सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान के बाद के चरण में शिकायत मामलों में जमानत देने पर दिशा-निर्देश मांगने वाले वकीलों के समूह की जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार किया

LiveLaw News Network

2 Oct 2021 5:14 PM IST

  • सुप्रीम कोर्ट, दिल्ली
    सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने एक संगठन 'दुर्भावनापूर्ण अभियोजन के खिलाफ वकील' की रिट याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया है। याच‌िका में दिशानिर्देश तैयार करने की मांग गई है, ताकि जांच के दरमियान गिरफ्तार नहीं किए गए आरोपी व्यक्तियों को शिकायतों का संज्ञान लेने पर मजिस्ट्रेट/विशेष न्यायालयों द्वारा हिरासत में भेजे जाने से रोकें।

    कोर्ट ने कहा कि सतिंदर कुमार अंतिल बनाम सीबीआई मामले में चार्जशीट पर संज्ञान लेने के संदर्भ में वह इसी तरह के मुद्दे पर विचार कर रही है। इसलिए कोर्ट ने याचिकाकर्ता-संगठन के वकील सीनियर एडवोकेट डॉ मेनका गुरुस्वामी को सतिंदर कुमार अंतिल केस में पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल को सुझाव देने की छूट दी। उस मामले में अदालत आरोपपत्र दाखिल करने के बाद जांच के दरमियान गिरफ्तार नहीं किए गए आरोपी को जमानत देने के संबंध में दिशानिर्देश निर्धारित करने का प्रस्ताव कर रही है।

    वर्तमान मामले में संगठन "दुर्भावनापूर्ण अभियोजन के खिलाफ वकीलों" ने आग्रह किया कि प्रस्तावित दिशानिर्देश शिकायत मामलों और ईडी, डीआरआई, सीमा शुल्क और एनआईए जैसी एजेंसियों द्वारा विशेष अदालतों के समक्ष मुकदमा चलाने वाले मामलों पर लागू किए जाएं, न कि केवल राज्य पुलिस द्वारा जांच किए गए चार्जशीट मामलों के लिए।

    जस्टिस एसके कौल और जस्टिस एमएम सुंदरेश की बेंच ने याचिका को खारिज करते हुए कहा,

    "चूंकि एसएलपी (सीआरएल) संख्या 5191/2021 में एक बड़े कैनवास पर बहस हो रही है और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल को हमारी सहायता करनी है, सुश्री मेनका गुरुस्वामी को अपने सुझाव विद्वान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल को देने की अनुमति दी जा सकती है। याचिका वापस लिए जाने के रूप में खारिज की जाती है। सुश्री मेनका गुरुस्वामी को विद्वान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल को अपने सुझाव देने के लिए स्वतंत्रता के साथ रिट याचिका को पूर्वोक्त शर्तों के अनुसार खारिज किया जाता है।"

    याचिकाकर्ताओं (दुर्भावनापूर्ण अभियोजन के खिलाफ वकील) के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता नलिनी चिदंबरम और मेनका गुरुस्वामी पेश हुए।

    जब मामले को सुनवाई के लिए बुलाया गया तो पीठ के पीठासीन जज ज‌स्टिस कौल ने टिप्पणी की, "सुश्री चिदंबरम, यह याचिका कैसे उत्पन्न हो सकती है? हमने पहले ही कानून बना दिया है। अब आप चाहते हैं कि हम निर्दिष्ट विशेष के लिए सिद्धांत निर्धारित करें। उनके लिए ईडी जैसी अदालतें पालन करें।"

    जस्टिस कौल द्वारा पूछे गए प्रश्न का उत्तर देने के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता नलिनी चिदंबरम ने सिद्धार्थ बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य में शीर्ष न्यायालय के फैसले पर भरोसा किया, जिसमें न्यायालय ने धारा 170 सीआरपीसी की व्याख्या करते हुए कहा कि पुलिस को चार्जशीट दाखिल होने के बाद प्रत्येक आरोपी को गिरफ्तार करने की आवश्यकता नहीं है।

    यह कहते हुए कि सिद्धार्थ के आदेश ने जांच पूरी होने के बाद जांच के बाद के चरण में सीआरपीसी की धारा 170 के तहत आरोपी की गिरफ्तारी की स्थिति को स्पष्ट किया था, वरिष्ठ वकील ने प्रस्तुत किया कि धारा 200 और 204 सीआरपीसी के मामलों में एक समान स्थिति बनी हुई है, यह उच्च अस्पष्टता के साथ खुला है।

    जस्टिस एसके कौल ने कहा, "हां, हमने किया। जब कोई स्थिति उत्पन्न होती है तो हमें कानून बनाना पड़ता है। जब अस्पष्टता का मामला आता है, तो हमें इसे स्पष्ट करना होगा। हमारे सामने अलग-अलग मामले आ रहे हैं। हम उनमें उनकी स्थिति स्पष्ट करेंगे। यदि हम संघों के इशारे पर इन याचिकाओं पर विचार करें, यह गलत धारणा देगा।"

    याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने सतिंदर कुमार अंतिल बनाम सीबीआई मामले में अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल को अपने सुझाव देने के लिए अदालत की अनुमति मांगी ।

    पीठासीन जज जस्टिस एसके कौल ने वरिष्ठ अधिवक्ता को अपने सुझाव देने की अनुमति देते हुए कहा, "हम कुछ सिद्धांतों को स्थापित करना चाहते हैं। एएसजी ने खुद महसूस किया कि कुछ कानून बनाए जाने की जरूरत है, जिनका समान रूप से पालन किया जा सकता है।"

    याचिकाकर्ता ने अधिवक्ता प्रतीक के चड्ढा के माध्यम से दायर याचिका में तर्क दिया था कि गैर-पुलिस बल द्वारा दायर की गई शिकायतें/अभियोजन शिकायतें सीआरपीसी की धारा 170 और 178 के तहत पुलिस बल द्वारा दायर अंतिम रिपोर्ट की तुलना में कम स्तर पर हैं और यदि जांच एजेंसी ने जांच के दौरान अभियुक्तों को गिरफ्तार नहीं किया था तो अभियुक्तों को न्यायिक हिरासत में भेजना...भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनके अधिकार का उल्लंघन था।

    सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एसके कौल और हृषिकेश रॉय की बेंच ने 28 जुलाई, 2021 को सतिंदर कुमार अंतिल बनाम सीबीआई में सिद्धांत तय करने का फैसला किया था कि क्या कोई व्यक्ति जिसे जांच के दौरान गिरफ्तार नहीं किया गया था, आरोप पत्र दाखिल करने पर उसे सम्मन मिलने पर पेश होने पर हिरासत में भेजा जा सकता है।

    केस शीर्षक : दुर्भावनापूर्ण अभियोजन के खिलाफ वकील बनाम यूनियन ऑफ इंडिया| रिट याचिका (सिविल) संख्या 389/2021

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