'बंगाल में असाधारण स्थिति': जजों के घेराव पर सुप्रीम कोर्ट ने ED से पूछा- आप CM के खिलाफ सामान्य कानूनी उपाय कैसे अपना सकती है?
Shahadat
22 April 2026 8:05 PM IST

हाल की उस घटना का ज़िक्र करते हुए, जिसमें पश्चिम बंगाल में न्यायिक अधिकारियों को उनकी आधिकारिक SIR ड्यूटी करते समय घेर लिया गया था, सुप्रीम कोर्ट ने आज राज्य के इस तर्क पर सवाल उठाया कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) को सीएम ममता बनर्जी द्वारा I-PAC दफ़्तर में उसकी तलाशी में कथित बाधा डालने के मामले में, सामान्य कानूनी उपायों का ही सहारा लेना चाहिए।
जस्टिस मिश्रा ने कहा,
“यह एक असाधारण स्थिति है। दूसरी बेंच के सामने SIR पर बहस चल रही है। हमने ऐसी स्थिति देखी है, जिसमें कई न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाकर रखा गया। अब आप चाहते हैं कि याचिकाकर्ता (ED) मजिस्ट्रेट के पास जाए। हम हकीकत से आँखें नहीं फेर सकते। एक वकील के तौर पर आप हमारे सामने अमूर्त कानूनी सिद्धांतों पर बहस कर सकते हैं, लेकिन हम उस व्यावहारिक स्थिति को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते, जो इस समय राज्य में मौजूद है और घटित हो रही है।”
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ED द्वारा दायर उस रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें तृणमूल कांग्रेस की राजनीतिक सलाहकार संस्था I-PAC के दफ़्तर में तलाशी के दौरान कथित तौर पर बाधा डालने के आरोप में बनर्जी और राज्य पुलिस अधिकारियों के खिलाफ CBI FIR दर्ज करने की मांग की गई। ED अधिकारियों ने भी पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा अपने खिलाफ दर्ज की गई FIR को चुनौती देते हुए रिट याचिकाएं दायर की हैं।
राज्य ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इन याचिकाओं की स्वीकार्यता पर प्रारंभिक आपत्ति जताई।
सीनियर वकील मेनका गुरुस्वामी ने बुधवार को तर्क दिया कि यह विवाद केंद्र और राज्य के बीच का है। इसे अनुच्छेद 131 के तहत एक मुकदमे के रूप में लाया जाना चाहिए।
कोर्ट ने इस दलील से असहमति जताते हुए कहा कि जब कोई मौजूदा मुख्यमंत्री कथित तौर पर चल रही जाँच में दखल देता है तो इसे केवल राज्य और केंद्र के बीच का विवाद मानकर सीमित नहीं किया जा सकता।
इस टिप्पणी पर जवाब देते हुए सीनियर वकील सिद्धार्थ लूथरा ने तर्क दिया कि भले ही ED अधिकारी बाधा डालने का दावा करें, लेकिन कानून में इसके लिए एक पूरी प्रक्रिया मौजूद है। 'साकिरी वासु बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य' मामले में दिए गए फ़ैसले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी पीड़ित व्यक्ति को सबसे पहले धारा 154(3) के तहत पुलिस के पास जाना चाहिए। उसके बाद धारा 156(3) के तहत मजिस्ट्रेट के पास जाना चाहिए। मजिस्ट्रेट FIR दर्ज करने का निर्देश दे सकते हैं और जाँच की निगरानी भी कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था "1860 से आज़माई और परखी हुई" है और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के तहत भी जारी है।
अदालत ने इसके जवाब में हाल की उस घटना का ज़िक्र किया, जिसमें पश्चिम बंगाल में 'विशेष गहन पुनरीक्षण ड्यूटी' के लिए नियुक्त न्यायिक अधिकारियों को घेर लिया गया और उन्हें अपना काम करने से रोक दिया गया।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) की अगुवाई वाली पीठ ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया था।
पिछली सुनवाई में भी अदालत ने यह सवाल उठाया कि क्या ED से यह उम्मीद की जा सकती है कि वह राज्य सरकार से ही कोई समाधान माँगे, जबकि आरोप खुद राज्य की मशीनरी पर ही लगे हों।
जस्टिस मिश्रा ने कहा कि वकील भले ही अमूर्त कानूनी सिद्धांतों पर बहस करें, लेकिन अदालत राज्य की ज़मीनी हकीकत को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि यह मामला असाधारण मुकदमा है, और अदालत मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक वास्तविकताओं को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती।
जस्टिस मिश्रा ने कहा,
"हमें कोई टिप्पणी करने पर मजबूर न करें। कल इसकी रिपोर्ट बनेगी और फिर आप कहेंगे कि अदालत ने चुनावों के बीच में टिप्पणी की। मैं बार-बार कह रहा हूं कि यह सिर्फ़ 'राम बनाम श्याम' का मुकदमा नहीं है। यह असाधारण मुकदमा है, जिसकी रूपरेखा (दायरा) पूरी तरह से अलग है। हम हमेशा कहते हैं कि संविधान एक जीवंत दस्तावेज़ है। हर नई स्थिति अदालत के सामने नए सवाल खड़े करेगी और अदालत को मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए उन सवालों के जवाब देने होंगे।"
इसके जवाब में लूथरा ने यह तर्क दिया कि कानून सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए और यह आरोपी की पहचान पर निर्भर नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि यदि काम में बाधा डालने का आरोप है तो कानूनी ढाँचे में उससे निपटने की प्रक्रिया पहले से ही तय है और अपराधी की हैसियत या प्रकृति बाद के चरण में ही प्रासंगिक होती है।
उन्होंने कहा,
"ऐसा नहीं हो सकता कि 'मुझे व्यक्ति दिखाओ और मैं तुम्हें कानून दिखाऊंगा।' जैसा कि आप (जज) हमें बार-बार याद दिलाते हैं, स्थिति ऐसी नहीं हो सकती। कानून को एक जैसा होना चाहिए। आप लोग (जज) दिन-रात यही तो करते हैं। जैसा कि मैंने कहा, हममें से कुछ लोग खुशी-खुशी लौटेंगे, कुछ लोग शायद उतनी खुशी से न लौटें, लेकिन हम सभी इस संतोष के साथ लौटेंगे कि कानून का पालन हुआ है।"
Case Title – Directorate of Enforcement and Anr. v. State of West Bengal and Ors.

