सुप्रीम कोर्ट ने मोटर दुर्घटना मुआवज़े में 'प्रेम और स्नेह की हानि' को अलग मद के रूप में न मानने पर जताई असहजता
Praveen Mishra
10 Feb 2026 1:20 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने National Insurance Co. Ltd. v. Pranay Sethi (2017) के संविधान पीठ के फ़ैसले के एक पहलू पर असहजता व्यक्त की है, जिसमें मोटर दुर्घटना मामलों में मुआवज़ा तय करते समय 'प्रेम और स्नेह की हानि' (loss of love and affection) को एक अलग मद के रूप में देने से इंकार किया गया था।
जस्टिस दिपांकर दत्ता और जस्टिस एस.सी. शर्मा की खंडपीठ ने कहा कि वह संविधान पीठ के फ़ैसले से बंधी हुई है, लेकिन इस निष्कर्ष को लेकर उसके मन में शंका है कि घातक सड़क दुर्घटना में परिजनों को होने वाली भावनात्मक क्षति—यानी प्रेम और स्नेह की हानि—को अलग से क्यों नहीं माना जा सकता।
खंडपीठ ने याद दिलाया कि Pranay Sethi फ़ैसले में गैर-आर्थिक (non-pecuniary) क्षतिपूर्ति को केवल तीन पारंपरिक मदों तक सीमित किया गया था—
संपत्ति की हानि (Loss of Estate)
सहचर्य/संग-साथ की हानि (Loss of Consortium)
अंतिम संस्कार खर्च (Funeral Expenses)
और “प्रेम और स्नेह की हानि” को अलग मद के रूप में देने को अस्वीकार किया गया था।
न्यायालय ने सवाल उठाया कि जब 'भविष्य की संभावनाएँ' (future prospects) जैसी मद न्यायिक व्याख्या के ज़रिये विकसित की जा सकती है, ताकि आश्रितों की आर्थिक अपेक्षाओं को मान्यता दी जा सके, तो फिर घातक दुर्घटना से उत्पन्न भावनात्मक वंचना—प्रेम और स्नेह की हानि—को अलग मद के रूप में मानने से इनकार क्यों किया जाए। न्यायमूर्ति दत्ता द्वारा लिखे गए निर्णय में कहा गया कि मोटर वाहन अधिनियम का अध्याय XII एक कल्याणकारी कानून है, जिसका उद्देश्य दुर्घटनाओं से पीड़ित लोगों की सहायता करना है, ऐसे में इस प्रकार की भावनात्मक क्षति को नज़रअंदाज़ करना अवधारणात्मक तनाव पैदा करता है।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला 9 जून 2011 की एक घातक सड़क दुर्घटना से जुड़ा है, जिसमें 37 वर्षीय चालक की मृत्यु हो गई थी। मृतक की पत्नी, बच्चों और मां ने चेन्नई की मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) में दावा दायर किया।
वर्ष 2012 में MACT ने मृतक की आय ₹6,000 प्रतिमाह मानते हुए और भविष्य की संभावनाएँ जोड़े बिना ₹9.37 लाख का मुआवज़ा दिया।
मद्रास हाईकोर्ट ने आय ₹7,000 प्रतिमाह मानते हुए मुआवज़ा बढ़ाकर ₹10.51 लाख किया और ₹60,000 'प्रेम और स्नेह की हानि' के तहत भी दिए।
इसके बाद मृतक के आश्रित अधिक मुआवज़े की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने कुल मुआवज़ा बढ़ाया, लेकिन Pranay Sethi फ़ैसले का पालन करते हुए 'प्रेम और स्नेह की हानि' के तहत अलग से दी गई राशि को हटाया। कोर्ट ने कहा कि Rajesh v. Rajbir Singh (2013), जिसमें इस मद को मान्यता दी गई थी, वह Pranay Sethi के बाद प्रभावहीन हो चुका है।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बाद के फ़ैसलों—Magma General Insurance Co. Ltd. v. Nanu Ram (2018) और United India Insurance Co. Ltd. v. Satinder Kaur (2021)—में consortium की अवधारणा का विस्तार किया गया है, जिसमें वैवाहिक, अभिभावकीय और संतानगत सहचर्य शामिल है। इस प्रकार, प्रेम और स्नेह से वंचित होने की भावनात्मक क्षति 'Loss of Consortium' के अंतर्गत समाहित मानी जाएगी।
इसी आधार पर कोर्ट ने कुल मुआवज़ा बढ़ाकर ₹20.80 लाख कर दिया, जबकि अलग से 'प्रेम और स्नेह की हानि' के तहत कोई राशि देने से इंकार किया।
अदालत ने कहा कि जब तक संविधान पीठ के Pranay Sethi फ़ैसले में बदलाव नहीं होता, तब तक 'प्रेम और स्नेह की हानि' को एक स्वतंत्र मद के रूप में मुआवज़े में शामिल नहीं किया जा सकता।

