सुप्रीम कोर्ट ने 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों के बंटवारे पर लगी रोक को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार किया

Shahadat

14 July 2026 8:14 PM IST

  • सुप्रीम कोर्ट ने 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों के बंटवारे पर लगी रोक को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार किया

    सुप्रीम कोर्ट ने परिसीमन संशोधनों को चुनौती देने वाली याचिका वापस लेने की अनुमति दी, अधिकारियों के सामने अपनी बात रखने का सुझाव दिया।

    सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से इनकार किया। इस याचिका में संसदीय और राज्य विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन से जुड़े 84वें और 87वें संविधान संशोधनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई। कोर्ट ने सुझाव दिया कि याचिकाकर्ता पहले संबंधित अधिकारियों के सामने अपनी बात रखे।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच इस याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में परिसीमन के लिए 1971 और 2001 की जनगणना के आंकड़ों पर लगातार निर्भरता पर सवाल उठाया गया। याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 55, 81, 82, 170, 330 और 332 को भी इस हद तक चुनौती दी कि वे 1971 और/या 2001 की जनगणना के जनसंख्या आंकड़ों पर निर्भर रहने की अनुमति देते हैं।

    याचिका में चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) पर भी सवाल उठाया गया। तर्क दिया गया कि यह प्रक्रिया नवीनतम जनगणना के आधार पर परिसीमन किए बिना ही की जा रही है।

    84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 ने राज्यों के बीच लोकसभा और राज्य विधानसभा सीटों के बंटवारे पर 1971 की जनगणना के आधार पर लगी रोक को 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक बढ़ा दिया। हालांकि, इसने प्रत्येक राज्य को आवंटित सीटों की संख्या में बदलाव किए बिना 1991 की जनगणना के आधार पर क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन की अनुमति दी। बाद में 87वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 ने 1991 की जनगणना के संदर्भों को 2001 की जनगणना से बदल दिया। इससे राज्यों के बीच सीटों के बंटवारे पर रोक बरकरार रखते हुए 2001 की जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का परिसीमन संभव हो गया।

    खुद पेश होते हुए याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि एक प्रतिनिधि लोकतंत्र के रूप में भारत को नवीनतम जनसंख्या आंकड़ों के आधार पर राजनीतिक प्रतिनिधित्व तय करना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि पुरानी जनगणना के आंकड़ों पर लगातार निर्भरता का मतलब है कि 1971 के बाद पैदा हुए लगभग 70% भारतीयों को प्रभावी रूप से समान प्रतिनिधित्व से वंचित रखा गया। नोएडा, गुरुग्राम और मोहाली जैसे तेज़ी से बढ़ते शहरी इलाकों का ज़िक्र करते हुए याचिकाकर्ता ने कहा कि इन इलाकों में आबादी बहुत तेज़ी से बढ़ी है, लेकिन संसदीय प्रतिनिधित्व वैसा ही बना हुआ, जिससे घनी आबादी वाले निर्वाचन क्षेत्रों में वोटों की अहमियत कम हो गई।

    हालांकि, बेंच ने इस चुनौती के कानूनी आधार पर सवाल उठाए।

    CJI सूर्य कांत ने कहा,

    "हम समझते हैं कि अगर 70% को बाहर रखा जाए तो फिर परिसीमन कैसा? लेकिन इसका आधार क्या है? वोट देने के अधिकार का परिसीमन से कोई लेना-देना नहीं है।"

    जब याचिकाकर्ता ने बताया कि वह झज्जर से है तो CJI ने कहा कि किसी व्यक्ति का वोट देने का अधिकार सिर्फ़ इसलिए प्रभावित नहीं होता कि कोई गाँव एक निर्वाचन क्षेत्र में आता है या दूसरे में।

    जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि कोई व्यक्ति उस निर्वाचन क्षेत्र से वोट दे सकता है, जहां उसका नाम दर्ज है, चाहे वह वहां का निवासी हो या नहीं।

    CJI ने आगे कहा कि कोई व्यक्ति चुनाव भी लड़ सकता है।

    याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि आबादी बढ़ने से उसके वोट की अहमियत कम हो गई और उसने संविधान के अनुच्छेद 81 का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि हर राज्य की आबादी और उसे आवंटित सीटों की संख्या के बीच का अनुपात, जहां तक संभव हो, एक जैसा रहना चाहिए। उनके अनुसार, संवैधानिक संशोधनों ने इस सिद्धांत को दरकिनार किया, क्योंकि इनमें 1971 और 2001 की जनगणना के आँकड़ों पर ही निर्भर रहने की अनुमति दी गई।

    जस्टिस बागची ने जवाब दिया कि भले ही कुल आबादी के मुकाबले वोट की अहमियत कम हो सकती है, लेकिन "राज्यों के मुकाबले इसकी अहमियत कम नहीं होती।" उन्होंने कहा कि संवैधानिक ढाँचा राज्यों के बीच समानता बनाए रखता है और लोकतंत्र या संघवाद के प्रति असमान दृष्टिकोण नहीं अपनाता।

    बेंच याचिका पर सुनवाई करने के पक्ष में नहीं है।

    CJI सूर्य कांत ने कहा कि उठाए गए मुद्दे ऐसे हैं, जिन पर संबंधित अधिकारी या विधायिका विचार कर सकती है।

    CJI ने याचिकाकर्ता से कहा,

    "अधिकारियों के सामने अपनी बात रखें। जनता के प्रतिनिधि शायद इसमें उस तरह बदलाव करने के बारे में सोचें जैसा आप चाहते हैं।"

    जब याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि केवल सुप्रीम कोर्ट ही संवैधानिक संशोधनों को रद्द कर सकता है तो CJI ने सुझाव दिया कि वह पहले अधिकारियों के सामने अपनी बात रखे।

    उन्होंने कहा,

    "हम यह नहीं कहेंगे कि हम याचिका खारिज कर रहे हैं।"

    इसके बाद याचिकाकर्ता ने याचिका वापस लेने की अनुमति माँगी, जिसे कोर्ट ने मंज़ूर कर लिया।

    Case :NISHANT KHATRI Vs UNION OF INDIA | W.P.(C) No. 737/2026

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