सुप्रीम कोर्ट ने सर्विस के लिए चुकाई गई कीमत के आधार पर कंज्यूमर फोरम का अधिकार क्षेत्र तय करने में विसंगतियों की ओर इशारा किया, केंद्र से जवाब मांगा

Shahadat

18 Aug 2026 1:18 PM IST

  • सुप्रीम कोर्ट ने सर्विस के लिए चुकाई गई कीमत के आधार पर कंज्यूमर फोरम का अधिकार क्षेत्र तय करने में विसंगतियों की ओर इशारा किया, केंद्र से जवाब मांगा

    सुप्रीम कोर्ट ने कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट, 2019 के प्रावधानों से जुड़ी कुछ विसंगतियों की ओर ध्यान दिलाया। ये विसंगतियां तब पैदा हो सकती हैं जब कंज्यूमर फोरम का आर्थिक अधिकार क्षेत्र (Pecuniary Jurisdiction) कंज्यूमर द्वारा सामान या सर्विस के लिए चुकाई गई कीमत (कंसीडरेशन) के आधार पर तय किया जाए। कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा है।

    1986 के पुराने एक्ट में कंज्यूमर कमीशन का आर्थिक अधिकार क्षेत्र सामान या सर्विस की कुल कीमत और मांगे गए मुआवजे के आधार पर तय होता था। इसके विपरीत, कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट, 2019 में अधिकार क्षेत्र की गणना को सिर्फ सामान या सर्विस के लिए चुकाई गई कीमत तक सीमित करके एक बड़ा बदलाव किया गया।

    जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की बेंच असल में इंश्योरेंस कॉन्ट्रैक्ट से जुड़े कंज्यूमर विवाद पर विचार कर रही थी। सुनवाई के दौरान, बेंच ने इस मामले को एक बड़े मुद्दे के तौर पर देखा।

    बीमा कराने वाले याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर वकील गगन गुप्ता ने उन विसंगतियों पर प्रकाश डाला, जो तब पैदा हो सकती हैं, जब कंज्यूमर फोरम का आर्थिक अधिकार क्षेत्र सामान या सर्विस खरीदने के लिए चुकाई गई कीमत के आधार पर तय किया जाए।

    उदाहरण के तौर पर सीनियर वकील ने बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) अकाउंट से जुड़े विवाद का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि हालांकि वे बैंकिंग सर्विस के कंज्यूमर हैं, लेकिन बैंक में एफडीFD अकाउंट खोलने के लिए कोई अलग से कीमत (कंसीडरेशन) नहीं चुकाई जाती है। इसलिए अगर कोई विवाद होता है, जैसे पैसे का नुकसान या ब्याज का नुकसान, तो अकाउंट होल्डर कंज्यूमर शिकायत दर्ज नहीं कर पाएगा, क्योंकि अधिकार क्षेत्र अब सर्विस के लिए चुकाई गई कीमत के आधार पर तय होता है, जो कंज्यूमर ने कथित तौर पर नहीं चुकाई है।

    उन्होंने सब्सिडी वाली मेडिकल सर्विस का भी जिक्र किया। जहां कुछ मरीज़ सर्विस के लिए पैसे देते हैं, जबकि दूसरे बिना पैसे दिए सर्विस पाते हैं, वहां सिर्फ कीमत (कंसीडरेशन) के आधार पर आर्थिक अधिकार क्षेत्र तय करने से मुश्किलें पैदा हो सकती हैं, भले ही दोनों कैटेगरी कानूनी तौर पर "कंज्यूमर" की परिभाषा में आती हों।

    इसके अलावा, एक ऐसी स्थिति की ओर भी इशारा किया गया जहां, अगर आर्थिक अधिकार क्षेत्र तय करने का आधार चुकाई गई कीमत को माना जाए तो किसी मामले में - जहां कमी सिर्फ घर/फ्लैट में लगे कुछ फिक्स्चर और फिटिंग में हो - चूंकि कीमत का कोई अलग-अलग ब्योरा उपलब्ध नहीं है, इसलिए सही फोरम के सामने दावा करने के लिए पूरे घर/फ्लैट की कीमत को आधार मानना ​​पड़ सकता है।

    एक और बात जो बताई गई, वह यह कि अगर कोई ग्राहक ₹2.50 करोड़ की कार खरीदता है, लेकिन उसे सिर्फ़ खराब विंडशील्ड (सामने का शीशा) से जुड़ी शिकायत है तो उस विंडशील्ड को बदलने के लिए भी उसे नेशनल कमीशन जाना होगा। वहीं, अगर किसी ग्राहक ने कार के लिए ₹40 लाख का एडवांस दिया और कार की डिलीवरी में देरी हो रही है तो उस ग्राहक को नेशनल कमीशन के बजाय डिस्ट्रिक्ट कमीशन जाना होगा। ऐसा इसलिए है, क्योंकि आर्थिक अधिकार क्षेत्र (Pecuniary Jurisdiction) तय करने का आधार कार की कुल कीमत (यानी ₹2.5 करोड़) नहीं, बल्कि ₹40 लाख होगा।

    कोर्ट ने वकील जगदीश चंद्र सोलंकी की इस बात पर भी ध्यान दिया कि कंज्यूमर से जुड़ी कार्यवाही ज़रूरी नहीं कि सिर्फ़ उसी व्यक्ति द्वारा शुरू की जाए, जिसने खुद पैसे दिए हों। कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट के तहत रजिस्टर्ड कंज्यूमर एसोसिएशन, केंद्र या राज्य सरकारें और सेंट्रल कंज्यूमर प्रोटेक्शन अथॉरिटी भी शिकायत दर्ज करा सकती हैं। ऐसी संस्थाओं द्वारा शुरू की गई कार्यवाही में शिकायतकर्ता द्वारा भुगतान किए गए पैसे का सवाल ही नहीं उठता। कोर्ट के अनुसार, आर्थिक अधिकार क्षेत्र के नियमों को कैसे लागू किया जाए, यह तय करते समय इस बात पर भी विचार करना ज़रूरी है।

    'ऋतु मिहिर पंचाल और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य' (2025 LiveLaw (SC) 503) मामले का हवाला देते हुए केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी ने कहा कि 2019 के एक्ट के तहत आर्थिक अधिकार क्षेत्र से जुड़े नियमों की संवैधानिक वैधता को पहले ही सही ठहराया जा चुका है।

    हालांकि, कोर्ट ने साफ़ किया कि आर्थिक अधिकार क्षेत्र का आधार तय करने की विधायिका की शक्ति को लेकर कोई विवाद नहीं है, लेकिन कोर्ट यह जानना चाहता था कि "ऊपर बताई गई विसंगतियों को देखते हुए आर्थिक अधिकार क्षेत्र कैसे काम करेगा।"

    इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने केंद्र सरकार को ऊपर बताई गई चिंताओं पर एक विस्तृत हलफनामा (Affidavit) दाखिल करने के लिए छह हफ़्ते का समय दिया।

    साथ ही कोर्ट ने 30 दिसंबर, 2021 के नोटिफिकेशन के ज़रिए नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन के आर्थिक अधिकार क्षेत्र को कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट, 2019 के तहत ₹10 करोड़ से घटाकर ₹2 करोड़ करने के बारे में भी स्पष्टीकरण मांगा।

    मामले की सुनवाई के लिए 8 अक्टूबर, 2026 की तारीख तय की गई।

    Cause Title: M/S AVON ELASTOMERS (INDIA) VERSUS M/S BAJAJ ALLIANZ GENERAL INSURANCE CO. LTD & ORS.

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