बिहार और झारखंड पुलिस में अलग-अलग नामों से कर रहा था नौकरी, सुप्रीम कोर्ट ने कांस्टेबल के खिलाफ दिया आपराधिक कार्रवाई का आदेश

Shahadat

9 May 2026 3:09 PM IST

  • बिहार और झारखंड पुलिस में अलग-अलग नामों से कर रहा था नौकरी, सुप्रीम कोर्ट ने कांस्टेबल के खिलाफ दिया आपराधिक कार्रवाई का आदेश

    यह देखते हुए कि सरकारी नौकरी को धोखाधड़ी का ज़रिया नहीं बनाया जा सकता, सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (8 मई) को एक पुलिस कांस्टेबल के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया। इस कांस्टेबल पर झारखंड और बिहार पुलिस में अलग-अलग पहचानों के तहत दोहरी नियुक्तियाँ पाने का आरोप है।

    दोषी अधिकारी की बर्खास्तगी बहाल करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की कि उसके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही भी शुरू की जानी चाहिए, क्योंकि इस मामले में प्रतिरूपण (किसी और का रूप धारण करना) और धोखाधड़ी जैसे गंभीर अपराध शामिल थे।

    जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने टिप्पणी की,

    “सरकारी नौकरी, खासकर पुलिस सेवा में, को धोखाधड़ी का ज़रिया नहीं बनाया जा सकता। अगर कानून लागू करने की ज़िम्मेदारी जिन लोगों पर है, वे खुद ही धोखे और जाली दस्तावेज़ों के ज़रिए सेवा में प्रवेश पाते हैं तो इससे कानून का राज गंभीर रूप से कमज़ोर होगा। इन परिस्थितियों में अनुशासनात्मक कार्रवाई को बहाल करते हुए, कानून के अनुसार आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का निर्देश देना ज़रूरी और उचित दोनों है।”

    यह टिप्पणी झारखंड हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच के उस फैसले को रद्द करते हुए की गई, जिसने उसकी सेवा से बर्खास्तगी को पलट दिया था।

    मामले की पृष्ठभूमि

    यह मामला प्रतिवादी नंबर 1, रंजन कुमार के खिलाफ शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्यवाही से जुड़ा है। रंजन कुमार को 18 मई, 2005 को झारखंड पुलिस में कांस्टेबल के पद पर नियुक्त किया गया था।

    राज्य सरकार के अनुसार, 20 दिसंबर, 2007 को क्षतिपूर्ति अवकाश (Compensatory Leave) पर जाने के बाद, वह ड्यूटी पर वापस नहीं लौटा। आरोप है कि उसने 26 दिसंबर, 2007 को बिहार पुलिस में “संतोष कुमार” के नाम से कांस्टेबल के तौर पर एक और नियुक्ति हासिल कर ली। इसके लिए उसने कथित तौर पर माता-पिता का अलग विवरण और जाली दस्तावेज़ों का इस्तेमाल किया।

    अनुशासनात्मक अधिकारियों ने आरोप लगाया कि उसने अपनी असली पहचान छिपाकर और अधिकारियों को गुमराह करके, एक ही समय में दो अलग-अलग पुलिस बलों में नौकरी पाने की कोशिश की।

    एक विभागीय जांच के बाद 20 अगस्त, 2010 को उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। उसकी विभागीय अपील और याचिका भी खारिज कर दी गई, जिसके बाद उसने अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार का सहारा लिया।

    झारखंड हाईकोर्ट के सिंगल जज ने 2015 में उसकी बर्खास्तगी को सही ठहराया, लेकिन बाद में डिवीज़न बेंच ने 'लेटर्स पेटेंट अपील' के ज़रिए इस सज़ा में हस्तक्षेप किया। बेंच ने कहा कि जाँच के निष्कर्ष “बिना किसी सबूत” के आधार पर थे, क्योंकि बिहार के ज़रूरी गवाहों की जाँच नहीं की गई और जिन दस्तावेज़ों पर भरोसा किया गया था, उन्हें औपचारिक रूप से साबित नहीं किया गया।

    इस विवादित आदेश के खिलाफ झारखंड राज्य और अन्य लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

    Cause Title: THE STATE OF JHARKHAND & ORS. VERSUS RANJAN KUMAR & ORS.

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