सिविल डिक्री को तेज़ी से लागू करने में रुकावट बनने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के फैसलों पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता

  • सिविल डिक्री को तेज़ी से लागू करने में रुकावट बनने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के फैसलों पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता

    सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि उसे दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच के उस फ़ैसले के बारे में कुछ करना होगा, जो ज़ाहिर तौर पर कोर्ट के लिए 'एक्ज़ीक्यूशन याचिकाओं' (फ़ैसले को लागू करने की याचिकाओं) का तेज़ी से निपटारा करने में बाधा बन रहा है। साथ ही कोर्ट ने उम्मीद भी जताई क्योंकि पिछले छह महीनों में बड़ी संख्या में एक्ज़ीक्यूशन याचिकाओं का निपटारा किया गया, खासकर गुजरात हाईकोर्ट की अगुवाई में।

    जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच देश भर में लंबित एक्ज़ीक्यूशन याचिकाओं के निपटारे से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही है।

    बता दें, 6 मार्च 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट्स से देश भर की ज़िला अदालतों में लंबित 8.8 लाख एक्ज़ीक्यूशन याचिकाओं का डेटा इकट्ठा करने को कहा था। कोर्ट ने इस मामले में सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन को 'एमिक्स क्यूरी' (न्यायालय मित्र) नियुक्त किया और याचिकाओं के निपटारे के लिए छह महीने की समय-सीमा तय की।

    सुनवाई में एमिक्स क्यूरी ने अपनी रिपोर्ट का ज़िक्र करते हुए बताया कि पिछले छह महीनों में दिल्ली हाईकोर्ट के सामने लगभग 17,000 नई एक्ज़ीक्यूशन याचिकाएँ लंबित हो गईं। उन्होंने कहा कि इसकी वजह यह हो सकती है कि दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच ने 'दिल्ली केमिकल्स एंड फार्मास्युटिकल वर्क्स प्राइवेट लिमिटेड (2021)' मामले में 'भंडारी इंजीनियर्स' मामले के पुराने फ़ैसले में बदलाव किया। उस पुराने फ़ैसले में सिंगल जज ने एक्ज़ीक्यूशन याचिकाओं के निपटारे के मक़सद से 'जजमेंट-डेटर' (जिसके ख़िलाफ़ फ़ैसला आया है) के लिए अपनी संपत्ति और आय का खुलासा करने के लिए ज़रूरी गाइडलाइंस तय की थीं।

    इस पर जस्टिस पारदीवाला ने पूछा कि क्या डिवीज़न बेंच के फ़ैसले को चुनौती दी गई या नहीं।

    कोर्ट ने कहा,

    "क्या आपने उस डिवीज़न बेंच के फैसले को रिकॉर्ड पर रखा है या नहीं? क्या यह DB का फैसला दिक्कत पैदा कर रहा है? यह फैसला दो प्राइवेट पार्टियों के बीच हुए मुकदमे में आया था और अब तक किसी ने इस फैसले पर सवाल नहीं उठाया? इस DB फैसले की वजह से, 151 [सिविल प्रक्रिया संहिता कोर्ट को ऐसे आदेश देने का अधिकार देती है, जो न्याय सुनिश्चित करने या कोर्ट की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए ज़रूरी हों] के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। अगर यह बात एग्जीक्यूटिंग कोर्ट्स (फैसला लागू करने वाली अदालतों) के काम में रुकावट बन रही है, तो हमें कुछ करना होगा।"

    इसके बाद जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि कोर्ट डिवीज़न बेंच के फैसले के सिर्फ़ उस खास पैराग्राफ पर विचार करेगा, जिसमें कहा गया था कि सिंगल जज का आदेश सही कानून नहीं है, क्योंकि यह एग्जीक्यूटिंग कोर्ट्स के काम में रुकावट डाल रहा है।

    संबंधित पैराग्राफ में कहा गया:

    "इसलिए हमारी राय है कि 'भंडारी इंजीनियर्स एंड बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड' मामले में जो बात कही गई, उसे सभी मनी डिक्री (पैसे से जुड़े अदालती आदेश) और मनी डिक्री लागू करने वाली सभी अदालतों की कार्यवाही पर लागू करने के हद तक, उसे सही कानून नहीं माना जा सकता। ज़ाहिर है, 'भंडारी इंजीनियर्स एंड बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड' मामले में जो बात कही गई, उसे उस एग्जीक्यूशन कार्यवाही में नहीं अपनाया जा सकता था जिससे यह अपील जुड़ी है।"

    आखिरकार बेंच ने मामले की सुनवाई जारी रखने का फैसला किया और कहा कि वह हाईकोर्ट से हाल ही में मिली एग्जीक्यूशन याचिकाओं के लंबित होने के नए आंकड़ों को शामिल करने के बाद आदेश जारी करेगी। बेंच ने आंकड़ों पर संक्षेप में चर्चा की और कहा कि गुजरात हाईकोर्ट ने एग्जीक्यूशन याचिकाओं को निपटाने में बहुत अच्छा काम किया, और उसके बाद केरल हाईकोर्ट का नंबर आता है। बेंच ने अपने जूनियर की मदद से तैयार की गई एमिक्स क्यूरी (न्याय मित्र) की रिपोर्ट पर भी विचार किया।

    जूनियर द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट से प्रभावित होकर बेंच ने उनसे अनुरोध किया कि जब भी ज़रूरत हो, वे कोर्ट को और मदद दें। आखिर में बेंच ने फिर से कहा कि सरकार को कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट, 2015 में संशोधन करना चाहिए ताकि यह साफ़ हो सके कि कमर्शियल मुकदमों में फ़ैसले का अमल कमर्शियल कोर्ट के नियमों के मुताबिक होगा; ये नियम 2021 से नोटिफ़ाई नहीं किए गए। मामले की अगली सुनवाई अगले बुधवार को तय करते हुए बेंच ने कहा कि वह कुछ ऐसी बातें कहेगी, जिनसे केंद्र सरकार को संशोधन लाने में मदद मिलेगी।

    Case Title : PERIYAMMAL DEAD THR. LRS. Vs V. RAJAMANI

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