सुप्रीम कोर्ट ने MCOCA मामले में AAP के पूर्व विधायक नरेश बाल्यान की ज़मानत अर्ज़ी पर नोटिस जारी किया

Shahadat

24 Aug 2026 3:25 PM IST

  • सुप्रीम कोर्ट ने MCOCA मामले में AAP के पूर्व विधायक नरेश बाल्यान की ज़मानत अर्ज़ी पर नोटिस जारी किया

    सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (MCOCA) के तहत दर्ज मामले में आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व विधायक नरेश बाल्यान की ज़मानत अर्ज़ी पर नोटिस जारी किया।

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने दिल्ली सरकार को अपना जवाब (काउंटर एफिडेविट) दाखिल करने के लिए चार हफ़्ते का समय दिया।

    अभियोजन पक्ष का मामला कथित तौर पर गैंगस्टर कपिल सांगवान द्वारा चलाए जा रहे एक संगठित अपराध सिंडिकेट से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार, सांगवान और उसके साथी जबरन वसूली, धमकी देने, गोलीबारी और ज़मीन-जायदाद हड़पने के कई मामलों में शामिल थे। अभियोजन का आरोप है कि सिंडिकेट ने जबरन वसूली के लिए व्यापारियों और प्रॉपर्टी डीलरों को धमकाया और ज़मीन मालिकों को कम कीमत पर प्लॉट बेचने के लिए मजबूर करने के लिए भी धमकियों का इस्तेमाल किया।

    बाल्यान ने दिल्ली हाईकोर्ट के 3 अगस्त के उस फ़ैसले को चुनौती दी, जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा ज़मानत देने से इनकार करने के ख़िलाफ़ उनकी अपील को खारिज कर दिया गया। यह मामला दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच द्वारा 28 अगस्त, 2024 को MCOCA की धारा 3 और 4 के तहत दर्ज FIR से जुड़ा है। बाल्यान को 4 दिसंबर, 2024 को गिरफ़्तार किया गया। उनकी पहली ज़मानत अर्ज़ी ट्रायल कोर्ट ने 15 जनवरी, 2025 को खारिज की, जबकि दूसरी अर्ज़ी 27 मई, 2025 को खारिज कर दी गई।

    ज़मानत देने से इनकार करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि ज़मानत के चरण में ऐसे पर्याप्त सबूत मौजूद थे, जो कपिल सांगवान के नेतृत्व वाले संगठित अपराध सिंडिकेट के साथ बाल्यान के कथित संबंध को दिखाते हैं। सिंडिकेट की गतिविधियों के संबंध में लगभग 17 FIR दर्ज की गईं।

    बाल्यान के मामले में अभियोजन पक्ष ने उनके और सांगवान के बीच कथित बातचीत, सुरक्षित गवाहों के बयानों, सह-आरोपियों के इकबालिया बयानों और जांच के दौरान इकट्ठा किए गए अन्य सबूतों का सहारा लिया। अभियोजन का आरोप है कि बाल्यान ने जबरन वसूली के लिए संभावित लक्ष्यों की पहचान करके और संपत्तियों को लेकर विवाद पैदा करने में मदद करके सिंडिकेट की मदद की, जिसके बाद सिंडिकेट ने कथित तौर पर संपत्ति मालिकों को धमकाया और उन्हें अपनी संपत्तियां कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर किया।

    हाईकोर्ट ने यह भी गौर किया कि सोशल मीडिया पर एक ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग वायरल हुई, जिसमें कथित तौर पर बाल्यान और सांगवान के बीच बातचीत थी। बालियान की आवाज़ का सैंपल तय कोर्ट की मंज़ूरी से लिया गया और फोरेंसिक रिपोर्ट के मुताबिक, यह रिकॉर्डिंग में मौजूद आवाज़ से मेल खाता था। हालांकि, कोर्ट ने यह भी माना कि दूसरी तरफ़ से कॉल करने वाले की पहचान के बारे में पूरी तरह साफ़ जानकारी नहीं थी।

    अभियोजन पक्ष ने सह-आरोपी रोहित शर्मा और सचिन छिकारा के 2 और 3 दिसंबर, 2024 को दर्ज किए गए कबूलनामे पर भी भरोसा किया। हाईकोर्ट ने कहा कि उन बयानों से पीछे हटने (Retraction) के किसी भी सवाल की जांच ट्रायल के दौरान की जानी चाहिए और ज़मानत के चरण में उन बयानों को पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता।

    बालियान ने हाई कोर्ट के सामने दलील दी थी कि MCOCA लागू करना कानूनी रूप से सही नहीं था, क्योंकि उनके खिलाफ़ कोई नई लगातार गैर-कानूनी गतिविधि नहीं पाई गई। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष ने बिना किसी नए अपराध को दिखाए पुरानी FIR और चार्जशीट पर भरोसा किया और ऐसा कोई सबूत नहीं था, जिससे यह साबित हो सके कि वह संगठित अपराध सिंडिकेट का सदस्य था।

    हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया कि पिछले दस वर्षों में एक से अधिक चार्जशीट (जिन पर संज्ञान लिया गया हो) की कानूनी ज़रूरत बालियान के खिलाफ़ व्यक्तिगत रूप से पूरी होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि यह ज़रूरत सिंडिकेट पर केंद्रित थी और मुख्य सवाल यह था कि क्या आरोपी का संगठित अपराध सिंडिकेट के साथ कोई संबंध था।

    हाईकोर्ट ने बालियान की इस दलील को भी खारिज किया कि अलग MCOCA FIR दर्ज करना 'डबल जियोपार्डी' (एक ही अपराध के लिए दो बार मुकदमा चलाना) के बराबर है। कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी या तो मौजूदा FIR में MCOCA के प्रावधानों को शामिल कर सकती है या ज़रूरी मंज़ूरी लेने के बाद नई FIR दर्ज कर सकती है।

    ज़मानत के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने कहा कि MCOCA की धारा 21(4) के तहत कोर्ट को इस बात का यकीन होना चाहिए कि यह मानने के लिए उचित आधार हैं कि आरोपी अपराध का दोषी नहीं है और ज़मानत पर रहने के दौरान उसके द्वारा कोई अपराध करने की संभावना नहीं है।

    आखिरकार हाईकोर्ट ने माना कि जांच के दौरान इकट्ठा किए गए सबूतों से बालियान और सिंडिकेट के बीच एक स्पष्ट संबंध का पता चलता है और लगातार गैर-कानूनी गतिविधि का तत्व मौजूद था। इसलिए कोर्ट को उनकी अपील में कोई दम नहीं लगा और उनकी ज़मानत अर्ज़ी खारिज की।

    कोर्ट ने यह भी नोट किया कि ट्रायल कोर्ट में आरोप तय करने (चार्ज) पर बहस पहले से ही चल रही थी। अदालत ने कहा कि भले ही बाल्यान को जल्द सुनवाई का अधिकार था, लेकिन सिर्फ़ लंबे समय तक हिरासत में रहने को MCOCA के कड़े प्रावधानों वाले मामले में ज़मानत देने के लिए निर्णायक कारक नहीं माना जा सकता।

    Case Title – Naresh Balyan v. NCT of Delhi

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