ज़मीन आवंटन मामले में BJP नेता को राहत, सुप्रीम कोर्ट ने 'राजनीतिक रूप से प्रेरित' बताते हुए मामला किया खारिज

  • ज़मीन आवंटन मामले में BJP नेता को राहत, सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए मामला किया खारिज

    सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (16 दिसंबर) को कर्नाटक के विपक्ष के नेता और भारतीय जनता पार्टी (BJP) विधायक आर. अशोक के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला रद्द कर दिया। यह मामला अवैध कब्ज़ों को नियमित करने वाली कमेटी के चेयरमैन के तौर पर उनके कार्यकाल के दौरान ज़मीन आवंटन में कथित अनियमितताओं से जुड़ा था।

    राज्य के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने श्री अशोक की कमेटी के कार्यकाल के दौरान ज़मीन आवंटन में हुई कथित गड़बड़ियों की जांच के लिए एक FIR दर्ज की थी। इसमें शिकायत की गई कि उनके कार्यकाल के दौरान SC/ST और गरीबों के लिए सरकारी ज़मीन का अवैध आवंटन उनके परिवार के सदस्यों, राजनीतिक समर्थकों और पार्षदों को किया गया।

    FIR रद्द करने से इनकार करने के हाईकोर्ट के फैसले से नाराज़ होकर अशोक सुप्रीम कोर्ट गए।

    हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए जस्टिस संजय करोल और विपुल एम. पंचोली की बेंच ने पाया कि अपीलकर्ता, जो एक सरकारी कर्मचारी हैं, उनके खिलाफ शुरू की गई कार्यवाही राज्य सरकार से मंज़ूरी आदेश लिए बिना की गई।

    कोर्ट ने कहा,

    "मामले को ज़्यादा लंबा न खींचते हुए यह देखा गया कि रिकॉर्ड में अपीलकर्ता के खिलाफ किसी भी मंज़ूरी के बारे में कोई ज़िक्र नहीं है। चूंकि ऐसी मंज़ूरी के बिना कोई जांच शुरू नहीं हो सकती थी, इसलिए ACB की शुरुआती रिपोर्ट, उसके बाद की FIR और उसके बाद की सभी कार्यवाही एक स्पष्ट रोक के बावजूद की गईं।"

    जस्टिस करोल द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि अपीलकर्ता के खिलाफ कार्यवाही गलत इरादे और दुर्भावना से प्रेरित थी। ऐसा इसलिए था, क्योंकि लोकायुक्त द्वारा दो बार अपीलकर्ता के खिलाफ आगे बढ़ने के लिए अपर्याप्त सबूत पाए जाने के बावजूद, पुरानी शिकायतों को फिर से पेश करके यह FIR दर्ज की गई।

    आगे कहा गया,

    "अपीलकर्ता के खिलाफ कार्रवाई पहली नज़र में राजनीतिक रूप से प्रेरित और दुर्भावना से ग्रस्त लगती है, भले ही देरी को नज़रअंदाज़ कर दिया जाए, कानून की नज़र में अपीलकर्ता पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता था। मौजूदा तथ्यों में, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि एक ही और समान आरोपों वाली तीन शिकायतें की गई और दो मौकों पर लोकायुक्त ने... आगे बढ़ने के लिए किसी भी सबूत की कमी पाई।"

    संक्षेप में, फैसले में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि एक सक्षम अर्ध-न्यायिक निकाय (लोकायुक्त) द्वारा बरी किए जाने के फैसले को नए विश्वसनीय सबूतों के बिना हल्के में नहीं पलटा जाना चाहिए।

    अपील स्वीकार कर ली गई।

    Cause Title: R. ASHOKA Versus STATE OF KARNATAKA & ORS.

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