'दिव्यांगता सर्विस की वजह से नहीं थी, यह साबित करने की ज़िम्मेदारी सेना की': सुप्रीम कोर्ट ने दिव्यांगता पेंशन के ख़िलाफ़ अपीलें खारिज कीं
Shahadat
16 Sept 2026 11:06 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (15 सितंबर) को केंद्र सरकार की उन 271 अपीलों को खारिज किया, जो रिटायरमेंट के 15 साल के भीतर पूर्व सैनिकों को दी गई दिव्यांगता पेंशन के ख़िलाफ़ दायर की गईं। कोर्ट ने कहा कि भले ही 2008 के नियमों ने इस धारणा को हटा दिया हो कि सैनिक भर्ती के समय फिट था, लेकिन इससे नियोक्ता (सेना) को कोई फ़ायदा नहीं मिलता। भारत सरकार को अभी भी यह साबित करना होगा कि दिव्यांगता न तो सैन्य सेवा के कारण हुई थी और न ही सैन्य सेवा से बढ़ी (NANA) है।
जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने यह फ़ैसला सुनाया। वे आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल (AFT) और विभिन्न हाई कोर्ट के उन आदेशों के ख़िलाफ़ केंद्र सरकार की अपीलों पर सुनवाई कर रहे थे, जिनमें पूर्व सैनिकों को विकलांगता पेंशन दी गई।
हर मामले में रिलीज़ मेडिकल बोर्ड (RMB) की राय थी कि विकलांगता सैन्य सेवा के कारण न तो हुई और न ही बढ़ी (NANA) थी। पूर्व सैनिकों की अपीलें खारिज की गईं, जिसके बाद वे AFT या हाई कोर्ट गए, जिन्होंने उन्हें दिव्यांगता पेंशन दी। इसके ख़िलाफ़ केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट गई।
सुप्रीम कोर्ट के सामने केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने लागू 2008 के पात्रता नियमों (Entitlement Rules) के तहत दिव्यांगता पेंशन देने का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि 1982 के पात्रता नियमों के विपरीत, जिनमें फिटनेस की धारणा बनाई गई। इस तरह दिव्यांगता को सेवा से जोड़ा गया, 2008 के पात्रता नियमों के प्रावधान अलग हैं, क्योंकि 2008 के नियमों से सेवा में शामिल होने के समय फिटनेस की धारणा को हटा दिया गया। उनके अनुसार, अब सैनिक सेवा के साथ सीधा संबंध दिखाए बिना अपने-आप दिव्यांगता का दावा नहीं कर सकते।
उन्होंने विभिन्न AFT या हाईकोर्ट द्वारा 'धर्मवीर सिंह बनाम भारत सरकार' मामले में 2013 के फ़ैसले पर निर्भरता पर भी सवाल उठाया। उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि धर्मवीर सिंह का फ़ैसला 1982 के पात्रता नियमों के संदर्भ में दिया गया, इसलिए 2008 के पात्रता नियमों से जुड़े मामलों का फ़ैसला धर्मवीर सिंह मामले के आधार पर नहीं किया जा सकता। पूर्व सैनिक (प्रतिवादी) ने यूनियन के रुख का विरोध करते हुए कहा कि भले ही 2008 के एंटाइटेलमेंट नियमों ने 'फिटनेस की धारणा' (Presumption of Fitness) को खत्म किया हो, लेकिन इससे 2008 के एंटाइटेलमेंट नियमों का मूल ढांचा नहीं बदलता, क्योंकि अन्य फायदेमंद प्रावधान मोटे तौर पर वैसे ही बने हुए।
कोर्ट के सामने मुख्य कानूनी मुद्दा यह है कि क्या 2008 के एंटाइटेलमेंट नियमों ने 1982 के एंटाइटेलमेंट नियमों से कोई बड़ा बदलाव किया, खासकर इन मामलों में: सर्विस में शामिल होने के समय अच्छी सेहत की धारणा, दिव्यांगता पेंशन के दावों में सबूत पेश करने की जिम्मेदारी (Burden of Proof), दिव्यांगता और मिलिट्री सर्विस के बीच कारण-संबंध (Causal Connection) की आवश्यकता, और पहले से मौजूद बीमारियों के बिगड़ने (Aggravation) पर विचार।
एक विस्तृत फैसले में कोर्ट ने 1982 और 2008 के नियमों की बारीकी से तुलना की। कोर्ट ने माना कि 2008 के नियमों ने एक महत्वपूर्ण बदलाव किया; इसने उस पुरानी धारणा को हटा दिया, जिसके तहत यह माना जाता था कि अगर कोई सदस्य अच्छी सेहत के साथ सर्विस में शामिल हुआ। बाद में दिव्यांगता के साथ सर्विस छोड़ी तो यह माना जाएगा कि दिव्यांगता सर्विस के कारण हुई। 2008 के नियमों में कारण-संबंध पर विचार करना भी स्पष्ट रूप से जरूरी है।
हालांकि, कोर्ट ने कहा कि इन बदलावों से दावा करने वाले के हितों की रक्षा करने वाला मूल ढांचा खत्म नहीं होता।
कोर्ट ने कहा,
"...सिर्फ कारण-संबंध की शर्त जोड़ने और उस धारणा को हटाने से—कि अगर कोई सदस्य स्वस्थ हालत में सर्विस में शामिल होता है और दिव्यांगता के साथ छोड़ता है तो इसे मिलिट्री सर्विस से जुड़ा माना जाना चाहिए—2008 के एंटाइटेलमेंट नियमों का मूल ढांचा नहीं बदलता, क्योंकि अन्य फायदेमंद प्रावधान मोटे तौर पर वैसे ही बने हुए हैं। यह साबित करने की जिम्मेदारी अभी भी नियोक्ता (Employer) की है कि सदस्य की विकलांगता सर्विस के कारण नहीं हुई। सर्विस से जुड़ाव (Attributability) और बीमारी के बिगड़ने (Aggravation) से संबंधित नियम अभी भी यही कहते हैं कि अगर दिव्यांगता का कारण अज्ञात है और सर्विस से जुड़ाव की धारणा को गलत साबित नहीं किया जाता है, तो विकलांगता को सर्विस से जुड़ा माना जाएगा।"
इस प्रकार, सर्विस में शामिल होने के समय वाली पुरानी धारणा को हटाने का मतलब यह नहीं है कि 2008 के नियमों के तहत विकलांगता के हर दावे में शुरुआती जिम्मेदारी पूरी तरह से सैनिक पर आ जाती है।
कोर्ट ने कहा,
“…भले ही एंटाइटेलमेंट रूल्स 2008 ने ऑटोमैटिक अनुमान (Automatic Presumption) को हटा दिया और कारण-संबंध (Causal Nexus) की ज़रूरत को मज़बूत किया, लेकिन उन्होंने नियमों के उस ढांचे को खत्म नहीं किया जो दावा करने वाले के हित की रक्षा करता है; खासकर एस्टैब्लिशमेंट (संस्था) पर मुख्य ज़िम्मेदारी डालने और ज़िम्मेदारी तय करने, स्थिति बिगड़ने और उचित संदेह (Reasonable Doubt) से जुड़े फ़ायदेमंद सिद्धांतों को बनाए रखने के मामले में।”
कोर्ट ने ज़ोर दिया कि 2008 के नियमों के तहत 15 साल के अंदर किए गए दावों के लिए सबूत पेश करने की ज़िम्मेदारी का आम फ़ायदेमंद ढांचा पूर्व-सैनिकों के पक्ष में काम करता रहता है। लेकिन अगर दावा तय 15 साल की अवधि के बाद किया जाता है तो हक़दार होने की शर्तों को साबित करने की ज़िम्मेदारी पूर्व-सैनिक की होती है।
1982 के नियमों के संदर्भ में मामलों का फ़ैसला करते समय 'धर्मवीर सिंह' मामले के फ़ैसले को आँख बंद करके लागू नहीं किया जा सकता
कोर्ट ने कहा कि 'धर्मवीर सिंह' मामले का फ़ैसला 1961 के नियमों और 1982 के एंटाइटेलमेंट नियमों (हकदारी नियमों) की जांच के आधार पर किया गया। इसलिए 2008 के नियमों के तहत आने वाले दावों पर काम करने वाली अदालतों और ट्रिब्यूनलों को पुराने सिद्धांतों को बिना सोचे-समझे लागू करने के बजाय, उन दावों पर लागू होने वाले प्रावधानों की जांच करनी चाहिए।
कोर्ट ने कहा,
"चूंकि 'धर्मवीर सिंह' मामले का फ़ैसला 1982 के एंटाइटेलमेंट नियमों और उसके खास तथ्यों के आधार पर किया गया, इसलिए इसे 2008 के एंटाइटेलमेंट नियमों के तहत आने वाले मामलों में आँख बंद करके लागू नहीं किया जा सकता। खासकर, इस फ़ैसले का मतलब यह नहीं निकाला जा सकता कि नौकरी के दौरान सामने आई हर दिव्यांगता के लिए मिलिट्री सर्विस ही ज़िम्मेदार है, या ऐसा मान ही लिया जाएगा, जिसे बदला न जा सके।"
सरकार उन दावों की पहचान कर सकती है, जिनका फ़ैसला 'धर्मवीर सिंह' मामले के फ़ैसले को आँख बंद करके लागू करने के आधार पर किया गया
कोर्ट ने कहा,
"अगर मेडिकल बोर्ड और अपील अधिकारियों ने दावा खारिज किया, लेकिन AFT या हाई कोर्ट ने पूर्व-सैनिकों द्वारा अपने मामले के समर्थन में पेश किए गए सबूतों की विस्तार से जांच किए बिना, सिर्फ़ 'मान लेने' (Presumption) के सिद्धांत या 'धर्मवीर सिंह' मामले के फ़ैसले के आधार पर आवेदन या रिट याचिका को मंज़ूरी दी तो निश्चित रूप से उन फ़ैसलों पर फिर से विचार करने की गुंजाइश है। ऐसे मामलों की पहचान करना और यह साबित करने के लिए उचित आपत्तियाँ उठाना सरकार का काम है कि दायित्व पूरा हुआ है या नहीं।"
देरी से अपील दायर करने के लिए सरकार की आलोचना
कोर्ट ने दिव्यांगता पेंशन को चुनौती देने वाली अपीलें देरी से दायर करने के लिए भी सरकार की आलोचना की।
कोर्ट ने कहा,
“इस कानूनी मामले की दुखद बात यह है कि लगभग 271 सिविल अपीलों और स्पेशल लीव याचिकाओं में से ज़्यादातर समय-सीमा (लिमिटेशन) के कारण खारिज हो गईं। समय-सीमा खत्म होने की वजह से ऐसी कई अपीलें पहले ही खारिज की जा चुकी हैं; अभी जो अपीलें बची हैं, उनकी संख्या बहुत कम है। इसके अलावा, यह ध्यान देना ज़रूरी है कि RMB द्वारा खारिज किए जाने के बाद पहली अपील के चरण में खारिज होने वाली अपीलों की संख्या स्वीकार की गई अपीलों की तुलना में कहीं ज़्यादा है। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत मिली जानकारी के अनुसार, पहली अपील अथॉरिटी के सामने आई 2,997 अपीलों में से लगभग 2,855 दावे खारिज कर दिए गए और केवल 142 अपीलें स्वीकार की गईं। दूसरी अपील अथॉरिटी के सामने 456 अपीलों में से 439 खारिज कर दी गईं और केवल 17 अपीलें स्वीकार की गईं।”
Cause Title: UNION OF INDIA & ORS. VERSUS COL. NC ISAAC (RETD.) (with connected matters)


