सुप्रीम कोर्ट ने पब्लिक प्रॉसिक्यूटर की कमी पर चिंता जताई, कहा - इससे ट्रायल में देरी होती है

Shahadat

22 May 2026 5:53 PM IST

  • सुप्रीम कोर्ट ने पब्लिक प्रॉसिक्यूटर की कमी पर चिंता जताई, कहा - इससे ट्रायल में देरी होती है

    सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों में पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (सरकारी वकील) की कमी को आपराधिक मामलों के ट्रायल में देरी का एक बड़ा कारण बताया, और राज्य सरकारों से आग्रह किया कि वे सेशन कोर्ट के हर कोर्टरूम में कम से कम एक प्रॉसिक्यूटर नियुक्त करें।

    उन्होंने कहा,

    "देखिए, कम-से-कम प्रॉसिक्यूटर तो नियुक्त कीजिए। हर ज़िला और सेशन कोर्ट हॉल के लिए - कोर्ट नहीं, कोर्ट हॉल के लिए। हर पीठासीन अधिकारी के पास एक खास प्रॉसिक्यूटर होना चाहिए। अब वह प्रॉसिक्यूटर किसी दूसरे ज़िले से सिर्फ़ कुछ खास दिनों पर ही न आए, और सिर्फ़ उन्हीं दिनों पर सेशन ट्रायल हों। यह सब क्या है?"

    जस्टिस नागरत्ना ने आगे कहा कि राज्य अक्सर आपराधिक न्याय में देरी की शिकायत करते हैं, लेकिन प्रॉसिक्यूटर के खाली पदों को भरकर प्रॉसिक्यूटर की कमी जैसी समस्याओं को दूर करने में नाकाम रहते हैं।

    उन्होंने कहा,

    "राज्य कुछ नहीं कर रहे हैं और बस यही कह रहे हैं कि 'आपराधिक न्याय में देरी हो रही है, आपराधिक न्याय में देरी हो रही है'... समस्या कहां है? हर राज्य में प्रॉसिक्यूशन निदेशालय इन सब बातों पर ध्यान क्यों नहीं दे रहा है? आप प्रॉसिक्यूशन की परीक्षाएं समय पर नहीं करवा रहे हैं। ऐसे लोग हैं, जो नियुक्ति का इंतज़ार कर रहे हैं... राज्यों को इन सब बातों पर ध्यान देना चाहिए। हम देखते हैं कि वे बयान देते हैं कि 'देश में आपराधिक न्याय देने में देरी हो रही है, देरी हो रही है, देरी हो रही है।' समस्या कहाँ से आ रही है?"

    जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने ये टिप्पणियां तब कीं, जब वे नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेस एक्ट, 1985 (NDPS Act) के तहत गिरफ़्तार एक आरोपी को ज़मानत दे रहे थे; यह आरोपी तीन साल से ज़्यादा समय से हिरासत में था।

    कोर्ट ने अपीलकर्ता को ज़मानत दी। अपीलकर्ता को 4 मार्च, 2023 को NDPS Act की धारा 8(b), 8(c) और 18(c) के तहत दर्ज मामले में गिरफ़्तार किया गया था। कोर्ट ने यह देखते हुए ज़मानत दी कि इन अपराधों के लिए अधिकतम दस साल की जेल की सज़ा हो सकती है।

    कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता तीन साल और दो महीने तक हिरासत में रहा था। अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि प्रॉसिक्यूशन ने 46 गवाहों की जांच करने का प्रस्ताव रखा है, जिनमें से अब तक सिर्फ़ छह की ही जाँच हो पाई; इसलिए ट्रायल में निश्चित रूप से देरी होगी। इस दलील को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने ज़मानत दी।

    आदेश पारित करने के बाद जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की कि अभियोजकों की कमी देरी का एक कारण है, जिससे आरोपी को "अपरिहार्य देरी" के कारण ज़मानत मिल जाती है। फिर वे फ़रार हो जाते हैं।

    जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि भले ही अदालतें ट्रायल का शेड्यूल तैयार कर लें, लेकिन अगर अभियोजक उपलब्ध न हों तो मामले आगे नहीं बढ़ पाते।

    उन्होंने कहा,

    "भले ही ट्रायल का टाइमटेबल बना लिया जाए, लेकिन अभियोजक उस दिन आकर केस शुरू नहीं कर पाते। इसलिए यह दलील दी जाती है कि ट्रायल में अनिवार्य रूप से देरी होगी। इस आधार पर ज़मानत दी जाती है। फिर वे फ़रार हो जाते हैं। ऐसे में ट्रायल का क्या होता है? किसी को तो इन सब बातों पर गौर करना चाहिए और इन्हें लागू करना चाहिए।"

    उन्होंने टिप्पणी की,

    "बार (वकीलों के समूह) को भी ट्रायल को तेज़ी से पूरा करने के संबंध में कोई-न-कोई रास्ता निकालना चाहिए। इसका एक तरीका यह है कि ज़्यादा अदालतें हों, ज़्यादा अदालतें मतलब ज़्यादा जज। हर अदालत के लिए एक अलग अभियोजक होना चाहिए; ऐसा नहीं होना चाहिए कि कई कोर्ट रूम के लिए सिर्फ़ एक ही अभियोजक हो। देरी का यही मुख्य कारण है।"

    जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने इसमें यह भी जोड़ा कि अक्सर अदालतों के निर्माण के लिए बजट में कोई प्रावधान ही नहीं होता।

    उन्होंने इस प्रथा की आलोचना की, जिसके तहत अभियोजकों को एक ज़िले से दूसरे ज़िले तक यात्रा करनी पड़ती है और वे सेशन ट्रायल केवल कुछ ही दिनों के लिए संचालित कर पाते हैं।

    जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की,

    "ऐसा नहीं हो सकता कि कोई अभियोजक किसी दूसरे ज़िले से या किसी दूसरी जगह से चलकर इस जगह पर हफ़्ते में सिर्फ़ दो दिन आए। उन्हीं दो दिनों में सेशन ट्रायल चलाया जाए। यह तरीका बिल्कुल भी सही नहीं है।"

    अदालत में मौजूद सरकारी वकील को संबोधित करते हुए उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि न्यायपालिका तो केवल सुझाव ही दे सकती है, लेकिन उन्हें लागू करने का काम तो सरकारों का ही है।

    उन्होंने कहा,

    "आप हमसे पूछिए, हम आपको सुझाव ज़रूर देंगे। लेकिन क्या आप उन्हें लागू भी करेंगे? असली मुद्दा तो यही है। आप सभी सरकारी वकील कृपया अपनी-अपनी सरकारों को यह सलाह दें कि वे अदालतों में अभियोजकों और पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (PPs) की नियुक्ति करें।"

    उन्होंने आगे कहा कि जिन बड़े राज्यों में अपराध की दर ज़्यादा है, वहां अभियोजकों की नियुक्ति और उनकी पर्याप्त संख्या पर विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है; उन्होंने सरकारी वकील से आग्रह किया कि वे इस मुद्दे को विधि मंत्री, एडवोकेट जनरल और अभियोजन निदेशक के समक्ष ज़रूर उठाएं।

    "आप सभी जो सरकारी वकील के तौर पर यहां पेश हो रहे हैं, कृपया इस मुद्दे को विधि मंत्री, एडवोकेट जनरल और अभियोजन निदेशक के संज्ञान में ज़रूर लाएं। साथ ही गर्मियों की छुट्टियों का सदुपयोग करते हुए आप इस समय का इस्तेमाल इन सभी मामलों पर विचार-विमर्श करने और यह सुनिश्चित करने में करें कि प्रभावी सुझावों को सही मायनों में लागू किया जा सके।"

    यह अपील गुजरात हाईकोर्ट के उस आदेश के विरुद्ध दायर की गई, जिसमें आरोपी को ज़मानत देने से साफ़ इनकार कर दिया गया। अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि अपीलकर्ता के खेत से 141 किलोग्राम अफ़ीम ज़ब्त की गई, जहां कथित तौर पर वह अफ़ीम की खेती कर रहा था।

    राज्य सरकार ने 'यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाम विजिन के. वर्गीस' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का हवाला देते हुए ज़मानत का विरोध किया था, और यह तर्क दिया था कि केवल जेल में बिताई गई अवधि के आधार पर ज़मानत पर रिहाई को सही नहीं ठहराया जा सकता।

    इस दलील को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने यह फ़ैसला दिया कि इस मामले के तथ्यों को देखते हुए मुक़दमे में हुई देरी ज़मानत का आधार नहीं बन सकती।

    Case Title – Dolubhai Vihabhai Gohil v. State of Gujarat

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