सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST Act में कड़े प्रावधानों को फिर से लागू करने के प्रावधानों के खिलाफ याचिका खारिज की
Shahadat
22 Sept 2026 4:42 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) में 2018 के संशोधन को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) खारिज की। इस संशोधन ने अग्रिम जमानत पर रोक को फिर से लागू किया और FIR से पहले शुरुआती जांच और आरोपी की गिरफ्तारी के लिए पूर्व मंजूरी की आवश्यकता को खत्म कर दिया था।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने बृजभूषण सैनी द्वारा दायर याचिका खारिज करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 'पृथ्वी राज चौहान बनाम भारत संघ' (10 फरवरी, 2020) मामले में 2018 के संशोधन को पहले ही सही ठहराया था। बेंच ने कहा कि 2020 के फैसले में पर्याप्त सुरक्षा उपाय बताए गए।
बेंच ने 2020 के फैसले पर पुनर्विचार करने की याचिकाकर्ता की मांग को स्वीकार नहीं किया।
बता दें, 'डॉ. सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामले में 2018 के अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST Act के तहत गिरफ्तारी से पहले शुरुआती जांच और मंजूरी को अनिवार्य बनाकर और यह कहकर कि अग्रिम जमानत देने पर कोई पूर्ण रोक नहीं है, एक्ट को कमजोर कर दिया था। मूल कड़े प्रावधानों को बहाल करने के लिए संसद ने 2018 में एक्ट में संशोधन किया और धारा 18A जोड़ी। धारा 18A ने FIR से पहले शुरुआती जांच और गिरफ्तारी के लिए पूर्व मंजूरी की आवश्यकता को खत्म किया और अग्रिम जमानत पर रोक को फिर से लागू किया।
सुनवाई में याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील हरि शंकर जैन ने तर्क दिया कि एक्ट के तहत अग्रिम जमानत पर कानूनी रोक "उलटा भेदभाव" (Reverse Discrimination) है। उन्होंने आगे कहा कि एक्ट के तहत सजा की दर कम है और आरोप लगाया कि प्रावधानों का दुरुपयोग होने की संभावना है। राज्यसभा सांसद के भाषण का हवाला देते हुए जैन ने एक्ट के तहत मुआवजे के तौर पर 493 करोड़ रुपये के कथित वितरण पर भी सवाल उठाए।
उनका यह भी तर्क था कि 2018 का संशोधन मूल प्रावधानों को "वैध" नहीं बना सकता। यह फैसले में बताई गई कमियों को दूर किए बिना सुप्रीम कोर्ट का फैसला रद्द करने जैसा था। उन्होंने विष्णु तिवारी के मामले का ज़िक्र करते हुए कहा कि "धारा 18A ज़्यादा सख़्त है"; तिवारी ने कथित तौर पर SC/ST एक्ट के तहत एक झूठे मामले में 20 साल जेल में बिताए।
जस्टिस बागची ने इस बात का जवाब देते हुए कहा,
"किसी व्यक्ति के [खिलाफ़] हुई कार्रवाई उस कानून पर दोबारा विचार करने का आधार नहीं हो सकती, जिसे [3 जजों] की बेंच ने सही ठहराया है। 3 जजों ने उस कानून को मंज़ूरी दी है। हम 5 साल के अंदर ही उस पर दोबारा विचार क्यों करें?"
CJI ने कहा कि प्रावधानों के गलत इस्तेमाल के मामले को न्यायिक शक्तियों का इस्तेमाल करके देखा जा सकता है।
उन्होंने टिप्पणी की,
"इसका मतलब यह नहीं है कि कानून ही [खराब] है।"
हालांकि, जैन ने जवाब दिया कि 2020 के फ़ैसले पर दोबारा विचार करने की ज़रूरत है। उन्होंने कोर्ट से गुज़ारिश की कि वह कानून और 2020 का फ़ैसला आर्टिकल 14 और 21 के नज़रिए से परखे।
इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि BNSS की धारा 35 - जो कुछ मामलों में गिरफ़्तारी से पहले नोटिस देना ज़रूरी बनाती है - SC/ST Act पर भी लागू होगी।
जस्टिस बागची ने कहा,
"जब भी स्पेशल कानून के तहत गिरफ़्तारी होगी तो BNSS की धारा 35 पर भी विचार किया जाएगा। ऐसा इसलिए है, क्योंकि हमने अर्नेश कुमार मामले में धारा 41A की व्याख्या इस तरह से की है। वहां हमने कहा है कि यह पाबंदी स्पेशल कानून पर भी लागू होगी। इसके लिए हमें धारा 18A को असंवैधानिक घोषित करने की ज़रूरत नहीं है। [हम] दोनों प्रावधानों को एक जैसा मानते हैं।"
इसके बाद आर्टिकल 21 का हवाला देते हुए जैन ने सवाल किया कि SC/ST Act के तहत आरोपी पर अग्रिम ज़मानत (Anticipatory Bail) का प्रावधान क्यों लागू नहीं होना चाहिए।
जस्टिस बागची ने जवाब दिया कि यह विधायिका की समझदारी है।
जज ने कहा,
"7 साल तक की सज़ा वाले अपराध में धारा 43D [UAPA] जैसी पाबंदियां, PMLA के प्रावधान क्यों हैं... ये अहम सवाल हैं, लेकिन अफ़सोस की बात है कि हम विधायिका की जगह नहीं ले सकते। यह विधायिका की समझदारी से तय किया गया।"
जब जैन ने तर्क दिया कि संशोधन "उल्टा भेदभाव" (Reverse Discrimination) है और "समाज में और ज़्यादा बंटवारा पैदा कर रहा है", तो जस्टिस मोहना ने कहा कि 2020 के फ़ैसले में सभी आशंकाओं का ध्यान रखा गया। जज ने इस बात पर ज़ोर दिया कि SC/ST Act की धारा 18A के बावजूद, इस कानून के तहत दर्ज FIR को हर मामले की परिस्थितियों के आधार पर रद्द किया जा सकता है।
जस्टिस बागची ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का भी ज़िक्र किया, जिसमें धारा 18A के तहत लगी रोक को सीमित किया गया। उन्होंने कहा कि सिर्फ़ SC/ST Act का ज़िक्र होने भर से अग्रिम ज़मानत (Anticipatory Bail) देने से इनकार नहीं किया जा सकता।
जज ने कहा,
"अदालतों को यह जांचने का अधिकार है कि क्या प्रथम दृष्टया (Prima Facie) कोई मामला बनता है या नहीं।"
बाद में जब जैन ने तर्क दिया कि 493 करोड़ रुपये का मुआवज़ा बांटना नियमों के खिलाफ़ था और इससे असल में "लोगों को FIR दर्ज कराने के लिए बढ़ावा" मिल रहा था तो जस्टिस बागची को यह बात पसंद नहीं आई।
जज ने कहा,
"यह क्रूरता है।"
आखिरकार, बेंच ने याचिका खारिज की।
Case Title: Brijbhushan Saini and Ors. v. Union of India and Ors.

