उत्तराखंड के दो न्यायिक अधिकारियों को दिल्ली न्यायिक सेवा में शामिल होने की अनुमति: सुप्रीम कोर्ट ने कहा– हाइकोर्ट का इनकार मौलिक अधिकारों का उल्लंघन
Amir Ahmad
21 Jan 2026 11:02 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी न्यायिक अधिकारी को केवल इस आधार पर दूसरे राज्य की न्यायिक सेवा में शामिल होने की अनुमति से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसके जाने से पहले राज्य में रिक्तियां पैदा हो जाएंगी।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की खंडपीठ ने उत्तराखंड के दो न्यायिक अधिकारियों को राहत देते हुए उन्हें दिल्ली न्यायिक सेवा में शामिल होने की अनुमति प्रदान की। इन अधिकारियों को उत्तराखंड हाइकोर्ट ने दिल्ली न्यायिक सेवा में चयनित होने के बावजूद वहां कार्यभार ग्रहण करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था।
मामले के अनुसार अपीलकर्ताओं का चयन उत्तराखंड सिविल जज परीक्षा के माध्यम से हुआ। इसी दौरान उन्होंने दिल्ली न्यायिक सेवा परीक्षा में भी भाग लिया और साक्षात्कार चरण तक सफलतापूर्वक पहुंचे। उन्होंने साक्षात्कार में शामिल होने के लिए उत्तराखंड हाइकोर्ट से अनुमति मांगी, जिसे अस्वीकार कर दिया गया।
इस इनकार से आहत होकर उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और तर्क दिया कि इससे उनके आवागमन, निवास, बसने और पेशा अपनाने के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले एक अंतरिम आदेश के जरिए उन्हें दिल्ली न्यायिक सेवा के साक्षात्कार में शामिल होने की अनुमति दी थी। बाद में घोषित परिणामों में दोनों अधिकारी चयनित पाए गए और उनकी नियुक्ति दिल्ली न्यायिक सेवा में सुनिश्चित हो गई।
हालांकि, उत्तराखंड हाइकोर्ट ने इसका विरोध करते हुए कहा कि यदि अधिकारियों को अन्य राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों की न्यायिक सेवाओं में जाने की अनुमति दी गई, तो इससे राज्य की न्यायिक सेवा कमजोर होगी और वादकारियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
इस दलील को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल रिक्तियां उत्पन्न होने की आशंका के आधार पर किसी अधिकारी को दूसरे राज्य की न्यायिक सेवा में शामिल होने से नहीं रोका जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के हित, उत्तराखंड न्यायिक सेवा और हाइकोर्ट के प्रशासनिक हितों से ऊपर हैं। रिक्तियां समय रहते नई भर्ती के माध्यम से भरी जा सकती हैं, लेकिन यदि याचिकाकर्ताओं को अनुमति नहीं दी गई तो इससे नकारात्मकता, हताशा और संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा।
इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि उत्तराखंड हाइकोर्ट आवश्यक कदम उठाकर उनकी सेवा समाप्ति का आदेश पारित करे, ताकि वे 13 फरवरी 2026 से पहले दिल्ली न्यायिक सेवा में शामिल हो सकें।

