बिना प्रभावी सुनवाई का अवसर दिए विदेशी तलाक डिक्री मान्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट
Praveen Mishra
19 March 2026 1:16 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी विदेशी अदालत द्वारा दिया गया तलाक का डिक्री तब तक भारत में मान्य नहीं होगा, जब तक कि दूसरे पक्ष को उस कार्यवाही में प्रभावी और सार्थक रूप से भाग लेने का अवसर न दिया गया हो।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें अमेरिकी अदालत द्वारा दिए गए तलाक के आदेश को मान्यता दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि पति को अमेरिकी कार्यवाही में ना तो प्रभावी सुनवाई का अवसर मिला और ना ही उसने उसमें सार्थक भागीदारी की।
क्या था मामला?
यह मामला वर्ष 2005 में मुंबई में हुए विवाह से जुड़ा है, जिसमें दोनों पक्ष भारतीय नागरिक थे और बाद में अमेरिका में रहने लगे। वैवाहिक विवाद के बाद पत्नी ने मिशिगन (अमेरिका) की अदालत में तलाक की याचिका दायर की।
पति ने अमेरिकी अदालत के अधिकार क्षेत्र को चुनौती देते हुए लिखित जवाब दाखिल किया, लेकिन मुकदमे की सुनवाई में भाग नहीं लिया। इसके बाद अमेरिकी अदालत ने “irretrievable breakdown of marriage” (विवाह का अपरिवर्तनीय विघटन) के आधार पर 2009 में तलाक दे दिया।
इसी दौरान पति ने भारत में पुणे फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की, जहां विदेशी डिक्री को मान्यता नहीं दी गई। हालांकि, बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस निर्णय को पलटते हुए अमेरिकी डिक्री को मान्य माना था।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 में “irretrievable breakdown of marriage” तलाक का वैध आधार नहीं है
विदेशी डिक्री को मान्यता तभी दी जा सकती है, जब वह भारतीय कानून के अनुरूप हो
केवल समन भेज देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि दूसरे पक्ष को वास्तविक और प्रभावी सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए
कोर्ट ने Y. Narasimha Rao V. Y. Venkata Lakshmi (1991) मामले का हवाला देते हुए कहा कि विदेशी तलाक डिक्री तभी मान्य होगी जब:
तलाक का आधार भारतीय कानून में मान्य हो
दूसरा पक्ष स्वेच्छा से विदेशी अदालत के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार करे और मुकदमे में भाग ले
या उसने तलाक के लिए सहमति दी हो
कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि इन शर्तों का पालन नहीं हुआ है, इसलिए अमेरिकी अदालत का तलाक डिक्री भारत में मान्य नहीं है।
हालांकि, अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का उपयोग करते हुए स्वयं ही विवाह को अपरिवर्तनीय विघटन के आधार पर समाप्त (तलाक) कर दिया।
इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विदेशी तलाक डिक्री को मान्यता देने के लिए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन अनिवार्य है।

