भेदभाव ही अन्याय का दूसरा नाम: सुप्रीम कोर्ट ने योग्यता में छूट से वंचित कर्मचारी को पदोन्नति राहत दी

Praveen Mishra

14 April 2026 1:58 PM IST

  • भेदभाव ही अन्याय का दूसरा नाम: सुप्रीम कोर्ट ने योग्यता में छूट से वंचित कर्मचारी को पदोन्नति राहत दी

    सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें एक सहकारी समिति के कर्मचारी को पदोन्नति से वंचित कर दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि जब अन्य समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों को शैक्षणिक योग्यता में छूट देकर पदोन्नति दी गई है, तो किसी एक कर्मचारी को यह लाभ न देना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है।

    जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की खंडपीठ ने कहा कि “भेदभाव ही अन्याय का दूसरा नाम है” और यह रेखांकित किया कि वास्तविक न्याय के लिए सार्वजनिक रोजगार में समानता के सिद्धांत का पालन आवश्यक है।

    मामले की पृष्ठभूमि

    मामला एक प्राथमिक कृषि सहकारी समिति के कर्मचारी से जुड़ा था, जिसने लगभग 30 वर्षों तक सेवा दी थी। समिति के निदेशक मंडल ने उसे सोसायटी मैनेजर पद पर पदोन्नति के लिए अनुशंसित किया था और उसकी लंबी सेवा, वरिष्ठता और अनुभव के आधार पर शैक्षणिक योग्यता में छूट देने की सिफारिश की थी।

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने कर्मचारी के पक्ष में फैसला देते हुए छूट का लाभ देने का निर्देश दिया था। हालांकि, खंडपीठ ने इस निर्णय को पलटते हुए कहा कि कर्मचारी आवश्यक योग्यता पूरी नहीं करता और रजिस्ट्रार द्वारा छूट न देना उचित था।

    इसके बाद कर्मचारी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

    सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल निर्धारित डिग्री न होने के आधार पर किसी कर्मचारी को पदोन्नति से वंचित नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब नियम स्वयं विशेष अनुभव, दक्षता या वरिष्ठता वाले कर्मचारियों के लिए छूट का प्रावधान करते हों।

    कोर्ट ने पाया कि 2013 के सेवा नियम रजिस्ट्रार को शैक्षणिक योग्यता में छूट देने का अधिकार देते हैं। ऐसे में रजिस्ट्रार द्वारा निदेशक मंडल के निर्णय में हस्तक्षेप करना गलत था। कोर्ट ने यह भी माना कि निदेशक मंडल ने अपीलकर्ता की 28 वर्षों की निरंतर सेवा, वरिष्ठता, क्षमता और अनुभव को ध्यान में रखते हुए उचित रूप से छूट प्रदान की थी।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया, “जब निदेशक मंडल, जो सक्षम प्राधिकारी है, ने वैध रूप से प्रस्ताव पारित किया था, तब रजिस्ट्रार उसे अस्वीकार नहीं कर सकता था।”

    भेदभाव का पहलू

    सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अपीलकर्ता के साथ स्पष्ट भेदभाव हुआ, क्योंकि समान योग्यता (हायर सेकेंडरी) वाले दो अन्य कर्मचारियों को इसी प्रावधान के तहत पदोन्नति दी गई थी।

    कोर्ट ने कहा कि इस तरह का व्यवहार संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है और वास्तविक न्याय हमेशा समानता के सिद्धांत को लागू करने से ही सुनिश्चित होता है।

    निष्कर्ष

    अंततः सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ के फैसले को रद्द कर दिया और एकल न्यायाधीश के आदेश को बहाल कर दिया, जिसमें कर्मचारी को शैक्षणिक योग्यता में छूट देकर पदोन्नति देने का निर्देश दिया गया था।

    Next Story