सुप्रीम कोर्ट का अनुरोध: बार काउंसिल ट्रांसफर फीस को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई तेज़ करे दिल्ली हाईकोर्ट
Shahadat
28 May 2026 7:58 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में अनुच्छेद 32 के तहत दायर रिट याचिका पर सुनवाई करने से इनकार किया। इस याचिका में बार काउंसिल द्वारा एक राज्य से दूसरे राज्य में बार काउंसिल रजिस्ट्रेशन ट्रांसफर करने के लिए ली जाने वाली कथित तौर पर बहुत ज़्यादा फीस को चुनौती दी गई।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने कहा कि इसी तरह का मुद्दा उठाने वाली एक और रिट याचिका अभी दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित है। मौजूदा याचिका पर सुनवाई करने से इनकार करते हुए बेंच ने याचिकाकर्ता को यह छूट दी कि वह इस मामले को दिल्ली हाईकोर्ट में उठा सकता है।
बेंच ने हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि वह लंबित रिट याचिका का निपटारा तेज़ी से करे।
एक प्रैक्टिसिंग वकील का प्रतिनिधित्व कर रहीं सीनियर एडवोकेट शोभा गुप्ता ने कहा कि हालांकि दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा इसलिए खटखटाया गया, क्योंकि इसमें उत्तर प्रदेश बार काउंसिल का अधिकार क्षेत्र भी शामिल था।
एक चार्ट का हवाला देते हुए गुप्ता ने बताया कि जब वे दिल्ली हाईकोर्ट गए तो उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि उत्तर प्रदेश बार काउंसिल भी ट्रांसफर की अनुमति देने के लिए अलग से फीस लेगा।
उल्लेखनीय है कि गौरव कुमार बनाम भारत संघ (2024) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि BCI केवल वही फीस ले सकता है, जो कानून में तय की गई, उससे न ज़्यादा और न ही कम। कोर्ट ने एनरोलमेंट फीस को 750 रुपये तक सीमित कर दिया था। इसके बाद बॉम्बे हाईकोर्ट, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट और अन्य हाईकोर्ट ने संबंधित राज्य बार काउंसिलों द्वारा ली जाने वाली भारी-भरकम ट्रांसफर फीस रद्द की।
एडवोकेट्स एक्ट की धारा 18 का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि कानून में किसी भी तरह की फीस का प्रावधान नहीं है। लेकिन याचिकाकर्ता को दिल्ली से उत्तर प्रदेश ट्रांसफर के लिए 18,000 रुपये देने के लिए मजबूर किया गया।
उन्होंने कहा,
"हम बार काउंसिल ऑफ इंडिया के खिलाफ बार-बार आ रहे हैं। BCI के खिलाफ कुछ गंभीर मामले सामने आ रहे हैं। इतनी सारी विसंगतियां क्यों बताई जा रही हैं?"
CJI कांत ने कहा कि अगर कोर्ट इस PIL पर सुनवाई करता है तो हर ऐसा व्यक्ति यहीं आ जाएगा। उन्होंने सुझाव दिया कि दिल्ली हाईकोर्ट में दायर याचिका में यूपी बार काउंसिल को भी एक पक्ष बनाया जा सकता है।
CJI कांत ने कहा,
"हर दिन हम मामलों पर सुनवाई करते हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि BCI के खिलाफ हर कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट में ही लाई जाए।"
इसे देखते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ता को दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित रिट याचिका को आगे बढ़ाने और उत्तर प्रदेश बार काउंसिल को पक्षकार बनाने की छूट दी, जिसके खिलाफ कार्रवाई का एक नया आधार बनता है।
कोर्ट ने आदेश दिया,
"याचिकाकर्ता लंबित रिट याचिका को आगे बढ़ा सकता है, जिसमें वह, यदि उचित समझे तो अन्य राज्य बार काउंसिलों को भी पक्षकार बना सकता है, जिनके खिलाफ उसके पास कार्रवाई का एक नया आधार होने की बात कही गई। हम दिल्ली हाईकोर्ट से यह भी अनुरोध करते हैं कि वह ऊपर बताई गई रिट याचिका का अंतिम निपटारा जल्द-से-जल्द करे।"
Case Details: ADITYA KUMAR KANDU Vs BAR COUNCIL OF INDIA|W.P.(C) No. 682/2026 Diary No. 30820 / 2026

