गुजरात में गो-हत्या के मामले में आरोपी व्यक्ति की कस्टडी में मौत का मामला: सुप्रीम कोर्ट ने दिया FIR दर्ज करने और SIT से जांच कराने का आदेश

Shahadat

23 July 2026 8:16 PM IST

  • गुजरात में गो-हत्या के मामले में आरोपी व्यक्ति की कस्टडी में मौत का मामला: सुप्रीम कोर्ट ने दिया FIR दर्ज करने और SIT से जांच कराने का आदेश

    सुप्रीम कोर्ट ने उस व्यक्ति की मौत के मामले में FIR दर्ज करने और स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) से जांच कराने का आदेश दिया, जिसकी मौत गुजरात पुलिस की कस्टडी में हुई। उस व्यक्ति पर गो-हत्या का मामला दर्ज किया गया। मृतक के बेटे का दावा है कि उसके पिता की मौत 100 एंटी-डायबिटीज गोलियां खाने से हुई और वह मरने से पहले दिए गए बयान (डाइंग डिक्लेरेशन) का हवाला देता है।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने याचिकाकर्ता (मृतक के बेटे) की ओर से सीनियर एडवोकेट आई.एच. सैयद की दलीलें सुनने के बाद यह निर्देश जारी किया। याचिकाकर्ता के अनुरोध पर, बेंच ने पुलिस कमिश्नर को खतरे का आकलन करने और याचिकाकर्ता की सुरक्षा के लिए उचित कदम उठाने का भी आदेश दिया।

    कोर्ट ने निर्देश दिया कि SIT द्वारा जांच की जाने वाली FIR शुरू में बिना किसी संदिग्ध का नाम लिए दर्ज की जाए। संबंधित प्रावधानों के तहत इसे अप्राकृतिक मौत के नजरिए से देखा जाएगा। SIT को जल्द-से-जल्द और अधिमानतः 3 महीने के भीतर संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष अंतिम रिपोर्ट पेश करनी होगी।

    कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह छूट भी दी कि अगर वह SIT की जांच से संतुष्ट नहीं है तो वह प्रोटेस्ट पिटीशन दायर कर सकता है या आगे की जांच की मांग कर सकता है।

    जस्टिस बागची ने ASG एस.वी. राजू (गुजरात सरकार की ओर से) से कहा,

    "वह बेटा है। उसका मन संतुष्ट होना चाहिए।"

    बता दें, याचिकाकर्ता ने शुरू में गुजरात हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और आरोप लगाया कि 19 मई को उसके पिता को इलाज के लिए सोला सिविल अस्पताल ले जाया गया, लेकिन ICU बेड उपलब्ध न होने के कारण उन्हें दूसरे अस्पताल रेफर किया गया। जब परिजन उन्हें सरदार वल्लभभाई पटेल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च ले गए तो कुछ घंटों बाद याचिकाकर्ता के पिता की मौत हो गई।

    रिपोर्ट के अनुसार, मृतक को 18 मई को BNS, गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के तहत दर्ज FIR में गिरफ्तार किया गया। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि पुलिस कस्टडी के दौरान मृतक के साथ मारपीट की गई और उसे अज्ञात पदार्थ दिए गए।

    20 मई को SDM-सह-डिप्टी कलेक्टर, अहमदाबाद शहर (पश्चिम) द्वारा शाम 4:05 बजे से 4:40 बजे के बीच जांच की कार्यवाही (इनक्वेस्ट प्रोसीडिंग) की गई। इसके अलावा, मिर्जापुर में अहमदाबाद ग्रामीण के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को भी हिरासत में मृतक की मौत के बारे में सूचित किया गया।

    याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि मेडिको-लीगल रिकॉर्ड से पता चलता है कि घटना वेजलपुर पुलिस स्टेशन में हुई और इसमें पोस्टमार्टम जांच की सिफारिश भी शामिल थी, जिससे याचिकाकर्ता के अनुसार, संज्ञेय अपराध (cognizable offence) का पता चलता है, जिसके लिए तुरंत FIR दर्ज करना ज़रूरी है।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने तुरंत FIR दर्ज करने से इनकार किया और याचिकाकर्ता के लिए BNSS के तहत अन्य उपाय अपनाने का रास्ता खुला रखा। ऐसा करते हुए कोर्ट ने कहा कि हालांकि सुप्रीम कोर्ट के ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के फैसले में संज्ञेय अपराध का पता चलने पर FIR दर्ज करना अनिवार्य है, लेकिन अगर पुलिस FIR दर्ज करने से इनकार करती है तो इसके लिए कोई अलग तरीका नहीं बताया गया, और न ही ऐसा कोई नियम है कि FIR दर्ज न होने पर पीड़ित के परिजन सीधे हाईकोर्ट के अनुच्छेद 226 के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल कर सकते हैं।

    इससे असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। उनकी ओर से सीनियर एडवोकेट IH सैयद ने तर्क दिया कि मृतक को पुलिस ने 16 मई को उठाया और पुलिस हिरासत के 4 दिनों के भीतर 20 मई को उसकी मौत हो गई। उन्होंने वीडियो पर दर्ज मरणासन्न बयान (dying declaration) का हवाला दिया और आरोप लगाया कि राज्य पुलिस अधिकारियों को बचाने की कोशिश कर रहा है।

    मेडिको-लीगल रिपोर्ट के बारे में पूछे जाने पर सैयद ने बताया कि मृतक के बारे में यह बताया गया कि उसने मधुमेह की 100 गोलियां खा ली थीं (भले ही वह पुलिस हिरासत में था)।

    उन्होंने सवाल किया,

    "कोई व्यक्ति पुलिस हिरासत में 100 गोलियां कैसे खा सकता है?"

    उनकी बात सुनकर CJI ने ASG राजू से पूछा कि ऐसे मामलों में, जहां अप्राकृतिक मौत का संदेह हो, क्या शुरू में FIR दर्ज की जा सकती है और जांच के बाद निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं? गौरतलब है कि CJI ने यह भी टिप्पणी की कि FIR दर्ज कराने के लिए ललिता कुमारी मामले का हवाला देना एक "फैशन" बन गया।

    "ललिता कुमारी, जिस तरह से लोग [हवाला दे रहे हैं]... यह एक फैशन बन गया है। आप दुनिया में किसी के भी खिलाफ शिकायत करते हैं और कहते हैं कि ललिता कुमारी कहती है कि [FIR दर्ज करें]। यह उस फैसले का दायरा या मतलब नहीं है।"

    अपनी ओर से ASG ने कहा कि मृतक ने 100 गोलियां खाई थीं या नहीं, यह अभी भी सवाल के घेरे में है, क्योंकि विसरा रिपोर्ट अभी तक उपलब्ध नहीं थी। याचिकाकर्ता ने डॉक्टरों के सामने यही बात रखी थी।

    जस्टिस बागची ने जब मृतक के शरीर पर लगी चोटों (जिसमें एक फ्रैक्चर भी शामिल था) के बारे में सवाल किया तो ASG ने बताया कि ये चोटें तब लगीं जब डॉक्टरों ने उसकी छाती पर दबाव डालकर उसे होश में लाने की कोशिश की।

    जस्टिस बागची इस जवाब से सहमत नहीं दिखे और बोले,

    "ऐसा होने की संभावना बहुत कम है।"

    यह याचिका AoR वरिंदर कुमार शर्मा ने दायर की।

    Case Title :TOFIK SHAIKH Versus STATE OF GUJARAT AND ORS. SLP(Crl) No. 11532/2026

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