रिमिशन याचिकाओं पर देरी पर गुजरात सरकार को चेतावनी, अवमानना कार्रवाई की चेतावनी: सुप्रीम कोर्ट

Praveen Mishra

30 March 2026 4:42 PM IST

  • रिमिशन याचिकाओं पर देरी पर गुजरात सरकार को चेतावनी, अवमानना कार्रवाई की चेतावनी: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि दोषियों की समयपूर्व रिहाई (premature release) से जुड़े मामलों में तय समयसीमा का सख्ती से पालन किया जाए, अन्यथा संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई, यहां तक कि स्वतः संज्ञान लेकर अवमानना कार्यवाही भी शुरू की जा सकती है।

    यह टिप्पणी जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान की, जिसमें एक उम्रकैद कैदी की रिहाई पर निर्णय, आवश्यक अवधि पूरी होने के बावजूद लंबित था।

    अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता 12 दिसंबर 2025 तक राज्य की नीति के अनुसार समयपूर्व रिहाई के लिए पात्र हो चुका था। इसके बावजूद, तीन महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी अंतिम निर्णय नहीं लिया गया। 16 मार्च 2026 को राज्य की ओर से यह दलील दी गई कि संबंधित समिति वर्ष में केवल चार बार बैठक करती है और मामला विचाराधीन है। इस पर कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए इसे “पूरी तरह अस्वीकार्य” बताया।

    कोर्ट ने गुजरात सरकार के 9 जुलाई 1992 के परिपत्र (CrPC की धारा 432 के तहत) का हवाला देते हुए कहा कि रिहाई की प्रक्रिया कैदी की 14 वर्ष की वास्तविक सजा पूरी होने से तीन महीने पहले शुरू हो जानी चाहिए, ताकि पात्रता की तिथि पर ही अंतिम आदेश पारित किया जा सके।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि भले ही समयपूर्व रिहाई मौलिक अधिकार नहीं है, लेकिन एक बार राज्य नीति बना देता है तो यह कैदी का एक स्थापित अधिकार (vested right) बन जाता है। ऐसे में निर्धारित अवधि के बाद भी किसी व्यक्ति को जेल में रखना अवैध हिरासत माना जाएगा।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि अगली सुनवाई तक अंतिम निर्णय रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया, तो गुजरात के मुख्य सचिव, गृह विभाग के वरिष्ठ अधिकारी और जेल महानिरीक्षक को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होकर स्पष्टीकरण देना होगा। मामले की अगली सुनवाई 7 अप्रैल 2026 को निर्धारित की गई है।

    यह मामला 2011 में अहमदाबाद में हुई एक हत्या से संबंधित है, जिसमें आरोपी को IPC की धारा 302 और 498A के तहत दोषी ठहराकर उम्रकैद की सजा दी गई थी, जिसे 2023 में गुजरात हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा था।

    सुप्रीम कोर्ट ने हाल के समय में राज्यों द्वारा रिहाई और रिमिशन से जुड़े मामलों में देरी पर बार-बार नाराजगी जताई है और स्पष्ट किया है कि प्रशासनिक लापरवाही के कारण किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित नहीं होनी चाहिए।

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