'सरकार सबसे बड़ी वादी, पेंडेंसी बढ़ा रही'—CISF मामले में अनावश्यक अपील पर फटकार: सुप्रीम कोर्ट
Praveen Mishra
1 April 2026 3:46 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार (Union of India) पर ₹25,000 का जुर्माना लगाते हुए उसकी विशेष अनुमति याचिका (SLP) खारिज कर दी। यह याचिका पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें CISF के एक कांस्टेबल की बर्खास्तगी रद्द करते हुए उसे 25% बैक वेजेस देने का निर्देश दिया गया था।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुयान की पीठ ने सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की इस अपील पर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि यह समझ से परे है कि हाईकोर्ट के सुविचारित आदेश को क्यों चुनौती दी गई।
अदालत ने टिप्पणी की कि केंद्र सरकार देश की सबसे बड़ी वादी है और इस प्रकार की अनावश्यक मुकदमेबाजी से न्यायालयों में लंबित मामलों का बोझ बढ़ता है। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि ऐसे मामलों में विधि अधिकारियों को उचित कानूनी राय देनी चाहिए कि यदि हाईकोर्ट ने सजा को अनुपातहीन मानते हुए राहत दी है, तो मामले को सर्वोच्च न्यायालय तक नहीं ले जाना चाहिए।
मामला CISF के एक कांस्टेबल से जुड़ा है, जिसे लगभग 10 वर्षों की सेवा के बाद दो आरोपों के आधार पर बर्खास्त कर दिया गया था। पहला आरोप 11 दिनों की अनुपस्थिति का था, जबकि दूसरा आरोप एक अन्य कांस्टेबल की बेटी के साथ जाने और उसके विवाह में सहायता करने का था। हालांकि, रिकॉर्ड से स्पष्ट हुआ कि अनुपस्थिति मेडिकल लीव के दौरान थी और संबंधित महिला ने भी कोई शिकायत नहीं की थी।
ट्रायल के दौरान सिंगल जज ने बर्खास्तगी को अनुपातहीन मानते हुए आदेश रद्द कर दिया और कांस्टेबल को सेवा में बहाल करने के साथ 25% बैक वेजेस देने का निर्देश दिया। इस आदेश को डिवीजन बेंच ने भी बरकरार रखा था।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से “नो वर्क, नो पे” के सिद्धांत का हवाला दिया गया, लेकिन अदालत ने इस तर्क को अस्वीकार कर दिया और SLP को खारिज करते हुए लागत भी लगा दी।
इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि अनावश्यक अपीलों के माध्यम से न्यायालय का समय बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए और सरकार को जिम्मेदारीपूर्वक मुकदमेबाजी करनी चाहिए।

