OBC-क्रीमी लेयर पर फ़ैसले को भविष्य से लागू करने की केंद्र की अर्ज़ी पर सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुरक्षित रखा

  • OBC-क्रीमी लेयर पर फ़ैसले को भविष्य से लागू करने की केंद्र की अर्ज़ी पर सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुरक्षित रखा

    सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (24 सितंबर) को केंद्र सरकार की एक अर्ज़ी पर फ़ैसला सुरक्षित रख लिया। इस अर्ज़ी में 11 मार्च के उस फ़ैसले को लागू करने के बारे में स्पष्टीकरण मांगा गया, जिसमें कहा गया कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के उम्मीदवार की 'क्रीमी लेयर' स्थिति का निर्धारण केवल माता-पिता की वेतन आय के आधार पर नहीं किया जा सकता, बल्कि उनके पद की श्रेणी पर भी विचार किया जाना चाहिए।

    जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की।

    केंद्र ने फ़ैसले को पिछली तारीख से लागू करने के नतीजों पर चिंता जताई। उसने कहा कि ऐसी व्याख्या से केंद्र सरकार, 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा पहले ही की जा चुकी भर्तियों और दाखिलों पर असर पड़ सकता है।

    याचिका में कहा गया,

    "योग्यता के बदले हुए मानदंड को पिछली तारीख से या देर से लागू करने से उस समय लागू नियमों और प्रमाणपत्रों के तहत की गई नियुक्तियां और दाखिले प्रभावित हो सकते हैं। इससे OBC-NCL स्थिति, वरिष्ठता, सेवा शर्तों और करियर में तरक्की को लेकर अनिश्चितता पैदा हो सकती है। इसका असर केंद्रीय और राज्य शैक्षणिक संस्थानों, विश्वविद्यालयों और पेशेवर संस्थानों में दाखिलों पर भी पड़ सकता है। इसलिए आवेदक सम्मानपूर्वक निवेदन करता है कि फ़ैसले के लागू होने के समय के बारे में स्पष्टीकरण ज़रूरी है, ताकि पूरी हो चुकी चयन प्रक्रियाओं, नियुक्तियों और दाखिलों तथा उनसे जुड़े अधिकारों पर कोई असर न पड़े।"

    केंद्र ने संबंधित पक्षों से बातचीत के बाद अन्य संगठनों के पदों और सरकारी पदों के बीच समानता तय करने और जहां समानता तय नहीं हो पाई है, वहां OBC क्रीमी-लेयर स्थिति तय करने के लिए एक समान तरीका बनाने के वास्ते दो साल का समय मांगा।

    केंद्र ने स्पष्टीकरण अर्ज़ी पर फ़ैसला आने तक सिविल सेवा परीक्षा (CSE) 2025 में संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) द्वारा अनुशंसित 958 उम्मीदवारों के लिए सेवा आवंटन को अंतिम रूप देने की अनुमति भी मांगी।

    इससे पहले, 11 मार्च के फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि केवल वेतन आय से यह तय नहीं किया जा सकता कि कोई उम्मीदवार OBC क्रीमी लेयर में आता है या नहीं। कोर्ट ने कहा कि उम्मीदवार के माता-पिता के पद का दर्जा और श्रेणी भी महत्वपूर्ण कारक हैं। यह विवाद 8 अगस्त 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम (OM) और 14 अक्टूबर 2004 के स्पष्टीकरण वाले पत्र की व्याख्या से जुड़ा था।

    1993 के OM में 'क्रीमी-लेयर' का दर्जा तय करने के लिए माता-पिता की सैलरी को आधार नहीं बनाया गया। लागू कैटेगरी के आधार पर, माता-पिता का पद मायने रखता है। जहां इनकम/वेल्थ टेस्ट लागू होता है, वहाँ इनकम की गणना में सैलरी और खेती से होने वाली इनकम को शामिल नहीं किया जाता है।

    हालांकि, 2004 के स्पष्टीकरण में माता-पिता की सैलरी से होने वाली इनकम पर विचार करने की बात कही गई, उन मामलों में जहां PSU, बैंकों, यूनिवर्सिटी और प्राइवेट संस्थाओं के पदों और सरकारी पदों के बीच समानता तय नहीं की गई।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2004 का स्पष्टीकरण कोई ऐसी मुख्य शर्त नहीं जोड़ सकता, जो 1993 की पॉलिसी में नहीं थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि PSU या प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों के बच्चों के साथ उसी स्तर के सरकारी कर्मचारियों के बच्चों की तुलना में अलग व्यवहार करना - यानी उनकी सैलरी इनकम को बाहर करने का आधार बनाना - भेदभावपूर्ण हो सकता है और संविधान के आर्टिकल 14 और 16 का उल्लंघन हो सकता है।

    स्पष्टीकरण के लिए अपनी मौजूदा अर्ज़ी में केंद्र सरकार ने कहा कि वह 11 मार्च के फैसले की समीक्षा नहीं चाहती है। इसके बजाय, उसने फैसले के लागू होने के समय और उसके निर्देशों को लागू करने के तरीके के बारे में स्पष्टीकरण मांगा।

    सरकार ने कहा कि 2016 और 2025 के बीच, केंद्र सरकार के मंत्रालयों और विभागों और उनसे जुड़े और अधीनस्थ कार्यालयों में 5.69 लाख से ज़्यादा आरक्षित पद भरे गए, जिनमें 3.70 लाख OBC पद शामिल थे। सरकार ने कहा है कि ये भर्तियाँ 8 अगस्त 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम और उसके बाद जारी निर्देशों और गाइडलाइंस के आधार पर की गईं।

    केंद्र की याचिका के अनुसार, पिछली तारीख से लागू करने पर 2012 से सिविल सेवा परीक्षाओं में किए गए सर्विस आवंटन पर फिर से विचार करना पड़ सकता है। इससे पहले से नियुक्त उम्मीदवारों की सर्विस और कैडर का दोबारा आवंटन हो सकता है और अभी सर्विस में मौजूद अधिकारियों की सीनियरिटी और प्रमोशन पर भी असर पड़ सकता है।

    केंद्र का तर्क है कि पिछली तारीख से लागू करने से चल रही परीक्षाओं और भर्ती प्रक्रियाओं पर भी असर पड़ सकता है। उन उम्मीदवारों की ओर से कानूनी मामले बढ़ सकते हैं, जिन्हें पहले OBC-NCL फ़ायदे या अतिरिक्त प्रयास देने से मना कर दिया गया।

    सरकार ने रेलवे, बैंकों, डाक विभाग और अर्धसैनिक संगठनों सहित विभिन्न परीक्षा निकायों और विभागों के ज़रिए की गई भर्तियों का ज़िक्र किया। सरकार का कहना है कि 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम का पालन करने वाले 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा की गई भर्तियों में भी ऐसे ही मुद्दे उठ सकते हैं।

    सरकार ने उन उम्मीदवारों के बारे में भी चिंता जताई, जो संबंधित परीक्षा के सालों बाद टेक्निकल सर्विस के लिए योग्य हो सकते हैं। सरकार का कहना है कि समय बीतने के कारण कुछ उम्मीदवारों को तय शारीरिक और मेडिकल मानकों को पूरा करने में मुश्किल हो सकती है।

    याचिका में यह भी कहा गया कि 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम के तहत OBC क्रीमी-लेयर क्राइटेरिया के आधार पर 2012 से उच्च शिक्षण संस्थानों में लाखों एडमिशन हुए। सरकार ने चिंता जताई कि पिछली तारीख से किए गए बदलावों से ऐसे एडमिशन पर असर पड़ सकता है, खासकर उन संस्थानों में जहाँ सुपरन्यूमरेरी सीटों का प्रावधान नहीं है।

    सरकार का यह भी तर्क है कि पिछली तारीख से लागू करने से सरकारी कामकाज में बाधा आएगी और उन लोगों पर असर पड़ेगा जो मूल कानूनी मामले में पक्षकार नहीं थे, बिना उन्हें अपनी व्यक्तिगत परिस्थितियों पर विचार करने का मौका दिए।

    इसलिए केंद्र ने स्पष्टीकरण मांगा कि 11 मार्च के फ़ैसले से उन पूरी हो चुकी चयन प्रक्रियाओं, नियुक्तियों, सर्विस या कैडर आवंटन, सीनियरिटी की स्थिति या एडमिशन को पिछली तारीख से फिर से नहीं खोला जाना चाहिए, जो उस समय लागू नियमों और पात्रता शर्तों के तहत किए गए। केंद्र ने उन उम्मीदवारों के बारे में भी स्पष्टीकरण मांगा है जो 11 मार्च, 2026 को पहले से चल रही परीक्षाओं या भर्ती प्रक्रियाओं में भाग ले रहे थे।

    इसके अलावा, केंद्र ने एक अंतरिम याचिका दायर करके UPSC द्वारा CSE-2025 में अनुशंसित 958 उम्मीदवारों को मौजूदा 8 अगस्त, 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम के अनुसार सर्विस आवंटित करने की अनुमति मांगी है, जब तक कि स्पष्टीकरण याचिका पर फ़ैसला नहीं हो जाता।

    सरकार ने कहा कि सर्विस अलॉटमेंट में और देरी होने से 958 उम्मीदवारों का फ़ाउंडेशन कोर्स और सालाना ट्रेनिंग व इंडक्शन साइकल टल जाएगा। सरकार का कहना है कि अगर बाद में स्पष्टीकरण की अर्ज़ी उसके पक्ष में तय होती है, तो इस नुकसान की भरपाई नहीं की जा सकेगी।

    Case Title – Union of India v. Rohith Nathan and Anr.

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