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ISIS में शामिल होने के आरोपों पर मुकदमे का सामना कर रहे युवक को ज़मानत देने के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने एनआईए की अपील खारिज की

LiveLaw News Network
27 Aug 2021 10:57 AM GMT
ISIS में शामिल होने के आरोपों पर मुकदमे का सामना कर रहे युवक को ज़मानत देने के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने एनआईए की अपील खारिज की
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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मुंबई के एक युवक अरीब मजीद को जमानत देने के बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा दायर एक अपील पर विचार करने से इनकार कर दिया। यह युवक इस्लामिक स्टेट में शामिल होने के बाद सीरिया से लौटने के बाद गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत मुकदमे का सामना कर रहा है।

न्यायमूर्ति एस अब्दुल नज़ीर और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की खंडपीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कारणों का विवरण दिया है और ज़मानत की कड़ी शर्त लगाई है।

अपनी वापसी के बाद मजीद एनआईए द्वारा आतंकवाद विरोधी कानून यूएपीए और आईपीसी की धारा 125 के तहत दर्ज एक मामले में मुकदमे का सामना कर रहा है।

मजीद को 17 मार्च, 2020 को विशेष अदालत ने जमानत दे दी थी। इस साल फरवरी में बॉम्बे हाईकोर्ट ने निचली अदालत के जमानत देने के आदेश के खिलाफ एनआईए द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आज सुनवाई में अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने प्रस्तुत किया कि मजीद एक आतंकवादी है जो पुलिस मुख्यालय पर बमबारी करने के लिए भारत लौटा।

एएसजी राजू ने कहा,

"वह एक आतंकवादी है और सीरिया गया और पुलिस मुख्यालय पर बमबारी करने के लिए भारत आया।"

उन्होंने आगे कहा कि जमानत को बरकरार रखने के लिए उच्च न्यायालय द्वारा उद्धृत कारणों में से एक यह था कि आरोपी ने अपने मामले में तर्क दिया। लेकिन पीठ ने कहा कि कड़ी शर्तें पहले ही लगाई जा चुकी हैं।

पीठ ने कहा,

"जमानत के लिए शर्तें पढ़ें! उसे कल्याण में परिवार के साथ रहना है, जमानत देनी है, अपना आवासीय पता देना है, रिपोनीर्ट प्रभारी को देनी है।"

जस्टिस एसएस शिंदे और मनीष पिटाले की बॉम्बे हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने मजीद की जमानत को बरकरार रखने के लिए उसकी छह साल की लंबी कैद और मुकदमे की धीमी गति का हवाला दिया था। हालांकि, अदालत ने मामले के गुण-दोष पर विशेष एनआईए अदालत के निष्कर्षों को आरोपी के पक्ष में खारिज कर दिया था।

मजीद ( 21 वर्ष), 24 मई 2014 को तीन अन्य युवकों के साथ इराक के लिए रवाना हुआ और छह महीने बाद, 28 नवंबर, 2014 को भारत लौटने वाला एकमात्र व्यक्ति था। उसे वापसी पर आतंकवाद निरोधी दस्ते ने गिरफ्तार किया था और बाद में अगले दिन एनआईए को सौंप दिया था।

एनआईए ने आरोप लगाया कि उन चारों ने बगदाद की यात्रा की, इस्लामिक स्टेट (आईएस) में शामिल हो गए और युद्ध के दौरान 'इराक और सीरिया में जिहाद के नाम पर आतंकवादी कृत्यों' को अंजाम दिया। बाद में उसके खिलाफ आईएस का हिस्सा होने का आरोप हटा दिया गया था।

मजीद ने लगातार दावा किया कि उसे वास्तव में एनआईए और इस्तांबुल में भारतीय वाणिज्य दूतावास की मदद से वापस लाया गया है और उसने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष बिना सबूत के आरोप लगा रहा है कि उसने आतंकी कृत्य किए।

उस पर आईपीसी की धारा 125 (भारत सरकार के साथ गठबंधन में किसी भी एशियाई शक्ति के खिलाफ युद्ध छेड़ना) और गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम की धारा 16 (आतंकवादी कृत्य के लिए सजा) और धारा 18 (साजिश के लिए सजा) के तहत आरोप लगाया गया है। इस आरोपों में दोषी पाए जाने पर आजीवन कारावास की सज़ा हो सकती है।

हाईकोर्ट ने मजीद पर विशेष अदालत द्वारा लगाई गई शर्तों के अलावा कड़ी जमानत की शर्तें भी लगाई थीं। ये शर्तें इस प्रकार हैं।

एक लाख रुपये के पीआर बांड और दो ज़मानतदार पेश करने पर रिलीज किया जाए।

कल्याण में अपने परिवार के साथ रहें, कम से कम तीन रक्त संबंधियों का विवरण दें।

पहले दो महीनों के लिए दिन में दो बार स्थानीय पुलिस स्टेशन को रिपोर्ट करें, उसके बाद अगले दो महीनों के लिए दिन में एक बार।

दो महीने के लिए सप्ताह में तीन बार और मुकदमे के पूरा होने तक सप्ताह में दो बार रिपोर्ट करें।

यदि वह अनुपस्थित रहता है और उसके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया जाता है, तो उसे तब तक जमानत पर रिहा नहीं किया जाएगा, जब तक कि विशेष कारण नहीं हों।

उन गतिविधियों के समान किसी भी गतिविधि में शामिल न हों जिनके आधार पर उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

कोई अंतरराष्ट्रीय कॉल न करें या सह-आरोपी से संपर्क करने का प्रयास न करें।

सप्ताह में एक बार एनआईए अधिकारी को रिपोर्ट करें।

मीडिया या सोशल मीडिया पर कोई बयान नहीं दें।

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