पसमांदा मुसलमानों को OBC आरक्षण देने की मांग पर सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट

Praveen Mishra

23 Feb 2026 3:27 PM IST

  • पसमांदा मुसलमानों को OBC आरक्षण देने की मांग पर सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है, जिसमें 'पसमांदा मुसलमानों' को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) श्रेणी के तहत आरक्षण देने की मांग की गई है। चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने सोमवार को इस याचिका पर संक्षिप्त सुनवाई की। यह याचिका मोहम्मद वसीम सैफी द्वारा दायर की गई है, जिसमें रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफारिशों के आधार पर OBC के भीतर उप-वर्गीकरण कर पसमांदा मुसलमानों को 10% आरक्षण देने की मांग की गई है।

    सुनवाई के दौरान चीफ़ जस्टिस ने सवाल उठाया कि अन्य मुस्लिम OBC समुदायों का क्या होगा, क्योंकि OBC केवल सामाजिक ही नहीं बल्कि आर्थिक मानदंडों पर भी आधारित है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अंजना प्रकाश ने बताया कि भारत में मुसलमानों को broadly तीन वर्गों में बांटा जाता है— अशरफ (उच्च वर्ग), अज्लाफ और अर्सल (निम्न वर्ग)। उन्होंने कहा कि अशरफ वर्ग का संबंध पारंपरिक रूप से विदेशी वंश से माना जाता है।

    एडवोकेट ने अनुरोध किया कि इस याचिका को एक अन्य लंबित मामले — “स्टेट ऑफ आंध्र प्रदेश बनाम बी. अर्चना रेड्डी” — के साथ जोड़ा जाए, जिसमें संविधान पीठ यह तय कर रही है कि क्या आंध्र प्रदेश में मुसलमानों को सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग के रूप में 4% आरक्षण दिया जा सकता है। यह मामला 2005 के उस कानून से जुड़ा है, जिसे आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था।

    चीफ़ जस्टिस ने कहा कि पहले यह देखना होगा कि क्या पसमांदा मुसलमान ही एकमात्र पिछड़ा वर्ग हैं या नहीं। उन्होंने टिप्पणी की कि अन्य गरीब मुसलमानों की कीमत पर केवल एक समूह को बढ़ावा देना उचित नहीं होगा और इस संबंध में ठोस आंकड़ों की आवश्यकता है। इसके बाद याचिकाकर्ता ने अदालत से समय मांगा ताकि वह इस मुद्दे पर विस्तृत नोट दाखिल कर सके। अदालत ने मामले को चार सप्ताह बाद के लिए सूचीबद्ध कर दिया।

    पसमांदा मुसलमानों के लिए आरक्षण की मांग क्यों?

    याचिका में 2006 की सच्चर समिति रिपोर्ट का हवाला दिया गया है, जो न्यायमूर्ति राजिंदर सच्चर की अध्यक्षता में गठित की गई थी। इस समिति ने भारत में मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति का अध्ययन किया था। याचिका के अनुसार 'पसमांदा मुसलमान' शब्द उन मुस्लिम समुदायों के लिए प्रयोग होता है जो पिछड़े (अज्लाफ) और दलित (अर्सल) वर्ग से आते हैं। इनमें कारीगर, बुनकर, कसाई और सफाई कर्मी जैसे पारंपरिक पेशों से जुड़े लोग शामिल हैं, जो सामाजिक रूप से हाशिये पर हैं।

    याचिका में बताया गया कि मुस्लिम समाज भी आंतरिक रूप से स्तरीकृत है—

    अशरफ : उच्च वर्ग (सैयद, पठान, मुगल आदि)

    अज्लाफ : OBC मुस्लिम (कारीगर एवं पेशागत जातियां)

    अर्सल : दलित मुस्लिम (परंपरागत रूप से 'अस्वच्छ' या श्रमसाध्य कार्यों से जुड़े)

    दावा किया गया है कि पसमांदा मुसलमान भारत की कुल मुस्लिम आबादी का लगभग 80–85% हैं, लेकिन शिक्षा, रोजगार, राजनीति और धार्मिक संस्थाओं में उनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है, जबकि प्रभावशाली पदों पर अशरफ वर्ग का वर्चस्व है।

    याचिका में सच्चर समिति की प्रमुख सिफारिशों का भी उल्लेख किया गया है, जिनमें अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव की निगरानी के लिए समान अवसर आयोग (Equal Opportunity Commission) बनाने और मुस्लिम समुदाय के विभिन्न वर्गों के लिए अलग-अलग प्रकार की सकारात्मक कार्रवाई (affirmative action) की आवश्यकता बताई गई थी।

    इसके अलावा 2007 में गठित रंगनाथ मिश्रा आयोग (राष्ट्रीय धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक आयोग) की सिफारिशों का भी हवाला दिया गया है, जिसमें धार्मिक अल्पसंख्यकों के पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का सुझाव दिया गया था।

    याचिका में मांगी गई प्रमुख राहतें

    याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि—

    केंद्र सरकार को सच्चर समिति की सिफारिशें लागू करने का निर्देश दिया जाए।

    रंगनाथ मिश्रा आयोग के अनुसार पसमांदा मुसलमानों को 10% आरक्षण दिया जाए।

    OBC के भीतर उप-वर्गीकरण कर पसमांदा मुसलमानों की पहचान और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए वैधानिक आयोग गठित किया जाए।

    यह याचिका एडवोकेट विजय कसाना की सहायता से दायर की गई है।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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