मामलों के आवंटन में CJI का हस्तक्षेप खत्म करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में उचित रोस्टर सिस्टम की ज़रूरत: जस्टिस ओक

  • मामलों के आवंटन में CJI का हस्तक्षेप खत्म करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में उचित रोस्टर सिस्टम की ज़रूरत: जस्टिस ओक

    सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय एस. ओक ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में एक ऐसी उचित रोस्टर सिस्टम लागू होनी चाहिए, जिससे बेंचों को मामले सौंपने की प्रक्रिया में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) के व्यक्तिगत हस्तक्षेप की संभावना पूरी तरह खत्म हो जाए।

    नई दिल्ली में 'कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स' द्वारा आयोजित एक सेमिनार में "जजों की जवाबदेही" विषय पर बोलते हुए जस्टिस ओक ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में व्यवस्थित रोस्टर न होने से इस बात पर सवाल उठते हैं कि आखिर किस बेंच को कौन सा मामला सौंपा जाएगा।

    उन्होंने कहा,

    "रोस्टर का मुख्य उद्देश्य मामलों की लिस्टिंग में किसी भी तरह के व्यक्तिगत हस्तक्षेप की संभावना को रोकना है। यदि उचित रोस्टर सिस्टम मौजूद हो तो हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के पास किसी विशेष मामले की लिस्टिंग में खुद से हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं होगा।"

    यह बताते हुए कि सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा रोस्टर में कुछ श्रेणियों के मामले कई अलग-अलग बेंचों को सौंपे जाते हैं, उन्होंने कहा कि अक्सर वकीलों को यह पता ही नहीं होता कि उनके मामले की सुनवाई किस बेंच में होगी।

    उन्होंने कहा,

    "दुर्भाग्य से, सुप्रीम कोर्ट में कोई व्यवस्थित रोस्टर प्रणाली नहीं है। वहां आपको 'जजों का रोस्टर' (Judges' Roster) नाम का शीर्षक तो मिलेगा, लेकिन इसमें क्या है? 26 अक्टूबर के नवीनतम रोस्टर को ही देख लें तो उसमें केवल विषयों के आधार पर एक सूची दी गई। इसमें 301 से 306 तक की श्रेणियां हैं, जिन्हें चार अलग-अलग बेंचों को सौंप दिया गया।"

    उदाहरण के लिए, पर्यावरण से जुड़े किसी मामले में हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली 'स्पेशल लीव पिटिशन' (SLP) कई अलग-अलग बेंचों में से किसी को भी सौंपी जा सकती है। ऐसे में वकील के लिए यह अनिश्चितता बनी रहती है कि आखिर किस बेंच में उसके मामले की सुनवाई होगी।

    जस्टिस ओक ने कहा,

    "मुख्य सवाल यह है कि अगर एक ही विषय कई बेंचों को सौंपा जा सकता है तो यह तय कौन करता है कि मामला किस विशेष बेंच को जाएगा? क्या यह फैसला CJI लेते हैं या रजिस्ट्री? यही वह कारण है, जिसकी वजह से मामलों की लिस्टिंग में हमेशा व्यक्तिगत हस्तक्षेप की गुंजाइश बनी रहती है।"

    उन्होंने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली बहुत हद तक CJI पर केंद्रित है। यदि कोर्ट एक ऐसी उचित रोस्टर प्रणाली अपना ले, जिसमें CJI सहित किसी के भी व्यक्तिगत हस्तक्षेप की कोई जगह न हो तो इससे कोर्ट की जवाबदेही और अधिक बढ़ेगी।

    सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की प्रशासनिक प्रणालियों की तुलना करते हुए जस्टिस ओक ने कहा कि कई हाईकोर्ट में प्रशासनिक शक्तियों का इस्तेमाल समितियों के जरिए किया जाता है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि फैसले सामूहिक रूप से लिए जाएं, न कि सारी शक्तियां केवल मुख्य न्यायाधीश (चीफ जस्टिस) के पास केंद्रित हों।

    उन्होंने यह भी कहा कि चीफ जस्टिस (CJI) के पास सारी शक्तियां केंद्रित होने से कभी-कभी "व्यक्ति-पूजा" (Hero-Worship) जैसी प्रवृत्ति पैदा हो जाती है। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि ऐसी स्थिति संस्था के लिए अच्छी नहीं है।

    जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए नए मामलों की 'ऑटोमैटिक लिस्टिंग' जरूरी

    जस्टिस ओक ने कहा कि पूरे भारत में वादियों (Litigants) के लिए न्यायिक जवाबदेही से जुड़ी एक बड़ी चिंता यह है कि नए दायर किए गए मामलों को पहली सुनवाई के लिए लिस्ट (सूचीबद्ध) कराना बहुत मुश्किल होता है।

    उन्होंने बताया कि अलग-अलग हाईकोर्ट में मामलों को लिस्ट करने की प्रक्रियाएं भी अलग-अलग हैं। कुछ अदालतों में, मामलों को लिस्ट कराने से पहले वकीलों को अदालत के सामने उनका जिक्र (Mentioning) करना पड़ता है, लेकिन ऐसा करने के बाद भी इस बात की कोई गारंटी नहीं होती कि उन मामलों की सुनवाई होगी ही।

    उन्होंने कहा,

    "पूरे भारत में वादियों के लिए जवाबदेही का मुख्य मुद्दा यही है कि नए दायर किए गए मामलों को पहली सुनवाई के लिए लिस्ट कैसे कराया जाए।"

    उन्होंने सुझाव दिया कि नए दायर किए गए मामलों को एक दिन के भीतर या एक तय समय सीमा के अंदर अपने आप (ऑटोमैटिक तरीके से) लिस्ट कर दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि 'ऑटोमैटिक लिस्टिंग' जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में पहला कदम है।

    उन्होंने एक और चिंता जताई, जो 'कॉज लिस्ट' (सुनवाई के लिए तय मामलों की सूची) तैयार करने और उसे लागू करने से जुड़ी है। कई हाईकोर्ट में जजों को यह छूट होती है कि वे कई मामलों की तारीखें तय होने के बावजूद 'कॉज लिस्ट' को छोटा कर सकते हैं।

    उन्होंने कहा,

    "उदाहरण के लिए, अगर 90 मामलों की तारीखें तय की गई हैं तो भी लिस्ट में केवल 40 मामले ही शामिल किए जाते हैं। इसका नतीजा क्या होता है? पहला, वादी असहाय हो जाते हैं और उनके मामले लिस्ट से हट जाते हैं। दूसरा, रजिस्ट्री के पास यह चुनने की ताकत आ जाती है कि कौन से मामले लिस्ट में शामिल किए जाएंगे।"

    सुप्रीम कोर्ट में अपना कार्यकाल याद करते हुए जस्टिस ओक ने बताया कि उन्होंने कड़ा आदेश दिया था। इसमें स्पष्ट किया गया कि अगर किसी न्यायिक आदेश के तहत किसी मामले को लिस्ट करने का निर्देश दिया गया तो रजिस्ट्री के पास उसे लिस्ट से हटाने का कोई अधिकार नहीं है।

    उन्होंने जोर देकर कहा कि वादियों पर असर डालने वाले मनमाने फैसलों को रोकने के लिए एक पारदर्शी और स्पष्ट 'लिस्टिंग सिस्टम' (मामलों को सूचीबद्ध करने की व्यवस्था) का होना बहुत जरूरी है।

    कॉलेजियम पारदर्शी होना चाहिए, सरकार को भी जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए

    न्यायिक नियुक्तियों पर जस्टिस ओक ने कहा कि वह कॉलेजियम सिस्टम में पूरा भरोसा रखते हैं और जब तक कोई बेहतर विकल्प न मिल जाए, तब तक इसे बदलने के पक्ष में नहीं हैं।

    उन्होंने कहा,

    "मैं कॉलेजियम सिस्टम में पूरा भरोसा रखता हूं। मेरा मानना ​​है कि जब तक कोई बेहतर सिस्टम न आ जाए, तब तक इसे नहीं बदला जाना चाहिए। हो सकता है कि कॉलेजियम सिस्टम को लागू करने में कुछ गलतियां हुई हों, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि यह सिस्टम ही खराब है।"

    उन्होंने माना कि कॉलेजियम को पारदर्शी तरीके से काम करना चाहिए, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि केवल उम्मीदवारों की सिफारिश करने या उन्हें खारिज करने के कारणों के साथ विस्तृत प्रस्ताव (रेजोल्यूशन) प्रकाशित कर देने से ही पारदर्शिता नहीं आ जाती।

    उन्होंने कहा,

    "पारदर्शिता पूरी प्रक्रिया में होनी चाहिए।"

    जस्टिस ओक ने इस बात पर भी चिंता जताई कि कारणों के साथ विस्तृत प्रस्ताव प्रकाशित करने से व्यक्तियों की निजता (प्राइवेसी) का उल्लंघन हो सकता है। साथ ही, इससे वकील भी न्यायिक नियुक्तियों के लिए अपनी सहमति देने से कतरा सकते हैं।

    उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सरकार को भी जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, खासकर तब जब न्यायिक नियुक्तियों की सिफारिशें महीनों तक लंबित पड़ी रहती हैं।

    कॉलेजियम की सिफारिशों को मंजूरी देने में हो रही देरी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को सरकार से समय पर कार्रवाई करने के लिए लगातार आग्रह करना चाहिए।

    उन्होंने उस फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया के लिए समय-सीमा तय की गई। साथ ही उन्होंने सवाल उठाया कि क्या न्यायपालिका देरी के लिए सरकार को जवाबदेह ठहराने के लिए पर्याप्त कदम उठा रही है।

    जस्टिस ओक ने इस मुद्दे से जुड़ी बेंगलुरु एडवोकेट्स एसोसिएशन की अवमानना ​​याचिका (कंटेम्प्ट पिटीशन) का भी जिक्र किया और बताया कि यह अभी भी लंबित है और सुनवाई के लिए सूचीबद्ध (लिस्ट) नहीं हुई।

    उन्होंने कहा,

    "जब कॉलेजियम नामों की सिफारिश करता है तो क्या न्यायपालिका का यह कर्तव्य नहीं है कि वह सरकार से सवाल पूछे? बेंगलुरु एडवोकेट्स एसोसिएशन ने एक अवमानना ​​याचिका दायर की है, जो अभी भी लंबित है। दुर्भाग्य से, इसे सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं किया गया।"

    जजों को पूर्व के फैसलों (Precedents) का पालन करना चाहिए

    जस्टिस ओक ने कहा कि न्यायिक फैसलों (Precedents) का लगातार पालन सुनिश्चित करके न्यायपालिका खुद को और अधिक जवाबदेह बना सकती है।

    उन्होंने उन मामलों पर चिंता जताई, जहां समान क्षमता वाली अन्य पीठों (Benches) द्वारा दिए गए फैसलों का पालन संबंधित पीठों द्वारा नहीं किया गया।

    उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि अब समय आ गया कि सुप्रीम कोर्ट यह सुनिश्चित करे कि 'समीक्षा याचिकाएं' (Review Petitions) और 'उपचारात्मक याचिकाएं' (Curative Petitions) केवल बहुत ही दुर्लभ मामलों में ही स्वीकार की जाएं, क्योंकि ये याचिकाएं अपने आप में असाधारण प्रकृति की होती हैं। मामलों के निपटारे के लिए समय-सीमा तय करने वाले न्यायिक निर्देशों के मुद्दे पर जस्टिस ओक ने कहा कि संवैधानिक अदालतें कभी-कभी ज़मीनी स्तर की वास्तविकताओं को समझने में विफल रहती हैं।

    उन्होंने संविधान पीठ के उस फैसले का ज़िक्र किया, जिसमें कहा गया कि निचली अदालतों (ट्रायल कोर्ट) को एक तय समय-सीमा के भीतर लंबित मामलों का निपटारा करने का निर्देश केवल असाधारण परिस्थितियों में ही दिया जाना चाहिए।

    उन्होंने कहा कि इस फैसले के बावजूद, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ऐसे निर्देश देते रहे हैं, जबकि उन्होंने निचली अदालतों के जजों को आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों पर पर्याप्त विचार नहीं किया।

    एक 'गार्जियन जज' (अभिभावक न्यायाधीश) के रूप में अपने अनुभव को याद करते हुए जस्टिस ओक ने बताया कि सेशन डिवीज़न के जजों ने उनके ध्यान में यह बात लाई थी कि सैकड़ों गवाहों वाले संवेदनशील आपराधिक मामलों को संभालना और साथ ही समय-सीमा के भीतर उनका निपटारा करना कितना मुश्किल होता है।

    उन्होंने कहा,

    "जज मुझसे पूछते हैं, 'मैं क्या करूँ? मेरे पास सैकड़ों ऐसे मामले हैं, जिनके लिए समय-सीमा तय है।'"

    उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि संवैधानिक अदालतों को ऐसे निर्देश जारी करने से पहले निचली अदालतों की वास्तविकताओं पर विचार करना चाहिए, क्योंकि इन निर्देशों से ट्रायल जजों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

    फैसलों की रचनात्मक आलोचना को बढ़ावा दिया जाना चाहिए

    जस्टिस ओक ने कहा कि हर नागरिक को संवैधानिक अदालतों के फैसलों की रचनात्मक आलोचना करने का अधिकार है, बशर्ते यह आलोचना तर्कसंगत हो और इसमें जजों पर कोई अनुचित आरोप न लगाया गया हो।

    उन्होंने कहा,

    "संवैधानिक अदालत के हर फैसले पर हर नागरिक को रचनात्मक आलोचना करने का अधिकार है। अपने तर्क दें। एक स्वस्थ और रचनात्मक बहस हमेशा बेहतर गुणवत्ता वाले फैसले देने में मदद करेगी।"

    उन्होंने इस बात को लेकर आगाह किया कि किसी जज के फैसले के नतीजों के आधार पर उन पर कोई गलत मंशा रखने का आरोप नहीं लगाना चाहिए।

    उन्होंने कहा,

    "मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि कोई फैसला सही है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर नहीं करना चाहिए कि वह सरकार के पक्ष में है या नहीं। लेकिन आजकल एक प्रवृत्ति देखने को मिल रही है। अगर कोई फैसला सरकार के पक्ष में आता है तो उसकी आलोचना की जाती है और जज की मंशा पर सवाल उठाए जाते हैं। यह सही नहीं है। आलोचना निष्पक्ष और तटस्थ होनी चाहिए।"

    जस्टिस ओक ने यह भी गौर किया कि जो जज साहसिक फैसले लेते हैं, उन्हें अक्सर सबसे ज़्यादा शिकायतों का सामना करना पड़ता है।

    उन्होंने कहा कि एक ऐसी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए, जो जजों की जवाबदेही तो तय करे, लेकिन साथ ही उन्हें स्वतंत्र और साहसिक फैसले लेने से हतोत्साहित न करे।

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