सुप्रीम कोर्ट ने बैंक अकाउंट्स फ्रीज़ करने के खिलाफ़ तृणमूल कांग्रेस की याचिका खारिज की, हाईकोर्ट से सुनवाई में तेज़ी लाने को कहा
Shahadat
1 Oct 2026 12:48 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ममता बनर्जी की अगुवाई वाली ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (AITC) को कोई राहत देने से इनकार किया। पार्टी ने पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा उसके इंडियन बैंक के चार अकाउंट्स को फ्रीज़ करने के फैसले को चुनौती देते हुए याचिका दायर की थी।
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस बी वराले की बेंच ने कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा अंतरिम राहत देने से इनकार करने के खिलाफ़ दायर याचिका पर सुनवाई करने से मना किया। यह देखते हुए कि मुख्य मामला हाईकोर्ट में लंबित है, बेंच ने आर्टिकल 136 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने से इनकार किया। मामले का निपटारा करते हुए बेंच ने हाईकोर्ट से सुनवाई में तेज़ी लाने का भी अनुरोध किया।
कोर्ट ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (AITC) की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें इंडियन बैंक में मौजूद चार अकाउंट्स को ऑपरेट करने की अनुमति मांगी गई। विधायक विश्वनाथ दास की शिकायत पर पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा शुरू की गई आपराधिक जांच के बाद इन अकाउंट्स से डेबिट की सुविधा रोक (फ्रीज़) दी गई।
उल्लेखनीय है कि यह मामला पहले के उस मामले से अलग है, जिसमें पार्टी के HDFC बैंक के 3 अकाउंट्स फ्रीज़ किए गए।
तर्क
ममता गुट की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि इंडियन बैंक के चार अकाउंट्स फ्रीज़ होने से पार्टी का कामकाज ठप हो गया है। उन्होंने बताया कि पार्टी के ऑडिटेड अकाउंट्स के अनुसार, रोज़मर्रा के कामकाज (राजनीतिक खर्चों को छोड़कर) के लिए कम-से-कम ₹12.15 करोड़ का मासिक खर्च होता है।
सिंघवी ने तर्क दिया,
"अगर किसी राज्य की पुलिस, जहां की सत्ताधारी पार्टी मेरे खिलाफ़ है... पुलिस भेजकर सारे अकाउंट्स फ्रीज़ कर देती है तो राजनीतिक गतिविधियों को रोकने का यह सबसे अच्छा तरीका है।"
उन्होंने आगे कहा कि हाईकोर्ट के आदेश में पहले के तीन अकाउंट्स और मौजूदा चार अकाउंट्स को मिला दिया गया, उपचुनाव नजदीक हैं और फ्रीज़ करने की प्रक्रिया में मजिस्ट्रेट की कोई न्यायिक भूमिका शामिल नहीं है।
जब बेंच ने सुझाव दिया कि कोर्ट द्वारा नियुक्त एडमिनिस्ट्रेटर इन अकाउंट्स को भी संभाल सकता है तो सिंघवी ने कहा कि फिलहाल के लिए वे इसे एक अस्थायी व्यवस्था के तौर पर स्वीकार कर सकते हैं। उन्होंने आगे कहा कि देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी को चलाने के लिए हर महीने कम-से-कम ₹12.15 करोड़ की ज़रूरत होती है और इसमें उपचुनाव, कानूनी फीस या दूसरे खर्च शामिल नहीं हैं।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने राज्य की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा कि यह मामला अलग FIR और गुटीय विवाद से जुड़ा है, जिसमें एक पक्ष खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बता रहा है। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही यह तय करने का काम चुनाव आयोग पर छोड़ दिया कि कौन-सा गुट असली पार्टी है।
मेहता ने बताया कि पार्टी के गुट से जुड़े एक पर्सनल असिस्टेंट ने अकाउंट में ₹35 करोड़ नकद जमा किए, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ियां खारिज की थीं और जांच में पिछली सरकार के समय सरकारी ज़मीन को निजी ज़मीन में बदलने और बाद में उसे बेचने के आरोपों की पड़ताल की जा रही थी।
सॉलिसिटर की बातों का खंडन करते हुए सिंघवी ने कहा कि इनका FIR से कोई लेना-देना नहीं है और ये बातें सिर्फ़ कोर्ट को प्रभावित करने के लिए कही जा रही हैं।
शिकायतकर्ता की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट के. परमेश्वर ने कहा कि हालांकि पहले रोज़मर्रा के खर्चों की इजाज़त दी गई, लेकिन याचिकाकर्ता अब अतिरिक्त खर्चों की भी मांग कर रहे हैं। उन्होंने चुनाव आयोग के 17 सितंबर 2026 के उस आदेश का ज़िक्र किया, जिसमें असली तृणमूल कौन है, इस पर फ़ैसला होने तक पार्टी के चुनाव चिह्न को फ्रीज़ कर दिया गया।
सिंघवी ने जवाब दिया कि चुनाव आयोग का आदेश सिर्फ़ पार्टी के चुनाव चिह्न से संबंधित था और उसमें बैंक अकाउंट्स का कोई ज़िक्र नहीं था। उन्होंने साफ़ किया कि HDFC अकाउंट्स पहले से ही कमिश्नर की निगरानी में थे और मौजूदा खाते इंडियन बैंक में हैं। उन्होंने मनी-लॉन्ड्रिंग और "भारी मात्रा में नकद" जमा करने के ज़िक्र पर आपत्ति जताते हुए कहा कि ऐसे मुद्दे मौजूदा मामले का विषय नहीं हैं और पुलिस ने खातों को फ्रीज़ करने का कोई कारण नहीं बताया।
कोर्ट का आदेश
बेंच ने नोट किया कि पिछले आदेश अकाउंट्स के एक अलग सेट से संबंधित थे। उसने नए आरोपों के बारे में सॉलिसिटर जनरल की बात पर ध्यान दिया और देखा कि चुनाव आयोग के 17 सितंबर 2026 के आदेश ने पार्टी के चुनाव चिह्न को फ्रीज़ कर दिया। नतीजतन, यह बड़ा मुद्दा कि इन रकमों का हकदार कौन है, अभी भी फैसले के लिए लंबित है।
अदालत ने मामले के गुण-दोष पर विचार करने से परहेज किया और कहा कि वह संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने की इच्छुक नहीं है। उसने कलकत्ता हाईकोर्ट से मुख्य मामले की सुनवाई में तेज़ी लाने का अनुरोध किया।
Case Title : All India Trinamool Congress v. State of West Bengal

