'लोकतंत्र में हर कोई नारेबाज़ी करता है': सुप्रीम कोर्ट ने भगवंत मान के खिलाफ़ विरोध मार्च से जुड़े मामले को फिर से शुरू करने में इनकार किया

Shahadat

16 July 2026 5:16 PM IST

  • लोकतंत्र में हर कोई नारेबाज़ी करता है: सुप्रीम कोर्ट ने भगवंत मान के खिलाफ़ विरोध मार्च से जुड़े मामले को फिर से शुरू करने में इनकार किया

    सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि वह चंडीगढ़ प्रशासन की उस याचिका पर विचार करने का इच्छुक नहीं है, जिसमें AAP नेताओं (जिनमें पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान भी शामिल हैं) के खिलाफ़ दंगा करने का मामला रद्द करने के फैसले को चुनौती दी गई थी। यह मामला 2020 में बिजली की दरें बढ़ने के खिलाफ़ किए गए विरोध मार्च से जुड़ा था।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ़ चंडीगढ़ प्रशासन की चुनौती पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें 2020 के विरोध प्रदर्शन से जुड़े दंगे का मामला रद्द कर दिया गया।

    चंडीगढ़ की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने कहा कि प्रशासन को अलग-अलग आदेशों को चुनौती देते हुए दायर 3 मामलों में कुछ तकनीकी आपत्तियों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने इस मुद्दे को सुलझाने के लिए कुछ समय मांगा।

    हालांकि, CJI कांत ने मौखिक रूप से कहा कि बेंच इस चुनौती पर विचार करने की इच्छुक नहीं है।

    उन्होंने कहा,

    "मिस्टर राजू, नारेबाज़ी... लोकतंत्र में हर कोई ऐसा करता है। अब जब वह (सीएम भगवंत मान) किसी ज़िम्मेदार पद पर हैं... तो हम समझते हैं कि वह अपनी ज़िम्मेदारी भी समझेंगे... मुझे लगता है कि अब सब ठीक है। अगर आप मामले के गुण-दोष (merits) पर बहस करना चाहते हैं, तो हम आपकी बात सुनेंगे। वरना, हम दखल देने के इच्छुक नहीं हैं।"

    हालांकि, ASG ने कहा कि हाईकोर्ट ने 'मिनी ट्रायल' किया था और पूरा मामला रद्द कर दिया था। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि वह मामले के गुण-दोष पर बहस करना चाहते हैं। इसके बाद, बेंच ने मामले की सुनवाई टाल दी।

    बता दें, विवादित आदेश में हाईकोर्ट ने कहा था कि AAP नेताओं के खिलाफ़ प्रथम दृष्टया (prima facie) कोई मामला नहीं बनता है और IPC के तहत कथित अपराध साबित नहीं होते हैं। कोर्ट ने IPC की धारा 147 (दंगा करना), 149 (गैर-कानूनी सभा), 332 (लोक सेवक को चोट पहुंचाना) और 353 (हमला) के तहत दर्ज FIR और चार्जशीट को रद्द कर दिया था।

    हाई कोर्ट ने कहा,

    "याचिकाकर्ताओं पर उकसाने का जो आरोप लगाया गया है, उसके तरीके का भी कोई ज़िक्र नहीं है; और न ही उन पर किसी खास शब्द या इशारे का आरोप लगाया गया। इसलिए भीड़ द्वारा पत्थर फेंकने की घटना के लिए याचिकाकर्ताओं को ज़िम्मेदार ठहराने का कोई आधार नहीं है। यह ऐसा मामला है जिसमें याचिकाकर्ताओं पर जान-बूझकर या किसी और तरह से कोई काम करने का आरोप नहीं लगाया गया। इसके बजाय, आरोप यह है कि भीड़ पर हल्का पानी डालने पर उन्होंने पत्थर फेंकना शुरू कर दिया, जिससे वहाँ मौजूद अधिकारी घायल हो गए।"

    मामले के तथ्यों पर गौर करते हुए कोर्ट को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे याचिकाकर्ताओं की कोई प्रत्यक्ष हरकत साबित होती हो और न ही CrPC की धारा 144 के तहत कोई निषेधाज्ञा लागू थी; इसलिए भीड़ का जमा होना गैर-कानूनी नहीं था। यह भी ध्यान दिया गया कि चार्जशीट में माना गया था कि सप्लीमेंट्री चालान के लिए याचिकाकर्ताओं और 750–800 लोगों की पहचान अभी बाकी थी।

    याचिकाकर्ताओं पर उकसाने, कोई खास शब्द कहने या इशारा करने का कोई आरोप नहीं था और चोटें भीड़ की हलचल के दौरान धक्का-मुक्की का नतीजा लग रही थीं, न कि जान-बूझकर किए गए हमले का। आदेश में यह भी बताया गया कि पत्थरबाज़ी कथित तौर पर तभी शुरू हुई जब ड्यूटी मजिस्ट्रेट ने भीड़ पर पानी की बौछार करने का आदेश दिया।

    Case Title: U.T CHANDIGARH v. BHAGWANT MANN AND ANR., Diary No. 21434-2026

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