सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे द्वारा सुरक्षा पर किए गए निवेश को ठीक से न समझाने पर कड़ी नाराज़गी ज़ाहिर की

Shahadat

12 March 2026 10:44 AM IST

  • सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे द्वारा सुरक्षा पर किए गए निवेश को ठीक से न समझाने पर कड़ी नाराज़गी ज़ाहिर की

    सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में रेलवे सुरक्षा और नीतिगत प्राथमिकताओं से जुड़े एक मामले में रेलवे द्वारा कोर्ट की मदद करने के तरीके पर कड़ी नाराज़गी ज़ाहिर की। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर रखे गए दस्तावेज़ों में यह साफ़ तौर पर नहीं बताया गया कि फंड का बंटवारा और इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है।

    इससे पहले, कोर्ट ने रेलवे के लिए बजट में अपर्याप्त आवंटन का मुद्दा उठाया था और सुरक्षा उपायों के बारे में विस्तृत जानकारी मांगी थी।

    इसके बाद रेलवे सुरक्षा के मुख्य आयुक्त, जनक कुमार गर्ग, जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह और जस्टिस आर महादेवन की बेंच के सामने पेश हुए ताकि यात्रियों की सुरक्षा को बेहतर बनाने के लिए उठाए गए कदमों के बारे में बता सकें।

    गर्ग ने सुझाव दिया कि रेलवे ट्रैक के चारों ओर बाड़ लगाने के काम में तेज़ी लाई जानी चाहिए। यह एक बुनियादी सुरक्षा उपाय है, जिससे लोगों और जानवरों के रेलवे लाइन पार करने के कारण होने वाली दुर्घटनाओं को रोका जा सके। उन्होंने कोर्ट को बताया कि 15,000 किलोमीटर से ज़्यादा रेलवे ट्रैक पर पहले ही बाड़ लगाई जा चुकी है। रेलवे की योजना है कि बाकी बचा हुआ काम तीन से चार साल के भीतर पूरा कर लिया जाए।

    उन्होंने यह भी बताया कि रेलवे स्टेशनों पर कई दुर्घटनाएं इसलिए होती हैं, क्योंकि यात्री एक प्लेटफॉर्म से दूसरे प्लेटफॉर्म पर जाने के लिए ट्रैक पार करते हैं। इस समस्या को हल करने के लिए उन्होंने स्टेशनों पर 'फुट ओवर ब्रिज' बनाने का सुझाव दिया और उन स्टेशनों को प्राथमिकता देने को कहा जहाँ यात्रियों की आवाजाही बहुत ज़्यादा होती है।

    इसके अलावा, उन्होंने व्यस्त स्टेशनों पर बुज़ुर्ग नागरिकों के लिए लिफ्ट और दिव्यांग व्यक्तियों के लिए रैंप लगाने का भी प्रस्ताव रखा।

    केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी ने कोर्ट को बताया कि इन सुझावों के बारे में रेलवे अधिकारियों को जानकारी दी जाएगी।

    कोर्ट ने रेलवे की खर्च करने की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाए

    इसके बाद बेंच ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) से उस मुख्य मुद्दे पर मदद मांगी जो उनके सामने था: रेलवे ने अपने निवेश और खर्च को किस तरह प्राथमिकता दी।

    रेलवे द्वारा दायर किए गए एक हलफनामे का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि वह उसके सामने रखे गए वित्तीय आंकड़ों को साफ़ तौर पर समझ नहीं पा रहा है।

    कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा,

    "हलफनामे को ध्यान से देखने के बाद... हम यह साफ़ तौर पर नहीं समझ पा रहे हैं कि असल स्थिति क्या है।"

    कोर्ट ने आगे कहा कि आंकड़ों का मिलान करने की कोशिश करने के बाद भी वह यह नहीं समझ पाया कि हलफनामे में असल में क्या बताया गया।

    बेंच ने इस बात पर "कड़ी नाराज़गी" ज़ाहिर की कि रेलवे ने इस मामले को जिस तरह से संभाला और अधिकारियों ने सरकार के कानूनी अधिकारियों की जिस तरह से मदद की और उन्हें जानकारी दी, वह तरीका ठीक नहीं था।

    कोर्ट के अनुसार, पेश किए गए दस्तावेज़ों से ऐसा लग रहा था कि मामलों को एक खास तरीके से दिखाया जा रहा है, जबकि इसमें व्यापक जनहित या कोर्ट की चिंताओं पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि इन कार्यवाही का मकसद "आम आदमी" को फ़ायदा पहुंचाना है, न कि "कुछ खास लोगों" को, जो रेलवे की सुविधाओं का इस्तेमाल करेंगे। बेंच ने आगे कहा कि रेलवे की नीतियों और बजट आवंटन में यह मकसद झलकता हुआ नहीं दिख रहा है।

    काउंटर से टिकट खरीदने वाले यात्रियों के लिए बीमा को लेकर चिंता

    कोर्ट ने रेलवे यात्रा बीमा के मुद्दे पर भी गौर किया। कोर्ट ने पाया कि जो यात्री ऑनलाइन टिकट बुक करते हैं, वे बहुत कम कीमत पर बीमा का विकल्प चुन सकते हैं, जबकि काउंटर से टिकट खरीदने वाले यात्रियों के लिए यह सुविधा उपलब्ध नहीं है।

    एमिकस क्यूरी (कोर्ट के सलाहकार) और सीनियर वकील शिखिल सूरी ने कोर्ट के सामने इस असमानता का मुद्दा उठाया।

    इसके जवाब में, ASG (एडिशनल सॉलिसिटर जनरल) ने कोर्ट को बताया कि रेलवे अभी भी उन यात्रियों की पहचान करने के लिए एक व्यवस्था बनाने पर काम कर रहा है, जो काउंटर से टिकट खरीदते हैं। ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि धोखाधड़ी वाले दावों को रोका जा सके और साथ ही यात्रियों को बीमा प्रमाणपत्र भी जारी किए जा सकें।

    हालांकि, कोर्ट ने यह साफ़ किया कि टिकट खरीदने के तरीके के आधार पर इस तरह का भेदभाव करना सही नहीं ठहराया जा सकता।

    बेंच ने कहा कि जब रेलवे टिकट बेचता है तो उसे उपलब्ध तकनीक का इस्तेमाल करके यात्रियों की पहचान करने और काउंटर से टिकट खरीदने वाले यात्रियों को भी वही बीमा सुविधा देने के लिए कदम उठाने चाहिए।

    कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि इन कार्यवाही के चलते रहने के बावजूद, ज़मीनी स्तर पर कोई खास प्रगति होती हुई नहीं दिख रही है। कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि केवल सामान्य और नियमित कदम ही बहुत धीमी गति से उठाए जा रहे हैं।

    कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर अगली सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने उचित सहायता और स्पष्ट आंकड़े पेश नहीं किए गए तो कोर्ट इस मामले का न्यायिक संज्ञान ले सकता है और सख़्त निर्देश जारी कर सकता है। इन निर्देशों में ज़मीनी हालात का स्वतंत्र रूप से पता लगाने के लिए विशेष व्यवस्था बनाना भी शामिल हो सकता है।

    केंद्र सरकार के अनुरोध पर कोर्ट ने सरकार को एक विस्तृत और व्यापक हलफ़नामा (Affidavit) दाखिल करने के लिए समय दिया। इस हलफ़नामे में फंड के आवंटन और उसके इस्तेमाल से जुड़े तुलनात्मक आँकड़े, और साथ ही कुछ खास परियोजनाओं को प्राथमिकता देने के कारणों का ब्योरा देना होगा।

    इस मामले की अगली सुनवाई 1 अप्रैल, 2026 को तय की गई।

    अंत में, बेंच ने यह भी कहा कि अगर रेलवे की ओर से उचित सहायता नहीं दी जाती है, या प्रासंगिक तथ्य और आंकड़े सामने नहीं रखे जाते हैं तो कोर्ट इस मामले का न्यायिक संज्ञान ले सकता है और सख़्त आदेश पारित कर सकता है।

    Case Title: Union of India v. Radha Yadav, Miscellaneous Application No.741-742/2019

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