'हैरान करने वाला': सुप्रीम कोर्ट ने हत्या की सज़ा को अस्पष्ट और हल्के-फुल्के तरीके से कम करने पर एमपी हाईकोर्ट से सवाल किया

  • हैरान करने वाला: सुप्रीम कोर्ट ने हत्या की सज़ा को अस्पष्ट और हल्के-फुल्के तरीके से कम करने पर एमपी हाईकोर्ट से सवाल किया

    सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (8 अक्टूबर) को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस फ़ैसले पर सवाल उठाया, जिसमें पत्नी की हत्या के लिए IPC की धारा 302 के तहत दोषी ठहराए गए व्यक्ति की सज़ा को IPC की धारा 304 के पार्ट II के तहत 'गैर-इरादतन हत्या' (जो हत्या की श्रेणी में नहीं आती) में बदल दिया गया।

    जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने पाया कि हाईकोर्ट ने सबूतों पर "बहुत अस्पष्ट" और "बहुत हल्के-फुल्के" तरीके से विचार किया और मृतका की बहन के सबूतों को नज़रअंदाज़ किया, जो कथित मौखिक 'मरते समय दिए गए बयान' (डाइंग डिक्लेरेशन) की एक अहम गवाह है।

    ट्रायल कोर्ट ने अपील करने वाले आरोपी को अपनी पत्नी की हत्या का दोषी ठहराया और उसे उम्रकैद की सज़ा सुनाई। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि उसने 28 दिसंबर, 2021 को महिला पर हमला किया, जिसके बाद उसके सिर में गंभीर चोटें आईं और 30 दिसंबर को उसकी मौत हो गई।

    इसके बावजूद कि मृतका ने कथित तौर पर अपने पिता और बहन को बताया कि उसके पति ने मामूली घरेलू मुद्दों पर बेरहमी से उसके साथ मारपीट की थी, हाईकोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से मंज़ूर करते हुए IPC की धारा 300 के अपवाद 4 (Exception 4) का इस्तेमाल करके सज़ा को IPC की धारा 304 पार्ट II में बदल दिया।

    इस तर्क पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

    "हैरानी की बात है कि हाईकोर्ट ने IPC की धारा 302 से सज़ा को धारा 304 पार्ट II में बदलकर अपील आंशिक रूप से मंज़ूर करना सही समझा। हाईकोर्ट की राय में यह मामला IPC की धारा 300 के अपवाद 4 के दायरे में आता था... अगर थोड़ी देर के लिए यह मान भी लिया जाए कि हाईकोर्ट का यह मानना ​​था कि मामला धारा 300 के अपवाद 4 के तहत आता है, तो भी हमारी समझ में यह नहीं आता कि सज़ा IPC की धारा 304 पार्ट II के तहत कैसे हो सकती थी।"

    कोर्ट ने आगे कहा,

    "ज़्यादा-से-ज़्यादा सज़ा IPC की धारा 304 पार्ट I के तहत हो सकती थी।"

    कोर्ट ने आगे कहा कि इस मामले को IPC की धारा 300 के अपवाद 4 के दायरे में लाने का "कोई सवाल ही नहीं" उठता और वह हत्या के मामले में ट्रायल कोर्ट की सज़ा बहाल करने पर विचार करने के पक्ष में है।

    इसके अनुसार, कोर्ट ने आरोपी को नोटिस जारी किया, जिसका जवाब 18 नवंबर, 2026 तक देना है। इसमें आरोपी से कारण बताने को कहा गया है कि हत्या के मामले में उसकी सज़ा को क्यों न बहाल किया जाए।

    Case Title : RAMPAL PARTETI VERSUS THE STATE OF MADHYA PRADESH

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