“क्या यह जेम्स बॉन्ड है—पहले गोली, बाद में सोचना?”: ज़ी मीडिया शिकायत पर जल्दबाज़ी में FIR दर्ज करने पर सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान पुलिस को फटकार

Praveen Mishra

27 Feb 2026 4:13 PM IST

  • “क्या यह जेम्स बॉन्ड है—पहले गोली, बाद में सोचना?”: ज़ी मीडिया शिकायत पर जल्दबाज़ी में FIR दर्ज करने पर सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान पुलिस को फटकार

    राजस्थान पुलिस की कार्रवाई पर कड़ी नाराज़गी जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आज ज़ी राजस्थान के पूर्व चैनल हेड आशीष दवे के खिलाफ दर्ज जबरन वसूली (एक्सटॉर्शन) की FIR को रद्द कर दिया। यह FIR ज़ी मीडिया कंपनी की शिकायत पर दर्ज की गई थी।

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने आशीष दवे की याचिका स्वीकार करते हुए यह आदेश पारित किया। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ अग्रवाल, राज्य की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस.डी. संजय तथा शिकायतकर्ता (ज़ी मीडिया की ओर से संजू राजू) की ओर से सीनियर एडवोकेट संजय जैन उपस्थित हुए।

    खंडपीठ ने FIR दर्ज करने के तरीके पर “हैरानी” जताते हुए कहा कि आरोप केवल एक “कहानी” जैसे हैं। जस्टिस मेहता ने कहा, “हम इस बात से स्तब्ध हैं कि FIR कैसे दर्ज की गई। जांच अधिकारी को पहले जांच करनी चाहिए थी, आरोपों की पुष्टि करनी चाहिए थी, उसके बाद FIR दर्ज होती। ललिता कुमारी मामला सब पर लागू होता है। FIR में जबरन वसूली या पद के दुरुपयोग का कोई ठोस आरोप ही नहीं है — यह सब एक काल्पनिक कहानी जैसा है।”

    जस्टिस विक्रम नाथ ने भी कहा कि आरोप अत्यंत अस्पष्ट और सामान्य प्रकृति के हैं।

    राज्य की कड़ी आलोचना करते हुए न्यायमूर्ति मेहता ने कहा कि FIR केवल इसलिए दर्ज की गई क्योंकि शिकायतकर्ता एक प्रभावशाली संस्था है। उन्होंने कहा, “यदि कोई सामान्य नागरिक ऐसी शिकायत लेकर थाने जाता, तो क्या आप FIR दर्ज करते? उसमें कुछ भी ठोस नहीं था। सिर्फ इसलिए कि शिकायतकर्ता प्रभावशाली है, तुरंत FIR दर्ज कर दी गई। आम आदमी को तो ऐसे आरोपों पर थाने से भगा दिया जाता।”

    जब ASG ने कहा कि जांच के दौरान सामग्री एकत्र की गई और कई बिल्डरों, डॉक्टरों आदि ने वसूली की शिकायत की थी, तो खंडपीठ ने पूछा कि FIR या राज्य के जवाब में एक भी कथित पीड़ित का नाम क्यों नहीं है। जस्टिस मेहता ने कहा, “एक भी व्यक्ति का नाम बताइए जिसे ठगा या जिससे वसूली की गई।”

    ASG ने बताया कि वह केस डायरी सीलबंद लिफाफे में लाए हैं, लेकिन पीठ ने उसे देखने से इनकार कर दिया और पूछा कि FIR दर्ज करने की इतनी जल्दबाज़ी क्यों की गई।

    जब ASG ने कहा कि पीड़ित डर के कारण सामने नहीं आए, तो जस्टीस मेहता ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “यह आपके पुलिस तंत्र पर ही टिप्पणी है।”

    FIR रद्द करते हुए खंडपीठ ने कहा कि यदि राज्य चाहे तो ठोस तथ्यों के साथ नई FIR दर्ज कर सकता है। जस्टिस नाथ ने कहा, “ऐसी FIR को रद्द किया जाना चाहिए था। यदि कोई वास्तविक पीड़ित है, तो वही शिकायत दर्ज कराए।”

    संक्षेप में, शिकायतकर्ता ज़ी मीडिया का आरोप था कि आशीष दवे ने चैनल हेड के पद का दुरुपयोग करते हुए कई लोगों को धमकाकर या उनसे धन उगाही की, जिसकी कई शिकायतें कंपनी को मिलीं। इन्हीं शिकायतों के आधार पर FIR दर्ज की गई थी।

    दूसरी ओर, याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि कथित वसूली का कोई भी पीड़ित सामने नहीं आया है और न ही संपत्ति के किसी सुपुर्दगी (entrustment) का प्रमाण है, इसलिए आपराधिक विश्वासघात का मामला भी नहीं बनता।

    इससे पहले नवंबर 2025 में राजस्थान हाई कोर्ट ने FIR रद्द करने से इनकार करते हुए कहा था कि मीडिया पेशेवरों से अपेक्षा की जाती है कि वे धमकी या वसूली के माध्यम से किसी को नुकसान न पहुँचाएँ। हाई कोर्ट ने यह भी कहा था कि याचिकाकर्ता पर कई आरोप हैं कि उन्होंने अपनी स्थिति का दुरुपयोग करते हुए विक्रेताओं से नकारात्मक खबर प्रसारित करने की धमकी देकर धन की मांग की।

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