खरीदार-विक्रेता दोनों के दोषी होने पर बयाना राशि की ज़ब्ती अनुचित: सुप्रीम कोर्ट

Praveen Mishra

6 Jan 2026 7:43 PM IST

  • खरीदार-विक्रेता दोनों के दोषी होने पर बयाना राशि की ज़ब्ती अनुचित: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि जब किसी अनुबंध के निष्पादन में खरीदार और विक्रेता—दोनों ही पक्ष दोषी हों, तो खरीदार द्वारा जमा की गई बयाना राशि (earnest money) की ज़ब्ती का आदेश देना उचित नहीं होगा, क्योंकि इससे विक्रेता को अन्यायपूर्ण लाभ मिलेगा।

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने उस खरीदार की अपील पर निर्णय सुनाया, जिसने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित विशिष्ट निष्पादन (specific performance) के डिक्री को readiness and willingness के अभाव में रद्द करते हुए बयाना राशि की ज़ब्ती की अनुमति दी गई थी। यह विवाद 22 जनवरी 2008 के एक समझौते से जुड़ा था, जिसके तहत अशोक विहार, दिल्ली स्थित 300 वर्ग गज संपत्ति ₹6.11 करोड़ में बेचने का अनुबंध हुआ था। खरीदार ने ₹60 लाख बयाने के रूप में और बाद में ₹30 लाख अतिरिक्त भुगतान किया था। ट्रायल कोर्ट ने फरवरी 2021 में विशिष्ट निष्पादन का डिक्री पारित किया था, मगर हाईकोर्ट ने सितंबर 2025 में फैसला पलटते हुए कहा कि खरीदार शेष ₹5.21 करोड़ चुकाने की वित्तीय क्षमता साबित नहीं कर सका, और बयाना राशि ज़ब्त करने की अनुमति दे दी, जबकि अतिरिक्त ₹30 लाख ब्याज सहित लौटाने का निर्देश दिया।

    आंशिक रूप से अपील स्वीकार करते हुए जस्टिस नाथ द्वारा लिखित निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने readiness and willingness के संबंध में हाईकोर्ट के निष्कर्ष को बरकरार रखा, लेकिन बयाना राशि ज़ब्त करने के निर्देश से असहमति जताई। अदालत ने कहा कि इस मामले में दोनों पक्ष दोषी थे—खरीदार अपनी वित्तीय तत्परता साबित नहीं कर सका, वहीं विक्रेता संपत्ति के म्यूटेशन और लीज़होल्ड से फ्रीहोल्ड में परिवर्तन संबंधी संविदात्मक दायित्व पूरे नहीं कर पाया। ऐसे में न्यायसंगत समाधान वही होगा जो किसी एक पक्ष को अनुचित लाभ न दे।

    अदालत ने कहा कि न्याय और इक्विटी का सिद्धांत यह मांग करता है कि जहाँ दोनों पक्ष दोषी हों, वहाँ पक्षकारों को यथासंभव उनकी मूल स्थिति में लौटाया जाए और किसी को भी अनुचित समृद्धि का लाभ न मिले। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि “पूर्ण न्याय” करने और पक्षकारों के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए प्रतिवादियों को चार सप्ताह के भीतर खरीदार को ₹3,00,00,000 (तीन करोड़ रुपये) की एकमुश्त राशि का भुगतान करना होगा। अदालत ने कहा कि यह उपाय खरीदार का समुचित प्रतिकर करेगा, आगे के विवादों से बचाएगा और दस से अधिक वर्षों से लंबित इस विवाद का शांतिपूर्ण समाधान सुनिश्चित करेगा। हाईकोर्ट के निर्णय में इसी सीमा तक संशोधन किया

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    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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