सुप्रीम कोर्ट ने दूसरे धर्म में शादी करने वाली पारसी महिलाओं को समाज से बाहर करने पर उठाया सवाल

Shahadat

5 May 2026 8:15 PM IST

  • सुप्रीम कोर्ट ने दूसरे धर्म में शादी करने वाली पारसी महिलाओं को समाज से बाहर करने पर उठाया सवाल

    सबरीमाला मामले की सुनवाई के 11वें दिन सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि पारसी लोगों द्वारा अपनाई जाने वाली यह प्रथा—जिसमें किसी पारसी महिला को अगर वह अपने धर्म के बाहर शादी करती है तो अग्नि मंदिर (अगीआरी) में प्रवेश करने से रोक दिया जाता है—प्रथम दृष्टया समाज से बाहर करना है, जो पूरी तरह से लिंग-आधारित और भेदभावपूर्ण है।

    जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने ये टिप्पणियां सीनियर वकील डेरियस जे. खंबाटा की दलीलों के दौरान कीं। खंबाटा उन याचिकाओं के समूह में याचिकाकर्ता गुलरुख गुप्ता का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जो पारसी महिला की धार्मिक पहचान से संबंधित हैं।

    गुप्ता जन्म से पारसी महिला हैं। उन्होंने विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (SMA) के तहत एक हिंदू पुरुष से शादी की और अपने धर्म का पालन करना जारी रखा। हालांकि, गुजरात में वलसाड पारसी अंजुमन ट्रस्ट ने उन्हें मंदिर में प्रवेश करने और अपने माता-पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होने से रोक दिया।

    उन्होंने एक रिट याचिका के ज़रिए गुजरात हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, जिसने 2012 में इस प्रथा को सही ठहराते हुए यह टिप्पणी की कि शादी के बाद महिला की धार्मिक पहचान उसके पति की पहचान में विलीन हो जाती है। यानी, 'कवरेचर' (Coverture) का सामान्य कानून सिद्धांत लागू होता है। साथ ही अपने धर्म के बाहर शादी करने पर वह पारसी नहीं रह जाती।

    हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली उनकी याचिका को सबरीमाला मामले के साथ जोड़ दिया गया और यह नौ जजों की पीठ के सामने सुनवाई के लिए आई।

    खंबाटा ने दलील दी कि पारसी धर्म एक बहुत ही प्रगतिशील धर्म है। यह प्रथा वास्तव में इंसानों द्वारा बनाई गई है। यही कारण है कि ऐसा कोई भी धार्मिक ग्रंथ मिलना मुश्किल है जो इस दावे का समर्थन करता हो।

    जस्टिस नागरत्ना ने पूछा:

    "तो क्या भेदभाव का आधार शादी है, और वह भी सिर्फ़ महिला के मामले में?"

    खंबाटा ने जवाब दिया कि अगर कोई पारसी पुरुष अपने धर्म के बाहर शादी करता है तो उसे और उसके परिवार को सभी अधिकार मिलते रहते हैं, जिसमें अग्नि मंदिर में प्रवेश करने का अधिकार भी शामिल है। लेकिन यह समाज से बाहर करने की प्रथा सिर्फ़ महिलाओं के लिए है। इसका असर उनके परिवार पर भी पड़ता है। उन्होंने इस संबंध में बॉम्बे हाईकोर्ट के फ़ैसले का हवाला दिया।

    उन्होंने आगे कहा कि भारत में पारसी महिलाओं को रोकने की कोई एक जैसी प्रथा नहीं है, क्योंकि अलग-अलग धार्मिक ट्रस्ट अलग-अलग प्रथाओं का पालन करते हैं।

    "याचिकाकर्ता ट्रस्ट ने अपने पिछले ट्रस्टियों के तहत अंतर-विवाह करने वाली पारसी महिलाओं को मंदिरों और पूजा स्थलों में प्रवेश की पूरी आज़ादी दी थी। बॉम्बे पारसी ट्रस्ट ने खुद 1991 में प्रस्ताव पारित किया, जिसमें महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी गई। हमने ऐसे दस्तावेज़ पेश किए, जिनसे पता चलता है कि पूरे भारत में कई अंजुमन महिलाओं को प्रवेश की अनुमति देते हैं। वलसाड ने अचानक नए ट्रस्टी के आने पर यह तय किया कि हम इस मामले पर अपने निजी विचार और पसंद-नापसंद थोपेंगे।"

    खंबाटा ने कोर्ट को बताया कि पारसी महिला को ज़ोरोस्ट्रियन धर्म से संबंधित अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए सक्षम कोर्ट से एक घोषणा (Declaration) लेनी होगी।

    जस्टिस बागची ने कहा कि "मानित धर्मांतरण" (Deemed Conversion) का पहलू कॉमन लॉ के 'कर्वचर' (Coverture) सिद्धांत में झलकता है - जिसका अर्थ है कि शादी के बाद महिला की पहचान पुरुष की पहचान में विलीन हो जाती है।

    वहीं जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि यह एक तरह से समाज से बहिष्कृत करने (Excommunication) जैसा लगता है।

    उन्होंने ज़ोर देकर कहा,

    "अनुच्छेद 25(1) के तहत अंतरात्मा की स्वतंत्रता का अधिकार जन्म से प्राप्त अधिकार है। इसे शादी के आधार पर छीना नहीं जा सकता... इस मामले में वर्गीकरण के आधार के रूप में शादी को चुनना महिलाओं के साथ भेदभाव है।"

    इस बात से सहमत होते हुए जस्टिस सुंदरेश ने कहा:

    "यह प्रथा यह मानकर चलती है कि एक बार अंतर-विवाह हो जाने पर व्यक्ति अपना धर्म छोड़ देता है।"

    इस पर जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की:

    "यह असल में समाज से बहिष्कृत करने जैसा ही है।"

    इन सवालों के जवाब में खंबाटा ने कहा कि यह SMA (विशेष विवाह अधिनियम) के तहत किया जा रहा है, जो अनुच्छेद 25(2)(b) के अंतर्गत आने वाला एक सुधारवादी कानून है, जिसका उद्देश्य ऐसी प्रथाओं को रोकना है।

    जस्टिस नागरत्ना ने सवाल उठाया कि पारसी पुरुष द्वारा दूसरे धर्म की महिला से शादी करने पर उसके बच्चों को तो सभी लाभ मिलते हैं, लेकिन एक पारसी महिला को क्यों नहीं?

    उन्होंने आगे कहा,

    "उसे [महिला को] अपना धर्म जन्म से मिला है, तो शादी के आधार पर इसे उससे कैसे छीना जा सकता है?"

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने भी अपने विचार साझा किए और कहा कि यह मामला SMA की धारा 19 (अविभाजित परिवार के सदस्य पर विवाह का प्रभाव) सपठित धारा 21 (इस अधिनियम के तहत विवाह करने वाले पक्षों की संपत्ति का उत्तराधिकार) और धारा 21A (कुछ मामलों में विशेष प्रावधान) के तहत सुरक्षित है।

    "आप जिस मुद्दे को उठा रहे हैं, हो सकता है कि उसका जवाब देना ज़रूरी न हो, क्योंकि धारा 19 और 21A के अनुसार, इससे ज़्यादा कुछ और ज़रूरी नहीं है। आपका सबसे सीधा तर्क यह होगा कि बहुमत का फ़ैसला धारा 19, 21 और 21A के तहत बनी कानूनी व्यवस्था के विपरीत है। यह कानून अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत सुरक्षित है। धर्म से जुड़े ये कानूनी नियम सिर्फ़ हिंदुओं और उनके उन सहयोगियों पर लागू होते हैं, जिनका ज़िक्र इस कानून में साफ़ तौर पर किया गया। इसलिए अगर कोई पारसी, मुस्लिम या ईसाई शादी करता है तो वह अपनी धार्मिक पहचान नहीं खोता।"

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