि कोई प्रथा किसी धर्म का आवश्यक हिस्सा है या नहीं।

