सुप्रीम कोर्ट ने TASMAC मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ED की तलाशी को चुनौती देने वाली तमिलनाडु के व्यवसायी की याचिका खारिज की
Shahadat
19 Jun 2026 9:15 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने व्यवसायी पीआर राजेश कुमार की याचिका खारिज की, जिसमें उन्होंने तमिलनाडु राज्य विपणन निगम (TASMAC) से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच के सिलसिले में मई 2025 में उनके आवास पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा की गई तलाशी की वैधता को चुनौती दी थी।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट का आदेश बरकरार रखा, जिसने तलाशी की वैधता की जांच करने से इनकार किया था। हाईकोर्ट ने यह निर्णय इसलिए लिया, क्योंकि निर्णायक प्राधिकरण (Adjudicating Authority) ने PMLA की धारा 8 के तहत संपत्ति की कुर्की (attachment) की पुष्टि की और राजेश कुमार ने अपीलीय न्यायाधिकरण (Appellate Tribunal) का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ता ने 16, 17 और 18 मई, 2025 को अड्यार स्थित अपने आवास पर ED द्वारा की गई तलाशी और जब्ती की कार्यवाही को रद्द करने की मांग की।
हाईकोर्ट ने माना कि उस चरण में तलाशी की कार्यवाही की वैधता की जांच करना अनावश्यक है। उसने याचिका बंद की और याचिकाकर्ता के लिए अपीलीय न्यायाधिकरण के समक्ष सभी आधार उठाने का रास्ता खुला रखा। याचिकाकर्ता ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि मुख्य मुद्दा यह था कि क्या तलाशी 'मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम, 2002' (PMLA) की धारा 17 के अनुपालन में की गई।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि धारा 17 के तहत तलाशी तभी की जा सकती थी जब यह मानने के कारण दर्ज किए गए हों कि याचिकाकर्ता ने मनी लॉन्ड्रिंग की है, उसके पास अपराध से प्राप्त आय है, या उसके पास मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े रिकॉर्ड या संपत्ति है और निर्धारित प्रारूप में प्राधिकरण (authorisation) प्राप्त किया गया हो। उन्होंने कहा कि राजेश कुमार के आवास पर की गई तलाशी के लिए कोई वैध प्राधिकरण नहीं था।
उन्होंने तर्क दिया कि राजेश कुमार का नाम न तो प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट (ECIR) में था और न ही मूल अपराध (predicate offence) में, और तीन मोबाइल फोन के अलावा उनसे कुछ भी बरामद नहीं हुआ।
उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट को यह जांचना चाहिए कि क्या धारा 17 की अनिवार्य आवश्यकताओं का पालन किया गया, न कि याचिकाकर्ता को कुर्की की पुष्टि से उत्पन्न कार्यवाही के लिए भेजना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि धारा 17 का अनुपालन अनिवार्य था और तलाशी की वैधता केवल इसलिए अप्रासंगिक नहीं हो सकती क्योंकि बाद में कुर्की की कार्यवाही की पुष्टि कर दी गई। उन्होंने आगे कहा कि यह मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। यह मामला TASMAC की उन याचिकाओं से जुड़ा है, जो उसी ECIR से निकली हैं और जिनमें ED की तलाशी की कानूनी वैधता को चुनौती दी गई।
वकील ने कहा कि धारा 17 (जो तलाशी और ज़ब्ती से संबंधित है) और धारा 8 (जो अटैचमेंट की पुष्टि और कानूनी फ़ैसले से संबंधित है) का दायरा पूरी तरह से अलग है। उन्होंने तर्क दिया कि अधिकारियों को किसी व्यक्ति के परिसर में घुसने और सामान ज़ब्त करने की अनुमति तब तक नहीं दी जा सकती, जब तक वे धारा 17 के तहत बताए गए कानूनी सुरक्षा उपायों का पालन न कर लें।
संक्षेप में दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने मामले में दखल देने से इनकार किया।
CJI ने कहा,
"धन्यवाद। कोई सवाल नहीं। याचिका खारिज की जाती है।"
इसके बाद याचिकाकर्ता के वकील ने मामले को वापस लेने की अनुमति मांगी, ताकि वे अपीलीय ट्रिब्यूनल के सामने सभी आपत्तियां उठा सकें।
इस अनुरोध को खारिज करते हुए CJI ने कहा कि मद्रास हाईकोर्ट का आदेश पहले से ही याचिकाकर्ता को ट्रिब्यूनल के सामने सभी उपलब्ध आधार उठाने का अधिकार देता है।
CJI ने कहा,
"हाईकोर्ट का आदेश बिल्कुल स्पष्ट है। हम केवल हाईकोर्ट के आदेश को ही बरकरार रख रहे हैं। कृपया हाई कोर्ट का आदेश पढ़ें। उसमें ऐसा ही कहा गया।"
Case title – P.R. Rajesh Kumar v. Enforcement Directorate

