सुप्रीम कोर्ट ने पेंडिंग क्रिमिनल केस वाले वकील के एनरोलमेंट का विरोध करने पर BCI को लगाई फटकार

Shahadat

20 July 2026 3:56 PM IST

  • सुप्रीम कोर्ट ने पेंडिंग क्रिमिनल केस वाले वकील के एनरोलमेंट का विरोध करने पर BCI को लगाई फटकार

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को उन लॉ ग्रेजुएट्स के एनरोलमेंट का विरोध करने के लिए फटकार लगाई, जिन पर क्रिमिनल केस चल रहे हैं। कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि बड़ी चिंता यह है कि BCI गैरेज में चल रहे लॉ कॉलेजों को मान्यता देता है, जबकि ऐसे एनरोलमेंट को रोकने वाला कोई कानूनी प्रावधान नहीं बता पाता।

    जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और आर. महादेवन की बेंच के.आर. सुदर्शन की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। सुदर्शन एक चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं, जिन्होंने बाद में लॉ की डिग्री हासिल की, लेकिन तमिलनाडु और पुडुचेरी बार काउंसिल ने उन्हें वकील के तौर पर एनरोल करने से मना किया, क्योंकि उनके खिलाफ एक क्रिमिनल केस पेंडिंग है।

    मद्रास हाईकोर्ट ने 2015 में सिंगल जज के ज़रिए BCI को निर्देश दिया कि यह सुनिश्चित किया जाए कि पेंडिंग क्रिमिनल केस वाले लॉ ग्रेजुएट्स को वकील के तौर पर एनरोल न किया जाए। बाद में एक दूसरे मामले में फुल बेंच ने इस निर्देश को एक अस्थायी उपाय के तौर पर सही ठहराया, जो संसद द्वारा कानून में संशोधन किए जाने तक लागू रहना था।

    इस साल की शुरुआत में मद्रास हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच ने उस नज़रिए की सही-गलत जांच के लिए मामले को एक बड़ी बेंच के पास भेजा। बेंच ने पाया कि एडवोकेट्स एक्ट हाईकोर्ट को सेक्शन 24A में बताई गई अयोग्यता के अलावा एनरोलमेंट के लिए कोई अतिरिक्त अयोग्यता तय करने का अधिकार नहीं देता है।

    सुदर्शन की ओर से सीनियर एडवोकेट निखिल गोयल ने कहा कि याचिकाकर्ता ने फुल बेंच के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और एनरोलमेंट के लिए रिट याचिका भी दायर की। उन्होंने कोर्ट को बताया कि मद्रास हाईकोर्ट ने तब से इस मुद्दे को पांच जजों की बेंच के पास भेज दिया।

    गोयल ने यह भी बताया कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के दोषियों में से एक, जिसने 31 साल की जेल की सज़ा काटी थी, उसे अप्रैल 2026 में वकील के तौर पर एनरोल किया गया। याचिकाकर्ता के खिलाफ कम गंभीर आरोपों की तुलना करते हुए, गोयल ने याचिकाकर्ता के लिए अंतरिम राहत की मांग की।

    उन्होंने कहा,

    "मैं 50 साल का चार्टर्ड अकाउंटेंट हूं। मुझ पर आरोप है कि मैंने एक ऐसी कंपनी को सलाह दी, जो वित्तीय अनियमितता में शामिल थी। वे मेरे एनरोलमेंट का पुरज़ोर विरोध कर रहे हैं। अंतरिम उपाय के तौर पर मुझे एनरोल होने दिया जाए। पांच जजों की बेंच कब फैसला करेगी, यह हमें नहीं पता।"

    बार काउंसिल के रुख पर सवाल उठाते हुए जस्टिस मेहता ने BCI की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट एस. गुरुकृष्णकुमार से पूछा कि एनरोलमेंट (पंजीकरण) से इनकार क्यों किया गया।

    गुरुकृष्णकुमार ने मद्रास हाईकोर्ट के निर्देशों का हवाला दिया। साथ ही यह भी माना कि धारा 24A में लंबित आपराधिक मामले के कारण अयोग्य ठहराने का कोई प्रावधान नहीं है।

    जस्टिस मेहता ने कहा कि यह प्रतिबंध कानून के दायरे से बाहर है।

    उन्होंने टिप्पणी की,

    "सर, आप तो हर जगह दोषियों का एनरोलमेंट कर रहे हैं... पूरे देश में।"

    कोर्ट ने तमिलनाडु और पुडुचेरी की बार काउंसिल को निर्देश दिया कि वह सुदर्शन का अस्थायी एनरोलमेंट करें और दो हफ़्ते के भीतर उनका एनरोलमेंट सर्टिफिकेट जारी करें। कोर्ट ने BCI और स्टेट बार काउंसिल को अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए दो महीने का समय दिया और उसके बाद याचिकाकर्ता को जवाब (रिज़ॉइंडर) दाखिल करने के लिए एक महीने का समय दिया।

    आदेश लिखवाने के बाद जस्टिस मेहता ने मौखिक रूप से यह भी कहा,

    "हम अभी इसकी इजाज़त दे सकते हैं। यह आदेश पूरी तरह से कानून के खिलाफ है।"

    जब गुरुकृष्णकुमार ने कहा कि इसमें एक "बड़ी चिंता" शामिल है तो जस्टिस मेहता ने जवाब दिया कि असली बड़ी चिंता तो यह है कि BCI उन कॉलेजों को मान्यता दे रहा है जो गैरेज में चल रहे हैं।

    उन्होंने कहा,

    "BCI जो गैरेज में चलने वाले कॉलेजों को मान्यता देती है, वही बड़ी चिंता का विषय है।"

    इसके बाद जस्टिस विक्रम नाथ ने तंज कसते हुए कहा,

    "आप तुरंत कोर्ट से चले जाइए, वरना आप और बड़ी मुसीबत में पड़ जाएंगे।"

    Case Title – K.R. Sudersan v. Bar Council of Tamil Nadu and Pondicherry

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