फैसले सुरक्षित रखने के बाद देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, दिशानिर्देशों पर फैसला सुरक्षित
Praveen Mishra
17 March 2026 10:19 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (16 मई) को हाईकोर्ट्स द्वारा सुनवाई पूरी होने के बाद फैसले सुनाने में हो रही देरी को लेकर प्रस्तावित दिशानिर्देशों पर अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया। अदालत ने कहा कि इन दिशानिर्देशों का उद्देश्य किसी को निशाना बनाना नहीं, बल्कि न्यायपालिका में जवाबदेही बढ़ाना और व्यवस्था को मजबूत करना है।
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने इस मामले में एमिकस क्यूरी अधिवक्ता फौजिया शकील द्वारा प्रस्तुत ड्राफ्ट दिशानिर्देशों की सराहना की और हाईकोर्ट्स से इस पर प्रतिक्रिया मांगी। अदालत ने कहा कि एक सप्ताह के भीतर सुझावों और प्रतिक्रियाओं पर विचार कर आदेश जारी किया जाएगा।
चीफ़ जस्टिस ने कहा कि हाईकोर्ट्स में कई उत्कृष्ट न्यायाधीश हैं और कई बार देरी अधिक मामलों को सुनने की प्रतिबद्धता के कारण होती है। उन्होंने कहा, “हम किसी को दोष नहीं दे रहे, बल्कि न्यायाधीशों की सहायता के लिए दिशानिर्देश तैयार कर रहे हैं ताकि वे अपने कार्य को बेहतर तरीके से संतुलित कर सकें।”
एमिकस के प्रमुख सुझाव
एमिकस क्यूरी द्वारा प्रस्तुत ड्राफ्ट में सुझाव दिया गया कि:
फैसले सुरक्षित रखने के अधिकतम 3 महीने के भीतर निर्णय सुनाया जाए
हाईकोर्ट्स अपनी वेबसाइट पर यह दिखाएं कि कब निर्णय सुरक्षित किया गया था
3 महीने से अधिक लंबित मामलों की अलग सूची (dedicated section) वेबसाइट पर प्रदर्शित की जाए
इसके अलावा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों—जैसे जमानत, आपराधिक अपील और मृत्यु संदर्भ—में विशेष प्राथमिकता और शीघ्र निर्णय देने की बात कही गई है।
ड्राफ्ट में यह भी सुझाव दिया गया कि:
यदि 2 महीने से अधिक देरी हो, तो चीफ़ जस्टिस संबंधित पीठ का ध्यान आकर्षित करें
3 महीने से अधिक देरी होने पर मामला चीफ़ जस्टिस के समक्ष रखा जाए
6 महीने से अधिक देरी होने पर मामले को दूसरी पीठ को सौंपने (reassignment) पर विचार किया जा सके
इसके साथ ही, आदेश का ऑपरेटिव हिस्सा सुनाने के बाद कारणयुक्त फैसला 5 से 15 दिनों के भीतर अपलोड करने की भी सिफारिश की गई है।
पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर
ड्राफ्ट में यह भी कहा गया कि:
सभी फैसले ओपन कोर्ट में सुनाए जाएं
निर्णय को 24 घंटे के भीतर वेबसाइट पर अपलोड किया जाए
विधिक सहायता मामलों में कैदियों/अंडरट्रायल को मामले की स्थिति की नियमित जानकारी दी जाए।
ट्रायल कोर्ट्स के लिए भी सुझाव दिए गए हैं, जिनमें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 392 के तहत 45 दिनों में निर्णय सुनाने की समयसीमा का पालन शामिल है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला झारखंड हाईकोर्ट में लंबित उन आपराधिक अपीलों से जुड़ा है, जिनमें 2022 से फैसले सुरक्षित रखे गए थे और 2-3 वर्षों तक सुनाए नहीं गए। याचिकाकर्ताओं ने इसे अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन बताया।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी इस मुद्दे पर चिंता जताते हुए सभी हाईकोर्ट्स से लंबित फैसलों का ब्योरा मांगा था।
अब कोर्ट इन सुझावों और हाईकोर्ट्स की प्रतिक्रियाओं पर विचार कर जल्द अंतिम दिशानिर्देश जारी करेगा।

