“जातिविहीन समाज के बजाय हम समाज को बांट रहे हैं” : DNT जनगणना की मांग पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
Praveen Mishra
24 March 2026 1:51 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को 2027 की जनगणना में डिनोटिफाइड, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों (DNT) की अलग से गणना की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह मामला नीति (policy) से जुड़ा है और न्यायिक समीक्षा (justiciable issue) के दायरे में नहीं आता। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ताओं को संबंधित प्राधिकरणों के समक्ष अपनी मांग रखने की स्वतंत्रता दी।
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। यह याचिका DNT समुदाय के नेता दक्षिणकुमार बाजरंगे और अन्य द्वारा दायर की गई थी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ दवे ने दलील दी कि DNT समुदाय ऐतिहासिक रूप से अन्याय का शिकार रहा है, क्योंकि ब्रिटिश शासन के दौरान उन्हें अपराधी घोषित कर दिया गया था। उन्होंने कहा कि जनगणना फॉर्म में फिलहाल केवल SC, ST और Other की श्रेणियां हैं, जबकि DNT समुदायों के लिए अलग विकल्प होना चाहिए ताकि उनकी सटीक जनसंख्या का आंकड़ा सामने आ सके।
दवे ने यह भी बताया कि कई समितियों ने DNT समुदायों की अलग गणना की सिफारिश की है और आखिरी बार इनकी गणना 1913 में हुई थी। उन्होंने यह भी कहा कि सामाजिक न्याय मंत्रालय भी इस विचार के पक्ष में है, लेकिन संभवतः चूक के कारण जनगणना फॉर्म में इनका उल्लेख नहीं किया गया।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इसे विशेषज्ञ नीति का विषय बताते हुए हस्तक्षेप से इनकार कर दिया। CJI ने टिप्पणी की कि भारत जैसे देश में जातिविहीन समाज की ओर बढ़ने के बजाय नई-नई श्रेणियां बनाना उचित नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे मुद्दे गहराई से जुड़े होते हैं और इन पर निर्णय सरकार को लेना चाहिए।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा मांगी गई वर्गीकरण/उप-वर्गीकरण की मांग पूरी तरह से नीति क्षेत्र में आती है, जिसका निर्णय केंद्र सरकार के सक्षम प्राधिकारी द्वारा किया जाना चाहिए। इसलिए यह न्यायालय के हस्तक्षेप का विषय नहीं है।
याचिका में क्या कहा गया था?
याचिका में कहा गया था कि भारत में लगभग 10 से 12 करोड़ की आबादी वाले DNT समुदायों की स्वतंत्र भारत में कभी अलग से गणना नहीं की गई है, जबकि विभिन्न आयोगों और विशेषज्ञ संस्थाओं ने इसकी सिफारिश की है। सटीक आंकड़ों के अभाव में ये समुदाय सरकारी योजनाओं और आरक्षण के लाभ से वंचित रह जाते हैं।
याचिका में यह भी बताया गया कि DNT समुदायों का ऐतिहासिक हाशियाकरण 1871 के 'क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट' से जुड़ा है, जिसमें इन्हें जन्मजात अपराधी घोषित किया गया था। हालांकि स्वतंत्रता के बाद यह कानून समाप्त कर दिया गया, लेकिन सामाजिक और आर्थिक रूप से ये समुदाय अब भी पिछड़े हुए हैं।
रेनके आयोग (2008) और इडेट आयोग (2017) सहित कई आयोगों ने इन समुदायों की अलग पहचान और गणना की सिफारिश की है। इडेट आयोग ने करीब 1200 DNT समुदायों की पहचान की, जिनमें से 269 अब भी किसी श्रेणी में शामिल नहीं हैं।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि अलग गणना से इन समुदायों के लिए लक्षित नीतियां बनाना आसान होगा और उन्हें संविधान के तहत समानता, गरिमा और सामाजिक न्याय के अधिकार मिल सकेंगे।
फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब यह मुद्दा सरकार के विचाराधीन रहेगा।

