'तरसेम सिंह' फैसले के खिलाफ NHAI की पुनर्विचार याचिका सुप्रीम कोर्ट में खारिज
Shahadat
25 March 2026 11:36 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका खारिज की। इस याचिका में NHAI ने यह घोषित करने की मांग की थी कि 2019 का 'तरसेम सिंह' फैसला—जिसमें यह माना गया था कि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम के तहत किए गए भूमि अधिग्रहणों पर सोलेशियम (मुआवजे के अलावा अतिरिक्त राशि) और ब्याज लागू होगा—केवल भविष्य से ही लागू होगा, न कि पिछली तारीखों से।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की खंडपीठ ने 2025 के उस फैसले की समीक्षा करने से इनकार किया, जिसमें यह माना गया था कि 'तरसेम सिंह' फैसले का आवेदन पूर्वव्यापी (पिछली तारीखों से लागू) होगा।
साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन दावों का निपटारा 28 मार्च, 2015 से पहले ही हो चुका था (यह वह तारीख है जब 2013 का RFCTLARR Act NH अधिग्रहणों पर लागू किया गया), उन्हें कानून की बाद की किसी घोषणा के आधार पर दोबारा नहीं खोला जा सकता।
NHAI पर पड़ने वाला अतिरिक्त वित्तीय बोझ समीक्षा का आधार नहीं हो सकता
कोर्ट ने यह माना कि इस फैसले के कारण पड़ने वाला वित्तीय बोझ—जिसका NHAI ने लगभग ₹29,000 करोड़ होने का अनुमान लगाया—भूमि मालिकों को उचित मुआवजा देने की संवैधानिक गारंटी को कमजोर करने का आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने टिप्पणी की कि सोलेशियम और ब्याज देना मुआवजे में निष्पक्षता की आवश्यकता से जुड़ा है। इसे अधिग्रहण करने वाले प्राधिकरण पर पड़ने वाले वित्तीय बोझ की मात्रा पर निर्भर नहीं बनाया जा सकता।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
"सोलेशियम और ब्याज देना वित्तीय बोझ की मात्रा पर निर्भर नहीं हो सकता। इस आधार पर उचित मुआवजे की संवैधानिक गारंटी को कमजोर नहीं किया जा सकता। केवल वित्तीय देनदारी का अनुमान लगाना ही समीक्षा के लिए कोई वैध आधार नहीं है।"
निपटारे हो चुके दावों पर स्पष्टीकरण
साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि 'तरसेम सिंह' फैसले के कुछ पहलुओं पर सीमित स्पष्टीकरण की आवश्यकता थी ताकि इसके आवेदन में एकरूपता और निश्चितता सुनिश्चित की जा सके। खंडपीठ ने इस बात पर जोर दिया कि यद्यपि भूमि मालिक कानून के अनुसार सोलेशियम और ब्याज पाने के हकदार हैं। फिर भी मुकदमों के अंतिम निपटारे (Finality of Litigation) के सिद्धांत का भी सम्मान किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि भूमि मालिकों ने विभिन्न मामलों में अलग-अलग कानूनी उपायों का सहारा लिया—जिनमें मध्यस्थता (Arbitration) और अदालती कार्यवाही शामिल हैं—और एक बार जब ऐसे निर्णयों को निर्धारित समय सीमा के भीतर अंतिम रूप मिल जाता है तो उन्हें बाद में हुई किसी न्यायिक घोषणा के आधार पर दोबारा नहीं खोला जा सकता।
हकदारी के दायरे को स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने फैसला दिया कि जिन ज़मीन मालिकों के मुआवज़े के निर्धारण से जुड़ी कार्यवाही 28 मार्च, 2015 तक सक्षम अधिकारी या कोर्ट के सामने लंबित थी, वे कानून के अनुसार सोलेशियम (क्षतिपूर्ति) और ब्याज़ का दावा करने के हकदार होंगे।
कोर्ट ने आगे कहा कि जिन मामलों में बढ़ा हुआ मुआवज़ा दिया जा चुका था, लेकिन सोलेशियम और ब्याज़ का मुद्दा विशेष रूप से उठाया या तय नहीं किया गया, वहां ज़मीन मालिक लागू कानूनी सिद्धांतों के अधीन ऐसे लाभों की मांग कर सकते हैं। हालांकि, इन घटकों पर ब्याज़ केवल उसी तारीख से देय होगा जिस तारीख को सोलेशियम या ब्याज़ का दावा उठाया गया।
इसके विपरीत कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि जहां मुआवज़े की कार्यवाही 28 मार्च, 2015 से पहले ही पूरी हो चुकी थी और अंतिम रूप ले चुकी थी। साथ ही कोई कार्यवाही लंबित नहीं थी, वहां सोलेशियम या ब्याज़ का दावा करने के उद्देश्य से ऐसे दावों को फिर से नहीं खोला जा सकता है।
बेंच ने टिप्पणी की कि तय हो चुके दावों को बार-बार फिर से खोलने से मुकदमों में निश्चितता कमज़ोर होगी और ज़मीन मालिकों के अधिकारों तथा कानूनी निर्णयों की स्थिरता के बीच का संतुलन बिगड़ जाएगा।
इन स्पष्टीकरणों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने NHAI द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका का निपटारा किया। फैसला सुनाए जाने के बाद सॉलिसिटर जनरल ने बेंच से अनुरोध किया कि वे फैसले में यह भी स्पष्ट कर दें कि ब्याज़ NH एक्ट की धारा 3H के अनुसार होगा। हालांकि, CJI सूर्यकांत ने कहा कि ऐसा स्पष्टीकरण Tarsem Singh-I और Tarsem Singh-II मामलों में दिए गए पिछले फैसलों के विपरीत होगा।
पुनर्विचार याचिका में कोर्ट के 4 फरवरी, 2025 के पिछले आदेश को वापस लेने की मांग की गई, जिसके द्वारा 'यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाम तरसेम सिंह (2019)' मामले में मुख्य फैसले के स्पष्टीकरण के लिए दायर आवेदन खारिज कर दिया गया। उस फैसले में कोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम की धारा 3J की जांच की थी, जो ज़मीन मालिकों को 'सोलेशियम' (अतिरिक्त मुआवज़ा) और ब्याज के भुगतान को बाहर रखती थी। साथ ही कोर्ट ने उस हद तक इस प्रावधान को असंवैधानिक घोषित कर दिया।
कोर्ट ने यह माना था कि जिन ज़मीन मालिकों की ज़मीनें 1997 (जब धारा 3J लागू की गई) और 2015 (जब 'भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवज़े और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013' के तहत व्यवस्था को राष्ट्रीय राजमार्गों के अधिग्रहण तक बढ़ाया गया) के बीच अधिग्रहित की गईं, वे 'भूमि अधिग्रहण अधिनियम' के तहत उपलब्ध समान लाभों के हकदार थे।
वर्तमान कार्यवाही में NHAI ने यह तर्क दिया कि कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किए गए पिछले वित्तीय अनुमान 'लिपिकीय त्रुटि' (Clerical Error) पर आधारित थे और यह कि वास्तविक दायित्व लगभग ₹29,000 करोड़ होगा।
इस तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि भले ही संशोधित अनुमान स्वीकार कर लिया जाए, फिर भी यह न्यायालय को पिछले फैसले के गुण-दोषों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित नहीं करेगा। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि 'उचित मुआवज़े' की संवैधानिक आवश्यकता के साथ केवल वित्तीय विचारों के आधार पर समझौता नहीं किया जा सकता।
Case Title: NATIONAL HIGHWAYS AUTHORITY OF INDIA Versus TARSEM SINGH AND ORS., R.P.(C) No. 2528/2025 in MA 1773/2021 in C.A. No. 7064/2019

