सुप्रीम कोर्ट ने CEC को आजीवन प्रतिरक्षा को चुनौती देने वाली मनोज झा की याचिका पर नोटिस जारी किया, कहा- कोई और याचिका दायर न की जाए

  • सुप्रीम कोर्ट ने CEC को आजीवन प्रतिरक्षा को चुनौती देने वाली मनोज झा की याचिका पर नोटिस जारी किया, कहा- कोई और याचिका दायर न की जाए

    सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को राजद सांसद मनोज कुमार झा और एक्टिविस्ट-एडवोकेट अरुण अग्रवाल द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यालय की अवधि) अधिनियम, 2023 की धारा 16 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर नोटिस जारी किया, जो आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में किए गए कार्यों के लिए CEC और चुनाव आयुक्तों को नागरिक और आपराधिक प्रतिरक्षा प्रदान करता है।

    धारा 16 अदालतों को किसी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ नागरिक या आपराधिक कार्यवाही पर विचार करने या जारी रखने से रोकती है, जो आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में कार्य करने या कार्य करने के दौरान किए गए, किए गए या बोले गए किसी कार्य, बात या शब्द के लिए सीईसी या चुनाव आयुक्त है या था।

    याचिकाओं में तर्क दिया गया कि धारा 16 संविधान के अनुच्छेद 14, 21, 32, 129, 215, 226 और 324 का उल्लंघन होने के कारण असंवैधानिक और शून्य है।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस मोहना की पीठ ने नोटिस जारी किया और याचिकाओं को NGO लोक प्रहरी द्वारा दायर लंबित चुनौती के साथ टैग कर दिया। मामलों को 18 दिसंबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया।

    सुनवाई के दौरान, CJI ने काफी हद तक समान मुद्दों को उठाने वाली कई याचिकाएं दायर करने को यह देखते हुए हतोत्साहित किया कि बार-बार याचिका दायर करने से दलीलें पूरी होने में देरी होती है और अदालत का ध्यान मुख्य चुनौती से हट जाता है।

    CJI ने टिप्पणी की,

    "हमारा एकमात्र अनुरोध यह है कि अब याचिका दायर करना बंद करें अन्यथा दलीलें कभी पूरी नहीं होंगी। अधिक मामले दायर करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि सभी बिंदुओं पर विस्तृत विचार किया गया है। हमें कभी भी मुख्य मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करने का मौका नहीं मिलेगा।"

    उन्होंने कहा कि अगर मौजूदा याचिका में कोई सचमुच महत्वपूर्ण बिंदु छूट गया तो नई याचिका पर विचार किया जा सकता है। हालांकि, उन्होंने सुझाव दिया कि लंबित कार्यवाही में पक्षकार बनना और अतिरिक्त मुद्दा उठाना एक विकल्प हो सकता है।

    CJI ने कहा,

    "हम किसी को नहीं रोकेंगे, लेकिन इसे दोहराएंगे... हमें उम्मीद है कि बार के सदस्यों को इससे बचने के लिए मनाया जा सकता है, अन्यथा इससे मुख्य मुद्दे में देरी होगी।"

    धारा 16 संविधान के साथ 'धोखाधड़ी': मनोज झा की याचिका

    झा की याचिका में धारा 16 को संविधान के साथ "धोखाधड़ी" बताया गया और तर्क दिया गया कि यह एक सामान्य क़ानून के माध्यम से चुनाव आयुक्तों को अभूतपूर्व, आजीवन प्रतिरक्षा प्रदान करता है।

    झा का तर्क है कि यह छूट राष्ट्रपति, राज्यपालों, विधायकों या संवैधानिक अदालतों के न्यायाधीशों को दी गई सुरक्षा से कहीं अधिक व्यापक है। उनका तर्क है कि अनुच्छेद 324 इस तरह की सुरक्षा पर विचार नहीं करता है और संसद चुनाव आयुक्तों को उनके जीवनकाल के लिए न्यायिक जांच से परे रखने के लिए सेवा की शर्तें निर्धारित करने की अपनी शक्ति का उपयोग नहीं कर सकती है।

    याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि धारा 16 को पर्याप्त जांच या सार्वजनिक परामर्श के बिना, संसद द्वारा 2023 कानून पारित करने से कुछ समय पहले एक आधिकारिक संशोधन के माध्यम से पेश किया गया। इसमें आगे तर्क दिया गया है कि यह प्रावधान काफी हद तक जज (संरक्षण) अधिनियम, 1985 की नकल करता है, जबकि जजों के खिलाफ कार्यवाही शुरू करने के लिए संवैधानिक अदालतों और सरकार की शक्ति को संरक्षित करने वाले सुरक्षा उपायों को छोड़ देता है।

    झा की ओर से वकील फ़ौज़िया शकील पेश हुईं।

    अग्रवाल की याचिका में भी यही तर्क दिया गया कि संविधान राष्ट्रपति, विधायकों या संवैधानिक अदालतों के जजों को भी ऐसी पूर्ण छूट (इम्युनिटी) नहीं देता है। इसमें कहा गया कि चुनाव आयुक्तों का कार्यकाल पहले से ही सुरक्षित है, इसलिए उन्हें जवाबदेही से पूरी तरह छूट देने का कोई औचित्य नहीं है। याचिका में तर्क दिया गया कि यह प्रावधान मतदाताओं, उम्मीदवारों और अन्य नागरिकों से उन कानूनी उपायों (सिविल और आपराधिक) को छीन लेता है, जो वे चुनाव आयुक्तों की कथित गलतियों से पीड़ित होने पर अपना सकते थे।

    अग्रवाल की ओर से वकील नेहा राठी पेश हुईं।

    लोक प्रहरी और ADR द्वारा पहले दी गई चुनौतियां

    सुप्रीम कोर्ट में 'लोक प्रहरी' और 'एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स' (ADR) द्वारा धारा 16 को दी गई चुनौतियां पहले से ही विचाराधीन हैं।

    जनवरी 2026 में कोर्ट ने लोक प्रहरी की याचिका पर नोटिस जारी किया था। इस याचिका में कहा गया है कि संवैधानिक ढांचे के तहत जीवन भर के लिए ऐसी छूट नहीं दी जा सकती।

    लोक प्रहरी ने पहले यह तर्क दिया कि अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को कानून से ऊपर नहीं रखता है। यह विवादित प्रावधान मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों को ऐसी असाधारण छूट देता है, जो राष्ट्रपति और राज्यपालों को भी प्राप्त नहीं है।

    इसमें यह भी बताया गया कि मूल विधेयक में धारा 16 शामिल नहीं थी, बल्कि इसे अंतिम समय में जोड़ा गया था। जबकि इस कानून का बचाव यह कहकर किया जा रहा है कि इसे अनुच्छेद 324(2) के तहत लाया गया, जो CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित है।

    जनवरी में लोक प्रहरी ने इस प्रावधान पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की थी। उनका तर्क था कि इससे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की प्रक्रिया को लगातार और अपूरणीय नुकसान हो रहा है। उस समय कोर्ट ने धारा 16 पर रोक लगाने से इनकार किया, लेकिन इस सवाल पर नोटिस जारी किया कि क्या संवैधानिक ढांचे के भीतर ऐसी छूट दी जा सकती है।

    13 अक्टूबर 2026 को कोर्ट ने धारा 16 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली ADR की याचिका पर नोटिस जारी किया। ADR ने मांग की कि मौजूदा और पूर्व चुनाव आयुक्तों के खिलाफ उन सिविल और आपराधिक मामलों को फिर से शुरू किया जाए, जिन्हें इस प्रावधान के लागू होने के बाद बंद कर दिया गया था।

    Case Title : Manoj Kumar Jha v. Union of India

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