"प्रॉक्सी बैटल न लड़ें" : सुप्रीम कोर्ट ने वालयार मामले में पुलिस उपाधीक्षक के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी हटाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार किया

LiveLaw News Network

4 Oct 2021 5:06 PM IST

  • प्रॉक्सी बैटल न लड़ें : सुप्रीम कोर्ट ने वालयार मामले में पुलिस उपाधीक्षक के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी हटाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार किया

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को "जस्टिस फॉर वालयार किड्स फोरम" नामक एक एनजीओ द्वारा दायर एक याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। इस याचिका में केरल हाईकोर्ट द्वारा पुलिस उपाधीक्षक (Deputy Superintend of Police) के खिलाफ की गई कुछ प्रतिकूल टिप्पणियों को हटाने की मांग की गई थी, जो केरल के वालयार मामले में दो नाबालिग बच्चियों के बलात्कार और हत्या के केस में जांच अधिकारी थे।

    न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी की पीठ ने कहा कि एनजीओ एक "छद्म लड़ाई" (Proxy Battle)नहीं लड़ सकता और कहा कि उपाधीक्षक यदि खुद व्यक्तिगत रूप से व्यथित हैं तो आगे आ सकते हैं।

    याचिकाकर्ता के वकील ने प्रस्तुत किया कि केरल हाईकोर्ट द्वारा वालयार मामले में आरोपी को बरी करने के फैसले के पैरा 103 में की गई टिप्पणी को हटाने की मांग की जा रही थी। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि डिप्टी सुप्रींटनडन ऑफ पुलिस मामले में उचित वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाने में विफल रहे।

    न्यायमूर्ति खन्ना ने कहा,

    "कृपया छद्म लड़ाई न लड़ें। यदि डिप्टी सुप्रींटनडन को कोई शिकायत है तो उन्हें खुद आगे आने दें।"

    जैसे ही पीठ बर्खास्तगी का आदेश पारित करने वाली थी, वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। तदनुसार, याचिका को वापस लेने के रूप में खारिज कर दिया गया।

    मामला केरल के वालयार में 2017 की शुरुआत में दो महीने के भीतर 13 और 9 साल की दो बहनों की मौत से संबंधित है। जांच में पता चला कि दोनों लड़कियां, जो अनुसूचित जाति समुदाय की थीं, और उनके साथ बलात्कार किया गया था। जनवरी 2017 में बड़ी बहन की लाश उसके घर में और छोटी बहन की लाश मार्च 2017 में लटकी मिली थी।

    स्थानीय पुलिस के अनुसार, बार-बार यौन उत्पीड़न के कारण लड़कियों ने आत्महत्या की। पुलिस ने चार आरोपियों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने और POCSO अपराधों के लिए आरोप पत्र दायर किया। निचली अदालत ने सभी आरोपियों को यह कहते हुए बरी कर दिया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ अपराध साबित करने में "बुरी तरह विफल" रहा।

    यह माना गया कि "यौन शोषण का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण" नहीं था। ट्रायल कोर्ट ने यह भी माना कि इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए कोई सबूत नहीं था कि मौत हत्या थी। बरी किए जाने के फैसले से व्यापक आक्रोश और सार्वजनिक निंदा हुई।

    इस साल जनवरी में केरल उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने आरोपियों को बरी करने के फैसले को बदल दिया और मामले में फिर से सुनवाई का आदेश दिया।

    हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष मामले में आगे की जांच की मांग करने के लिए स्वतंत्र होगा। बाद में हाईकोर्ट की एकल पीठ ने पीड़िता की मां की याचिका को मंजूर करते हुए सीबीआई को मामले की जांच अपने हाथ में लेने को कहा।

    केस : वालयार किड्स फोरम बनाम केरल राज्य के लिए न्याय | डायरी नंबर 7370-2021

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