असहमति की आवाज़ को कट्टर और असहिष्णु समूहों से बचाना जरूरी : जस्टिस उज्जल भुइयां

Amir Ahmad

20 May 2026 3:54 PM IST

  • असहमति की आवाज़ को कट्टर और असहिष्णु समूहों से बचाना जरूरी : जस्टिस उज्जल भुइयां

    सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा कि लोकतंत्र में असहमति के अधिकार की रक्षा होना बेहद जरूरी है और असहमति रखने वालों को राज्य तथा गैर-राज्य दोनों प्रकार के दमनकारी और कट्टरपंथी समूहों से संरक्षण मिलना चाहिए।

    जस्टिस भुइयां इंदौर इंस्टीट्यूट ऑफ लॉ द्वारा आयोजित स्मृति निर्मला देवी बाम अंतरराष्ट्रीय मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि कानून हमें अलग-अलग विचारों और मतों के साथ संवाद करना सिखाता है और भारतीय संविधान भी इसी भावना को स्वीकार करता है।

    उन्होंने कहा कि संविधान की प्रस्तावना सभी नागरिकों को विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता सुनिश्चित करती है। इसलिए सहिष्णुता और अलग विचारों के सम्मान का भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।

    जस्टिस भुइयां ने अपने एक फैसले अतुल मिश्रा बनाम भारत संघ का उल्लेख करते हुए कहा कि उसमें उन्होंने बंधुत्व और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सिद्धांतों पर विस्तार से चर्चा की थी। यह मामला 'घूसखोर पंडित' नामक फिल्म के शीर्षक को लेकर दायर याचिका से जुड़ा था।

    उन्होंने कहा,

    “बंधुत्व का मतलब सभी भारतीयों के बीच समानता के आधार पर भाईचारे, सम्मान और स्वीकार्यता की भावना से है। असहमति और सहिष्णुता के लिए भी समाज में जगह होनी चाहिए।”

    जस्टिस भुइयां ने कहा कि किसी भी समुदाय को भाषण, चित्र, व्यंग्य या दृश्य कला के माध्यम से अपमानित करना संवैधानिक रूप से स्वीकार्य नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि असहमति रखने वाले विचारों को दबाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए, क्योंकि सहिष्णुता यह स्वीकार करती है कि किसी विषय पर एक से अधिक दृष्टिकोण हो सकते हैं।

    उन्होंने कहा,

    “असहिष्णुता उस सोच से पैदा होती है, जिसमें व्यक्ति अपने विचारों को दूसरों से श्रेष्ठ मानने लगता है। जब असहिष्णुता हावी होती है तो तर्क पीछे छूट जाता है। ऐसा समाज कभी प्रगतिशील और समावेशी नहीं बन सकता।”

    जस्टिस भुइयां ने डॉ. भीमराव आंबेडकर का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने चेतावनी दी थी कि यदि बंधुत्व नहीं होगा तो स्वतंत्रता कुछ लोगों के प्रभुत्व का माध्यम बन जाएगी।

    उन्होंने यह भी कहा कि इतिहास गवाह है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ने सामाजिक परिवर्तन में अहम भूमिका निभाई है। अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग जूनियर के नेतृत्व वाला नागरिक अधिकार आंदोलन हो या भारत में समानता और गरिमा के लिए चले संघर्ष, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ने हाशिए पर खड़े लोगों को अपनी आवाज उठाने का अवसर दिया।

    जस्टिस भुइयां ने कहा कि न्याय, समानता और स्वतंत्रता मिलकर एक समतामूलक समाज का निर्माण करते हैं, लेकिन इन सिद्धांतों की असली परीक्षा विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के अनुभवों से नहीं बल्कि उन लोगों के जीवन से होती है जो अब भी हाशिए पर हैं और जिनकी आवाज नहीं सुनी जाती।

    उन्होंने अपने संबोधन का समापन करते हुए कहा,

    “संवैधानिक मूल्यों को समझने के लिए हमें विजेताओं नहीं बल्कि उन लोगों के नजरिये से देखना होगा, जो व्यवस्था में पीछे छूट जाते हैं। मानवाधिकार तभी सार्थक हो सकते हैं जब मानव पीड़ा को गंभीरता से लिया जाए।”

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