फैक्ट चेक यूनिट से जुड़े आईटी नियमों पर बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती: सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई को मंजूरी दी
Praveen Mishra
10 March 2026 1:38 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार की उस याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई, जिसमें बॉम्बे हाईकोर्ट के सितंबर 2024 के फैसले को चुनौती दी गई है। इस फैसले में हाईकोर्ट ने आईटी नियमों के उन प्रावधानों को रद्द कर दिया था, जो केंद्र सरकार को फैक्ट चेक यूनिट (FCU) स्थापित करने का अधिकार देते थे।
हालांकि, अदालत ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की उस मांग को खारिज कर दिया, जिसमें हाईकोर्ट के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने की अपील की गई थी।
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने कहा कि यह मामला “अत्यंत महत्वपूर्ण” है और सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर कानून की स्पष्ट व्याख्या करेगा।
क्या है मामला
आईटी नियमों में 2023 में किए गए संशोधन के अनुसार, यदि किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मौजूद सामग्री को सरकार की फैक्ट चेक यूनिट (FCU) फर्जी घोषित करती है और प्लेटफॉर्म उसे हटाने में विफल रहता है, तो उस प्लेटफॉर्म को मिलने वाला “सेफ हार्बर” संरक्षण समाप्त हो सकता है।
सेफ हार्बर का मतलब है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उपयोगकर्ताओं द्वारा पोस्ट किए गए कंटेंट के लिए सीधे जिम्मेदार नहीं होते।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ
सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने कहा कि केंद्र सरकार की याचिका देर से दाखिल की गई है, क्योंकि हाईकोर्ट का फैसला सितंबर 2024 में आया था। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार द्वारा हाल ही में जारी 2025 के नए आईटी नियमों के बाद फैक्ट चेक यूनिट का प्रावधान लगभग अप्रासंगिक हो गया है।
हालांकि चीफ़ जस्टिस ने देरी के आधार पर आपत्ति स्वीकार नहीं की और कहा कि अदालत इस मामले को मूल मुद्दों के आधार पर परखेगी।
चीफ़ जस्टिस ने यह भी कहा कि सोशल मीडिया पर कड़ी और स्पष्ट नियमों की जरूरत है, क्योंकि फर्जी खबरें संस्थानों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकती हैं। उन्होंने कहा कि सेना और पुलिस जैसी संस्थाएं भी फेक न्यूज से प्रभावित हो रही हैं।
जब पीठ ने केंद्र की याचिका पर नोटिस जारी करने की बात कही, तो सॉलिसिटर जनरल ने फिर से हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने की मांग की। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “अभी नहीं। हम सीधे मुख्य मामले का ही फैसला करेंगे।”
हाईकोर्ट का फैसला
इस मामले में जनवरी 2024 में बॉम्बे हाईकोर्ट की दो सदस्यीय पीठ—न्यायमूर्ति गौतम पटेल और न्यायमूर्ति डॉ. नीला गोखले—ने विभाजित फैसला दिया था।
जस्टिस पटेल ने नियमों को असंवैधानिक बताया।
वहीं जस्टिस गोखले ने कुछ सीमित व्याख्या के साथ इन्हें वैध माना।
इसके बाद मामला जस्टिस ए.एस. चंदूरकर को भेजा गया, जिन्होंने न्यायमूर्ति पटेल की राय से सहमति जताते हुए कहा कि यह संशोधन संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लंघन करते हैं और अनुपातिकता (proportionality) के परीक्षण पर खरे नहीं उतरते।
किसने दायर की थीं याचिकाएं
इन नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाएं व्यंग्यकार कुणाल कामरा, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन, और एसोसिएशन ऑफ इंडियन मैगज़ीन्स सहित कई संगठनों ने दायर की थीं।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि ये नियम आईटी एक्ट 2000 की धारा 79 के विपरीत हैं, जो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को तीसरे पक्ष के कंटेंट के लिए सुरक्षा प्रदान करती है। साथ ही ये अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19(1)(a) तथा 19(1)(g) के तहत नागरिकों के मौलिक अधिकारों का भी उल्लंघन करते हैं।
कुणाल कामरा ने अपनी याचिका में कहा था कि वह राजनीतिक व्यंग्यकार हैं और सोशल मीडिया के जरिए अपनी सामग्री साझा करते हैं। ऐसे में यदि सरकार की फैक्ट चेक यूनिट किसी कंटेंट को फर्जी घोषित कर दे, तो उनका कंटेंट हटाया जा सकता है या उनका अकाउंट निलंबित किया जा सकता है, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित होगी।
अब सुप्रीम कोर्ट इस महत्वपूर्ण मामले में अंतिम रूप से तय करेगा कि सरकार द्वारा स्थापित फैक्ट चेक यूनिट का प्रावधान संवैधानिक है या नहीं।

