सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दिए गए 'सीनियर' डेजिग्नेशन को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की
Shahadat
6 Nov 2026 10:38 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (6 नवंबर) को ऐसी याचिका खारिज की, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा 2019 में दिए गए 'सीनियर एडवोकेट' (वरिष्ठ अधिवक्ता) के पदनामों को चुनौती दी गई।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने कहा कि जिन आवेदकों को यह पदनाम नहीं मिला, वे अगले दौर में फिर से आवेदन कर सकते हैं।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील प्रणव सचदेवा ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में 15 साल की लगातार और बेदाग वकालत के बावजूद, याचिकाकर्ता के नाम पर विचार नहीं किया गया।
इस पर जस्टिस नरसिम्हा ने सवाल किया कि वे इस मामले को लेकर कानूनी लड़ाई (Litigation) क्यों लड़ना चाहते हैं।
उन्होंने कहा,
"आवेदन करें। आप कानूनी लड़ाई क्यों लड़ना चाहते हैं? आप फिर से आवेदन करें। बेवजह कानूनी विवाद में न पड़ें।"
सचदेवा ने आरोप लगाया कि 'जितेंद्र कल्ला बनाम स्टेट ऑफ एनसीटी' मामले में आए फैसले के बावजूद, चयन समिति ने कई सालों से मूल्यांकन नहीं किया है। उस फैसले में कहा गया कि हर कैलेंडर वर्ष में कम से कम एक बार 'सीनियर' पदनाम देने की प्रक्रिया पूरी की जानी चाहिए।
अंत में, कोर्ट ने आदेश दिया,
"हम हाईकोर्ट के आदेश में कोई दखल नहीं देना चाहते। हम यह स्पष्ट करते हैं कि याचिकाकर्ता फिर से आवेदन कर सकता है। ऐसे आवेदन पर कानून के अनुसार विचार किया जाएगा, जिसमें 'जितेंद्र कल्ला' मामले में तय किए गए सिद्धांत भी शामिल होंगे।"
मामले की पृष्ठभूमि
यह 'स्पेशल लीव पिटिशन' (SLP) इलाहाबाद हाईकोर्ट के सितंबर 2024 के उस फैसले के खिलाफ दायर की गई, जिसमें वकील विष्णु बिहारी तिवारी की याचिका खारिज कर दी गई। तिवारी ने 2019 में दिए गए पदनामों को चुनौती दी थी। याचिका खारिज करते समय हाईकोर्ट ने यह भी बताया कि 2019 के बाद से किसी को भी 'सीनियर' डेजिग्नेशन नहीं दिया गया।
2019 में, जब 'सीनियर' पदनाम के लिए आवेदन मांगे गए, तब इलाहाबाद हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली स्थायी समिति (Permanent Committee) ने यह तय किया कि जिन वकीलों को 75 में से 45 या उससे अधिक अंक मिलेंगे, केवल उन्हीं के नामों पर 'सीनियर एडवोकेट' के पदनाम के लिए विचार किया जाएगा।
'फुल कोर्ट' (सभी जजों की बेंच) को भेजे गए 78 नामों में से 75 वकीलों को 'सीनियर' डेजिग्नेशन दिया गया। हाईकोर्ट ने माना कि स्थायी समिति (परमानेंट कमिटी) का केवल चुनिंदा आवेदनों को ही 'फुल कोर्ट' के पास भेजने का निर्णय 'इंदिरा जयसिंह (2017)' मामले के फैसले के अनुरूप था। ऐसा इसलिए है, क्योंकि समिति को ऐसे नियम या मानदंड बनाने की अनुमति है, जिसके तहत वह केवल उन्हीं आवेदकों को 'फुल कोर्ट' के सामने पेश करने या उनकी सिफारिश करने का फैसला ले सकती है, जिन्हें वह उपयुक्त समझती है।
अदालत ने कहा कि भले ही शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों का इंटरव्यू लिए बिना उन्हें 'सीनियर डेजिग्नेशन' (वरिष्ठ पदनाम) नहीं दिया जा सकता, लेकिन 'इंदिरा जयसिंह (2023)' मामले में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की 'सुओ मोटो' (स्वयं संज्ञान लेने की) शक्तियों को बरकरार रखा गया। इसलिए यह माना गया कि बिना इंटरव्यू लिए दिए गए 'सीनियर डेजिग्नेशन' को केवल वे उम्मीदवार ही चुनौती दे सकते थे जिन्हें शॉर्टलिस्ट किया गया था; कोई अन्य व्यक्ति ऐसा नहीं कर सकता। चूंकि याचिकाकर्ताओं को उनके कट-ऑफ अंकों के आधार पर कभी शॉर्टलिस्ट ही नहीं किया गया, इसलिए वे इस आधार पर दिए गए 'सीनियर डेजिग्नेशन' को चुनौती नहीं दे सकते।
हाईकोर्ट ने कहा कि इंटरव्यू की शर्त अनिवार्य नहीं थी, बल्कि यह समिति के विवेक पर निर्भर थी।
हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर SLP (विशेष अनुमति याचिका) पर नोटिस जारी करते हुए जस्टिस अभय एस. ओक और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने टिप्पणी की कि हाईकोर्ट की स्थायी समिति ने कुल अंकों को 100 से घटाकर 75 करके 'इंदिरा जयसिंह बनाम सुप्रीम कोर्ट' मामले में तय किए गए कानून का उल्लंघन किया।
इसके बाद 'जितेंद्र कल्ला' मामले में जस्टिस ओक की अध्यक्षता वाली बेंच ने 'इंदिरा जयसिंह' फैसले में तय किए गए 'सीनियर डेजिग्नेशन' के नियमों की फिर से समीक्षा की। सुप्रीम कोर्ट ने स्थायी समिति के समक्ष होने वाली अंक-आधारित मूल्यांकन प्रक्रिया और इंटरव्यू प्रक्रिया को समाप्त कर दिया।
जस्टिस ओक के रिटायर होने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के 'सीनियर डेजिग्नेशन' से जुड़ा यह मामला जस्टिस नरसिम्हा की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने आया। उन्होंने 2019 में दिए गए 'सीनियर डेजिग्नेशन' में हस्तक्षेप करने से इनकार किया और कहा कि यदि याचिकाकर्ता कोई नया आवेदन देते हैं तो उसका मूल्यांकन 'जितेंद्र कल्ला' फैसले में तय किए गए सिद्धांतों के आधार पर किया जाएगा।
Case Title : Vishnu Behari Tiwari v. High Court of Judicature at Allahabad

