वादी अपनी मर्ज़ी से तय करता है किसे पक्ष बनाना है, किसी को ज़बरदस्ती जोड़ नहीं सकते : सुप्रीम कोर्ट

Praveen Mishra

6 Jan 2026 4:57 PM IST

  • वादी अपनी मर्ज़ी से तय करता है किसे पक्ष बनाना है, किसी को ज़बरदस्ती जोड़ नहीं सकते : सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (5 जनवरी) को एक याचिका खारिज कर दी, जिसमें याची ने स्वयं को एक वाद (सूट) में प्रतिवादी के रूप में शामिल किए जाने की मांग की थी। अदालत ने कहा कि वादी (plaintiff) वाद का “डोमिनस लिटिस” होता है और उसे यह अधिकार है कि वह किनके विरुद्ध राहत मांगना चाहता है। ऐसे में किसी ऐसे पक्ष को शामिल करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, जिसके खिलाफ कोई राहत ही दावा नहीं की गई हो।

    जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ने कहा —

    “वादी अपने प्रतिद्वंद्वी स्वयं चुनते हैं। यदि वे किसी आवश्यक या उचित पक्ष को शामिल नहीं करते, तो उसका जोखिम स्वयं उठाते हैं, परंतु उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध किसी पक्ष को जोड़ने के लिए विवश नहीं किया जा सकता।”

    यह मामला मुंबई के एक वाणिज्यिक परिसर में फर्नीचर-फिक्सचर के सेवा शुल्क (service charges) की वसूली से संबंधित वाद का था, जिसे संपत्ति-मालिक के कानूनी उत्तराधिकारियों ने M/s Kishore Engineering Company (एक साझेदारी फर्म) के विरुद्ध दायर किया था, जो उस परिसर में उप-किरायेदार के रूप में क़ब्ज़े में थी।

    बाद में NAK Engineering Company Pvt. Ltd. ने सीपीसी की ऑर्डर 1 रूल 10 के तहत यह कहते हुए आवेदन दिया कि वह उक्त साझेदारी फर्म की “उत्तराधिकारी कंपनी” है और उसे वाद में प्रतिवादी बनाया जाए। ट्रायल कोर्ट ने 2018 में आवेदन स्वीकार कर लिया, किंतु बॉम्बे हाईकोर्ट ने 2022 में उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके विरुद्ध अपील सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई।

    कस्तूरी बनाम अय्यामपेरुमल (2005) 6 SCC 733 के निर्णय का हवाला देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया कि—

    आवश्यक पक्ष (Necessary Party) वह होता है जिसके बिना प्रभावी डिक्री पारित नहीं की जा सकती,

    जबकि उचित पक्ष (Proper Party) वह है जिसकी उपस्थिति प्रभावी निर्णय में सहायक हो सकती है।

    अदालत ने पाया कि अपीलकर्ता न तो आवश्यक पक्ष है और न ही उचित पक्ष, क्योंकि वाद केवल सेवा शुल्क की वसूली के लिए एक विशिष्ट इकाई के विरुद्ध दायर किया गया है और अपीलकर्ता के अभाव में भी प्रभावी डिक्री पारित की जा सकती है।

    अदालत ने कहा कि वादी-पक्ष ने अपीलकर्ता के विरुद्ध कोई राहत नहीं मांगी है और ऐसा कोई संकेत नहीं है कि वाद में मांगी गई राहत, यदि स्वीकृत होती है, तो उसका क्रियान्वयन अपीलकर्ता के विरुद्ध होगा। साथ ही, अपीलकर्ता यह भी सिद्ध नहीं कर सका कि वह वास्तव में संबंधित फर्म का “उत्तराधिकारी” है या फर्म अस्तित्व-विहीन हो चुकी है।

    इन परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी

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